11 December 2012

बृजमोहन अग्रवाल : सेवा ही साधना




 -छत्तीसगढ़ में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कल 10 दिसंबर को विजन न्यूज एजेंसी (वीएनएस) के दफ्तर का फीता काटा। इसी अवसर पर उन्होंने तकरीबन 10 मिनट की एक डाक्युमेंट्री भी देखी, जो उन्ही पर आधारित थी।  इस डॉक्युमेंट्री की स्क्रिप्ट मैंने लिखी थी, जिसे आप नीचे पढ़ेंगे। दैनिक भास्कर, भोपाल से विदाई लेकर दीवाली के बाद मैंने रायपुर, छत्तीसगढ़ में वीएनएस ज्वाइन किया है। ---



यह छत्तीसगढ़ है, भारत जैसे महान देश का एक छोटा-सा प्रदेश। धान का कटोरा...। देश भर में अपनी अलहदा पहचान रखने वाले इस सूबे में प्रकृति की असीम अनुकंपा रही है। प्राकृतिक धरोहर समेटे इस राज्य में एक ओर जहां आदिवासी अंचल की सौंधी महक है, तो दूसरी ओर शहरों में विकास की धमक भी है। विशाल अट्टालिकाएं, फ्लाई-ओवर, सिटीमॉल....  मानो आधुनिकता का, सुविधाओं का मंगल-गान गूंज रहा हो।
- इस प्रदेश की राजधानी रायपुर है। यहां की हलचल... हर पल सांस लेती सड़कें मुंबई जैसे महानगरीय कलेवर का एहसास कराती हैं। रायपुर भीड़ में बसता है। यहां चेहरों की भीड़ नजर आती है। या यह कहा जाए कि भीड़ ही इसका चेहरा है।
 इसी भीड़ में अक्सर एक चेहरा भी दिखाई पड़ता है। शर्ट-पैंट पहना हुआ... 50-55 की उम्र वाला एक शख्स... आम लोगों की तरह किसी पनवाड़ी की दुकान से पान खातेे... या किसी रिक्शेवाले से बातचीत करते... या सड़कों पर टहलते, लोगों से गलबहियां करते...।
अपनी चाल-ढाल, पहनावे से भले ही यह चेहरा आम-सा दिख रहा है, लेकिन है यह बहुत खास। ये छत्तीसगढ़ के कद्दावर मंत्री हैं... बृजमोहन अग्रवाल... रायपुर दक्षिण के विधायक...। आम आदमी के बीच घुले-मिले। खास होकर भी आम... आम होकर भी खास।
कहा जाता है, कुछ लोग जन्म से महान होते हैं जबकि कुछ महानता अर्जित करते हैं।  जिन्हें विरासत में महानता मिलती है, उनके इर्द-गिर्द शुरू से ऐश्वर्य बिखरा होता है। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, जो अपने हाथों से अपनी तकदीर लिखते हैं। उनके आसपास फैला आभामंडल उनकी अपनी मेहनत का नतीजा होता है।

बृजमोहन अग्रवाल इसी दूसरे वर्ग से आते हैं। वे आज जिस मुकाम पर हैं, अपनी व्यक्तिगत मेहनत और इच्छाशक्ति के बूते हैं। 1990 से... अविभाजित मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ बनने तक... वे लगातार विधायक चुने जा रहे हैं। यह उनका पांचवां कार्यकाल है। अब तक म.प्र. व छत्तीसगढ़ की सरकारों में वे तकरीबन 20 विभागों का जिम्मा संभाल चुके हैं... और  ऐसा करने वाले वे एकमात्र मंत्री हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश में उन्हें सर्वश्रेठ विधायक का खिताब भी मिल चुका है।
उपलब्धियों का यह पायदान किसी राजनीति-विरासत की देन नहीं है। कदम-दर-कदम मुश्किलों-चुनौतियों की प्रसवपीड़ा सहकर उन्होंने सफलता को जन्म दिया है... उसे अर्जित किया है।
1 मई 1959 को जन्मे बृजमोहनजीे गैर-सियासी पृष्ठभूमि से रहे हैं। उनके माता-पिता व्यवसाय करते थे, जिनका राजनीति से कोई नाता नहीं था। खुद बृजमोहन का रुझान भी शुरुआत में राजनीति की तरफ नहीं था। वे पढ़-लिखकर वकील बनना चाहते थे। लेकिन 1977-78 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुडऩे के बाद उनकी सोच बदल गई। उनके भीतर कहीं राजनीति का कमल खिलना शुरू हो गया।
लीडरशिप का नैसर्गिक गुण उनमें था ही, जो अंकुरित होने के लिए अपने समय का इंतजार कर रहा था। एबीवीपी से जुडऩे के बाद उसे पल्लवित होने का मौका मिल गया। 1981 में दुर्गा कॉलेज, रायपुर व 1982 में वे कल्याण कॉलेज, भिलाई के अध्यक्ष चुने गए।
छात्रों की समस्याओं से दो-चार होते, उन्हें सुलझाते-सुलझाते... युवा बृजमोहन के मन के जाले भी पूरी तरह साफ हो गए। उसे समझ आ गया कि वह राजनीति के लिए ही बना है। और उसने राजनीति को अपनी जीवन-साधना बनाने का फैसला ले लिया।
बृजमोहनजी का सेवाभावी मन जिस सशक्त माध्यम की तलाश कर रहा था, वह उन्हें मिल चुका था।

इसके बाद उन्होंने देर नहीं लगाई और 1984 में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली। 84 से 90 तक पार्टी के छोटे-बड़े पदों में रहकर वे अपनी काबिलियत साबित करते रहे। इन सालों में वे आम लोगों के बीच खासे लोकप्रिय हो गए थे। इसी लोकप्रियता ने 1990 में उन्हें रायपुर (शहर) विधानसभा का उम्मीदवार बनाया और कांग्रेस को इस परंपरागत सीट से बेदखल कर बृजमोहन ने इतिहास रच दिया। इसके बाद से उनका इस सीट पर कब्जा बना हुआ है। उम्मीदवार बदलते हैं, लेकिन नतीजा वही रहता है।
बृजमोहन अग्रवाल जैसे एक गैर-सियासी पृष्ठभूमि के व्यक्ति का, कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र में अपनी जमीन तैयार करना, उनके विराट आत्मबल-नैतिक शक्ति का ही परिचायक है। वे सचमुच मिट्टी-पकड़ पहलवान हैं।
इसका सुबूत अनेक मौकों पर भी मिलता रहा है। राजिम महाकुंभ का आयोजन, परसदा का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम... उनके वज्र जैसे मजबूत इरादे, इच्छाशक्ति और मेहनत की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है।

बृजमोहन के बारे में प्रसिद्ध है, वे जिस विभाग को संभालते हैं, वह चर्चा में आ जाता है। खेल, संस्कृति, शिक्षा, पर्यटन जैसे विभाग इसकी जीवंत मिसाल भी हैं। 2003 से छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने अनेक काबिले-गौर काम किया है। पुरखौती मुक्तांगन, पर्यटन स्थलों में टूरिस्ट मोटेल का निर्माण, खेल अकादमी की स्थापना जैसे अनेक मोरपंख.... उनके मुकुट में सजे हुए हैं। 
बृजमोहनजी की उपलब्धियों के पीछे उनकी अथाह ऊर्जा का बहुत बड़ा हाथ है। हर दिन वे 14 से 16 घंटे काम करते हैं। कहते हैं, इंसान शरीर से नहीं मन से बूढ़ा होता है। इस कसौटी में कसने पर... 53 साल के बृजमोहन चिरयुवा ही कहे जाएंगे। वे जिस फुर्ती से लोगों से मिलते हैं, सारे काम निबटाते हैं, वह सुखद आश्चर्य पैदा करता है। ऐसा महसूस होता है... मानो किसी दैवीय प्रेरणा के वशीभूत होकर वे काम कर रहे हैं, या कोई दैवीय-शक्ति ही उन्हें संचालित कर रही है।

वैसे धर्म-अध्यात्म में बृजमोहन की गहरी रुचि भी है।  वे हर मंगलवार-शनिवार बिना नागा मंदिर जाते हैं, चाहे अपने गृहनगर रायपुर में हों या और कहीं।

और शायद यह धार्मिक संस्कार ही है, जो उनके भीतर निस्वार्थ सेवा-भावना की जोत जलाए हुए है। धर्म-जाति, राजनीतिक दुर्भावना से परे वे सबकी मदद करते रहते हैं। इसी वजह से उनके बंगले में देर रात तक मिलने वालों का तांता लगा रहता है। उनके चाहने वाले उन्हें मोहन भैया के नाम से बुलाते हैं।

20 साल से जनता का विश्वास कायम रहना, लगातार जीतते चले आना बृजमोहन अग्रवाल की अनवरत सेवा का प्रतिफल है। उनके सादगी भरे व्यक्तित्व का जादू है।
राजनीतिज्ञों की पारंपरिक वेशभूषा कुर्ता-पायजामा के विपरीत वे अमूमन शर्ट-पैंट में दिखाई देते हैं... मुंह में पान का बीड़ा दबाए...।
एक आम आदमी के जैसी- सादगीपूर्ण, आडंबरहीन जीवनशैली... यही उनकी पहचान है।


गीता में निष्काम कर्म की अवधारणा है।
ऐसा मालूम पड़ता  है,
उसी कर्मभाव को आत्मसात कर  बृजमोहन चल रहे हैं।



इसी सद्भावना के साथ...
जिंदगी में कभी उदास मत होना
कभी किसी बात पर निराश मत होना
जिंदगी संघर्ष है चलती रहेगी
कभी अपने जीने का अंदाज मत खोना
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08 December 2012

हिंदी व्याकरण की बारीकियां

हिंदी में काम करने वाले.... पत्रकारिता या और किसी भी क्षेत्र के लोग... जिन्हें व्याकरण संबंधी बारीकियों को जानने की जरूरत महसूस होती है। या हिंदी प्रेमी ऐसे लोग हिंदी के संबंध में अपना ज्ञान बढ़ाना चाहते हैं।  ऐसे लोग यहां क्लिक करें... http://www.hindikunj.com

कार्टून की ताकत

व्यंग्य क्या होता है? या सरलता से अपनी बात कैसे कही जाती है? या कार्टून की ताकत क्या है, इसे जानने के लिए इसे जरूर देखें...?

02 December 2012

गौरव

आगमन   पर    आपके
मन कंवल-सा खिल गया
कष्ट तो    हुआ आपको
गौरव  हमारा  बढ़  गया

25 November 2012

हॉस्टल का युनिक नाम

संता- यार बंता सुना है तुमने अपने हॉस्टल का युनिक नाम रखा है? क्या है वह?
बंता- बंता सिंह गल्र्स हॉस्टल फॉर ब्वॉयज।

23 November 2012

दो आंखों से क्या-क्या देखूं



जंगल में फिरूं के सेहरो-सेहरा देखूं
या मादन के दस्तों दरिया देखूं
हर सूं बिखरे हंै, तेरी कुदरत के जलवे
हैरान हूं के दो आंखों से क्या-क्या देखूं

03 September 2012

विश्रांत होने के चार तल ( निष्क्रिय विधियां)

ऐसी परिस्थिति में, जब आप सक्रिय ध्यान विधियों का प्रयोग नहीं कर सकते, आप के लिये दो साधारण लेकिन प्रभावशाली निष्क्रिय विधियां उपलब्ध हैं। ध्यान रहे कि इसके इलावा आप हमारे साप्ताहिक स्तंभ ंइस सप्ताह के ध्यानं और ंव्यस्त व्यक्तियोंं के लिये में और भी विधियां पायेंगे।

श्वास को देखना

श्वास को देखना एक ऐसी विधि है जिसका प्रयोग कहीं भी, किसी भी समय किया जा सकता है, तब भी जब आप के पास केवल कुछ मिनटों का समय हो। आती जाती श्वास के साथ आपको केवल छाती या पेट के उतार-चढ़ाव के प्रति सजग होना है। या फिर इस विधि को आजमायें:

प्रथम चरण: भीतर जाती श्वास को देखना

अपनी आंखें बंद करें अपने श्वास पर ध्यान दें। पहले श्वास के भीतर आने पर, जहां से यह आपके नासापुटों में प्रवेश करता है, फिर आपके फेफड़ों तक।

दूसरा चरण: इससे आगे आने वाले अंतराल पर ध्यान

श्वास के भीतर आने के तथा बाहर जाने के बीच एक अंतराल आता है। यह अत्यंत मूल्यवान है। इस अंतराल को देखें।

तीसरा चरण: बाहर जाती श्वास पर ध्यान

अब प्रश्वास को देखें

चौथा चरण: इससे आगे आने वाले अंतराल पर ध्यान

प्रश्वास के अंत में दूसरा अंतराल आता है: उस अंतराल को देखें। इन चारों चरणों को दो से तीन बार दोहरायें- श्वसन-क्रिया के चक्र को देखते हुए, इसे किसी भी तरह बदलने के प्रयास के बिना, बस केवल नैसर्गिक लय के साथ।

पांचवां चरण: श्वासों में गिनती

अब गिनना प्रारंभ करें: भीतर जाती श्वास - गिनें, एक (प्रश्वास को न गिनें) भीतर जाती श्वास - दो; और ऐसे ही गिनते जायें दस तक। फिर दस से एक तक गिनें। कई बार आप श्वास को देखना भूल सकते हैं या दस से अधिक गिन सकते हैं। फिर एक से गिनना शुरू करें।

"इन दो बातों का ध्यान रखना होगा: सजग रहना, विशेषतया श्वास की शुरुआत व अंत के बीच के अंतराल के प्रति। उस अंतराल का अनुभव हैं आप, आपका अंतरतम केंद्र, आपका अंतस। और दूसरी बात: गिनते जायें परंतु दस से अधिक नहीं; फिर एक पर लौट आयें; और केवल भीतर जाती श्वास को ही गिनें।

इनसे सजगता बढऩे में सहायता मिलती है। आपको सजग रहना होगा नहीं तो आप बाहर जाती श्वास को गिनने लगेंगे या फिर दस से ऊपर निकल जायेंगे।

यदि आपको यह ध्यान विधि पसंद आती है तो इसे जारी रखें। यह बहुमूल्य है।" ओशो

व्यस्त लोगों के लिए ध्यान

बस "हां" कहो ((ओशो की ध्यान पद्धति.)
" जीवन को नकार से नहीं जिया जा सकता, और जो जीवन को नकार से जीने का प्रयत्न करते हैं वे जीवन को केवल गंवा देते हैं। आप नकार को अपना आशियाना नहीं बना सकते क्योंकि नकार पूरी तरह खाली है। नकार अंधेरे की तरह है। अंधेरे का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता; यह केवल प्रकाश की अनुपस्थिति है। इसलिए आप सीधे-सीधे अंधेरे के साथ कुछ नहीं कर सकते। आप इसे कमरे से बाहर धकेल नहीं सकते, आप इसे पड़ोसी के घर में नहीं फेंक सकते; और आप अपने घर में और अधिक अंधेरा नहीं ला सकते। अंधेरे के साथ सीधे कुछ नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह नहीं है। यदि आप अंधेरे के साथ कुछ करना चाहते हैं, तो प्रकाश को बुझा दें; यदि आप अंधेरा नहीं चाहते, प्रकाश को जला दें। लेकिन जो कुछ भी आपको करना है वह प्रकाश के साथ करना है।'
' ठीक उसी तरह, हां प्रकाश है, नकार अंधेरा है। यदि आप अपने जीवन में वास्तव मेम कुछ करना चाहते हैं, आप को हां कहना सीखना पड़ेगा। और हां कहना अत्यधिक सुंदर है; मात्र हां कहना अधिक शिथिल करने वाला है। इसे सहजतापूर्वक अपनी जीवन शैली बना लो। वृक्षों से, पक्षियों से और लोगों से हां कहना शुरु करो, और तुम आश्चर्य चकित हो जाओगे: जीवन एक आशीर्वाद हो जाएगा यदि तुम इसे हां कहने लगो। जीवन एक महान साहसिक कृत्य हो जएगा।
जोरबा दि बुद्धा
विधि:
समय: प्रत्येक रात्रि, सोने से पहले, कम से कमे 10 मिनिट ; फिर सुबह सबसे पहले कम से कम 3 मिनिट। दिन में भी, जब भी आप नकारात्मक महसूस करें, अपने बिस्तर पर बैठ जाएं और इसे करें।
पहला चरण: हां  में अपनी ऊर्जा लगना शुरु करें, हां को एक मंत्र बनालें। अपने बिस्तर पर बैठे हुए, हां... हां... दुहराना शुरु करें। इसए साथ एक धुन में हो जाएं। पहले आप इसे दुहरा रहेम होगे फिर इसके साथ लयबद्ध हो जाएं, इसके साथ झूमें।  इसे सिर से पांव तक अपने पूरे अस्तित्व को आच्छादित करने दें। इसे गहराई तक अपने में प्रवेश करने दें।
दूसरा चरण: " यदि इसे जोर से नहीं कह सकते, तो धीमे से हां...हां...हां दुहराएं!
(ओशो की ध्यान पद्धति... ओशो डॉटकॉम से साभार)

निर्विचार कैसे हुआ जाए?

जिसे निर्विचार होना हो, उसे व्यर्थ के विचारों को लेना बंद कर देना चाहिए । उसे व्यर्थ के विचारों को लेना बंद कर देना चाहिए। इसकी सजगता उसके भीतर होनी चाहिए कि वह व्यर्थ के विचारों का पोषण न करे, उन्हें अंगीकार न करे, उन्हें स्वीकार न करे और सचेत रहे कि मेरे भीतर विचार इक_े न हो जाएं। इसे करने के लिए जरूरी होगा कि वह विचारों में जितना भी रस हो, उसको छोड़ दे।

हमें विचारों में बहुत रस है। अगर आप एक धर्म को मानते हैं, तो उस धर्म के विचारों में आपको बहुत रस है।
जिसे निर्विचार होना है, उसे विचारों के प्रति विरस हो जाना चाहिए। उसे किसी विचार में कोई रस नहीं रह जाना चाहिए। उसे यह सोचना चाहिए कि विचार से कोई प्रयोजन नहीं, इसलिए उसमें कोई रस रखने का कारण नहीं। कैसे वह विरस होगा?

यह संभव होगा विचारों के प्रति जागरूकता से। अगर हम अपने विचारों के साक्षी बन सकें—और यह बन सकना कठिन नहीं है—अगर हम अपने विचारों की धारा को दूर खड़े होकर देखना शुरू करें, तो क्रमश: जिस मात्रा में आपका साक्षी होना विकसित होता है, उसी मात्रा में विचार शून्य होने लगते हैं।

विचार को शून्य करने का उपाय है विचार के प्रति पूर्ण सजग हो जाना। जो व्यक्ति जितना सजग हो जाएगा विचारों के प्रति, उतने ही विचार उसी भांति उसके मन में नहीं आते, जैसे घर में दीया जलता हो तो चोर न आएं। और घर में अंधकार हो तो चोर झांकें और अंदर आना चाहें।

भीतर जो होश को जगा लेता है, उतने ही विचार क्षीण होने लगते हैं। जितनी मूर्च्छा होती है भीतर, जितना सोयापन होता है भीतर, उतने ज्यादा विचारों का आगमन होता है। जितना जागरण होता है, उतने ही विचार क्षीण होने लगते हैं।

निर्विचार होने का उपाय है: विचारों के प्रति साक्षी-भाव को साधना। कोई एक क्षण में सध जाएगा, यह नहीं कहता। कोई एक दिन में सध जाएगा, यह भी नहीं कह रहा हूं। लेकिन अगर निरंतर प्रयास हो, तो थोड़े ही दिनों में आपको पता चलेगा कि जैसे-जैसे आप विचारों को देखने लगेंगे...कभी घंटे भर को किसी एकांत कोने में बैठ जाएं और कुछ भी न करें, सिर्फ विचारों को देखते रहें। कुछ भी न करें उनके साथ, कोई छेड़-छाड़ न करें, सिर्फ उन्हें देखते रहें। और देखते-देखते ही धीरे-धीरे आपको पता चलेगा, वे कम होने लगे हैं। देखना जैसे-जैसे गहरा होगा, वैसे-वैसे वे विलीन होने लगेंगे। जिस दिन देखना पूरा हो जाएगा, जिस दिन आप अपने भीतर आर-पार देख सकेंगे, जिस दिन आपकी आंख बंद होगी और आपकी दृष्टि भीतर पूरी की पूरी देख रही होगी, उस दिन आप पाएंगे—कोई विचार का कोलाहल नहीं है, वे गए। और जब वे चले गए होंगे, उसी शांत क्षण में आपको अदभुत दृष्टि, अदभुत दर्शन, अदभुत आलोक का अनुभव होगा। वह अनुभव ही सत्य का दर्शन है। और वही अनुभव स्वयं का दर्शन है। स्वयं के माध्यम से ही सत्य जाना जाता है। और कोई द्वार नहीं है।

स्वयं के द्वार से ही सत्य को जाना जाता है। और सत्य को जान लेना आनंद में प्रतिष्ठित हो जाना है। असत्य में होना दुख में होना है। अज्ञान में होना दुख में होना है। और सत्य की उस ज्ञान-दशा में आनंद उपलब्ध होता है। आनंद और आत्मा अलग न समझें। आनंद और सत्य अलग न समझें। स्वयं और सत्य अलग न समझें। ऐसी जो प्रक्रिया का उपयोग क्रमश: अपने जीवन में करेगा, वह कभी निर्विचार को अनुभव कर लेता है। निर्विचार को जो अनुभव कर लेता है, उसकी पूरी विचार की शक्ति जाग्रत हो जाती है, उसे च्रु मिल जाते हैं।

जैसे किसी ने अंधेरे में प्रकाश कर दिया हो या जैसे किसी ने अंधे को आंख दे दी हों, ऐसा उसे अनुभव होता है। यह अगर क्रमिक साधना इसकी हो तो निश्चित ही उपलब्ध हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति अधिकारी है और हकदार है। जो अपने अधिकार को मांगेगा, उसे मिल जाता है। जो उसे छोड़े रखता है, वह खो देता है। ( ओशो अमृत की दिशा/ 2)

मन के बहुत चेहरे

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार—ये क्या अलग-अलग हैं?
ये अलग-अलग नहीं हैं, ये मन के ही बहुत चेहरे हैं। जैसे कोई हमसे पूछे कि बाप अलग है, बेटा अलग है, पति अलग है? तो हम कहें कि नहीं, वह आदमी तो एक ही है। लेकिन किसी के सामने वह बाप है, और किसी के सामने वह बेटा है, और किसी के सामने वह पति है; और किसी के सामने मित्र है और किसी के सामने शत्रु है; और किसी के सामने सुंदर है और किसी के सामने असुंदर है; और किसी के सामने मालिक है और किसी के सामने नौकर है। वह आदमी एक है। और अगर हम उस घर में न गए हों, और हमें कभी कोई आकर खबर दे कि आज मालिक मिल गया था, और कभी कोई आकर खबर दे कि आज नौकर मिल गया था, और कभी कोई आकर कहे कि आज पिता से मुलाकात हुई थी, और कभी कोई आकर कहे कि आज पति घर में बैठा हुआ था, तो हम शायद सोचें कि बहुत लोग इस घर में रहते हैं—कोई मालिक, कोई पिता, कोई पति। हमारा मन बहुत तरह से व्यवहार करता है। हमारा मन जब अकड़ जाता है और कहता है: मैं ही सब कुछ हूं और कोई कुछ नहीं, तब वह अहंकार की तरह प्रतीत होता है। वह मन का एक ढंग है; वह मन के व्यवहार का एक रूप है। तब वह अहंकार, जब वह कहता है—मैं ही सब कुछ! जब मन घोषणा करता है कि मेरे सामने और कोई कुछ भी नहीं, तब मन अहंकार है। और जब मन विचार करता है, सोचता है, तब वह बुद्धि है। और जब मन न सोचता, न विचार करता, सिर्फ तरंगों में बहा चला जाता है, अन-डायरेक्टेड...। जब मन डायरेक्शन लेकर सोचता है—एक वैज्ञानिक बैठा है प्रयोगशाला में और सोच रहा है कि अणु का विस्फोट कैसे हो—डायरेक्टेड थिंकिंग, तब मन बुद्धि है। और जब मन निरुद्देश्य, निर्लक्ष्य, सिर्फ बहा जाता है—कभी सपना देखता है, कभी धन देखता है, कभी राष्ट्रपति हो जाता है—तब वह चित्त है; तब वह सिर्फ तरंगें मात्र है। और तरंगें असंगत, असंबद्ध, तब वह चित्त है। और जब वह सुनिश्चित एक मार्ग पर बहता है, तब वह बुद्धि है। ये मन के ढंग हैं बहुत, लेकिन मन ही है।

मन और आत्मा: चेतना के दो रूप
और वे पूछते हैं कि ये मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और आत्मा अलग हैं या एक हैं? सागर में तूफान आ जाए, तो तूफान और सागर एक होते हैं या अलग? विक्षुब्ध जब हो जाता है सागर तो हम कहते हैं, तूफान है। आत्मा जब विक्षुब्ध हो जाती है तो हम कहते हैं, मन है; और मन जब शांत हो जाता है तो हम कहते हैं, आत्मा है। मन जो है वह आत्मा की विक्षुब्ध अवस्था है; और आत्मा जो है वह मन की शांत अवस्था है। ऐसा समझें: चेतना जब हमारे भीतर विक्षुब्ध है, विक्षिप्त है, तूफान से घिरी है, तब हम इसे मन कहते हैं। इसलिए जब तक आपको मन का पता चलता है तब तक आत्मा का पता न चलेगा। और इसलिए ध्यान में मन खो जाता है। खो जाता है इसका मतलब? इसका मतलब, वे जो लहरें उठ रही थीं आत्मा पर, सो जाती हैं, वापस शांति हो जाती है। तब आपको पता चलता है कि मैं आत्मा हूं। जब तक विक्षुब्ध हैं तब तक पता चलता है कि मन है। विक्षुब्ध मन बहुत रूपों में प्रकट होता है—कभी अहंकार की तरह, कभी बुद्धि की तरह, कभी चित्त की तरह—वे विक्षुब्ध मन के अनेक चेहरे हैं। (जिन खोजा तिन पाइया / 2)

01 September 2012

तो पहले झुकना सीख कर आ।

मिश्र में एक अद्भुत फकीर हुआ है झुन्‍नून। एक युवक ने आकर उससे पूछा, मैं भी सत्‍संग का आकांक्षी हूं। मुझे भी चरणों में जगह दो। झुन्‍नून ने उसकी तरफ देखा—दिखाई पड़ी होगी बही बुद्ध की कलछी वाली बात जो दाल में रहकर भी उसका स्‍वाद नहीं ले पाती। उसने कहा, तू एक काम कर। खीसे में से एक पत्‍थर निकाला और कहा, जा बाजार में, सब्‍जी मंडी में चला जा, और दुकानदारों से पूछना कि इसके कितने दाम मिल सकते है।
वह भागा हुआ गया। उसने जाकर सब्‍जियां बेचने वाले लोगों से पूछा। कई ने तो कहां हमें जरूरत ही नहीं है। दाम का क्‍या सवाल? दाम तो जरूरत से होता है। हटाओं अपने पत्‍थर को। पर किसी ने कहा कि ठीक है, सब्‍जी तौलने के काम आ जाएगा। तो दो पैसे ले लो। चार पैसे ले लो, पत्‍थर रंगीन था। मन को भा रहा था।
पर झुन्‍नून ने कहा थ, बेचना मत, सिर्फ दाम पूछ कर आ जाना। ज्‍यादा से ज्‍यादा कितने दाम मिल सकते है। सब तरफ पूछकर आ गया, चार पैसे से ज्‍यादा कोई देने को तैयार नहीं हुआ।
आकर उसने झुन्‍नून से कहा की चार पैसे से कोई एक पैसा ज्‍यादा देने को तैयार नहीं है। बहुत तो लेने को ही तैयार नहीं थे। कईयों ने तो डांट कर भगा दिया। सुबह बोनी का वक्‍त है। आ गये पत्‍थर बेचने। चल भाग यहां से। हम ग्राहकों से बात कर रहे है बीच में अपने पत्‍थर को उलझाये हुए है। अभी तो सांस लेनी की भी फुरसत नहीं है। श्याम के वक्‍त आना। पर हमारे ये काम का ही नहीं है मत आना। किसी ने उत्‍सुकता भी दिखाई तो इस लिए सब्‍जी तौलने के काम आ जायेगा। इसका बांट बना लेगा। एक आदमी तो ऐसा भी मिला की काम को तो कोई नहीं है पर दे जा बच्‍चे खेल लेंगे। अब तुम ले आये हो तो चलो दे ही दो। और ये चार पैसे। बड़ी दया से चार दे रहे थे। जैसे मुझ पर बड़ा एहसान कर रहे हो। कहो तो बेच आऊं।
गुरु ने कहा, अब तू ऐसा कर, सोने चाँदी वाले बाजार में जा और वहां जा कर पूछ आ। लेकिन बेचना नहीं है। सिर्फ दाम ही पूछ कर आने है। चाहे कोई कितने ही दाम क्‍यों न लगाये। क्‍योंकि यह पत्‍थर मेरा नहीं यह मेरे पास किसी कि अमानत है। इसलिए मैं तुझे दिये देता हूं केवल इसे अमानत ही समझना और वह भी अमान पे अमानत। इसे बेचने का हक न तो मेरा है न तेरा। इस बात को गांठ बाद ले। वह बजार गया। वह तो हैरान होकर लौटा। सोने-चाँदी के दुकान दार हजार रूपये देने को तैयार है। भरोसा ही नहीं आ रहा कहां चार पैसे और कहां हजार रूपये। कितना फर्क हो गया। एक बार तो लगा की बैच ही दे। यह आदमी बाद में हजार दे या न दे। पर गुरु ने मना किया था इस लिए उसके हाथ बंधे थे वरना तो वह कब का बेच चुका होता। लौटकर आया और अपने गुरू को कहने लगा इस पत्‍थर के एक आदमी हजार रूपये देने को तैयार हो गया है। पाँच सौ से तो कम कोई देने को तैयार ही नहीं था। अब कहो तो इसे बेच आऊं।
गुरु ने कहा, अब तू ऐसा कर, इसे बेच मत देना। बात तुझे याद है न। यह मेरे पास अमानत है ये अमानत में तुझे दे रहा हूं। अब तू जा हीरे-जवाहरात जहां बिकते है। जौहरी और पारखी जहां है। वहां ले जा; लेकिन बेचना नहीं है। चाहे कोई कितनी भी कीमत क्‍यों न लगाये। तेरे मन में कितना ही उत्‍साह और लालच आ जाए। बस मोल-भाव करना है। कीमत पता करनी है। कितने का बिक सकता है।
वह गया तो और भी चकित रह गया। वहां तो दस लाख रूपया तक देने को तैयार है। इस पत्‍थर के। वह तो पागल ही हो गया। उसे लगा कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा। कहा दो पैसे, चार पैसे, और कहां हजार और कहां लाखों। इस बार उससे नही रहा जा रहा था। मन कर रहा था इससे सुनहरी मौका फिर नहीं आएगा। इसे बेच ही दे।
जल्‍दी-जल्‍दी लौट कर अपने गुरु के पास आया। और गुरु ने उसका चेहरा देखते ही कहा पत्‍थर कहां है पहले वो दे। और पत्‍थर दे दिया। फिर पूछा सब ठीक है। समझा जो पत्‍थर तुझे दिया था उसकी कीमत देखी,अब अपनी और देख सत्‍य का तू आकांक्षी है, इतने से ही सत्‍य नहीं मिलता; पारखी भी है या नहीं? नहीं है तो हम सत्‍य देंगे और तू दो पैसे दाम बताएगा । शायद दो पैसे का भी नहीं समझेगा। पारखी होना जरूरी है। पहले पारखी होकर आ। सत्‍य तो है हम देने को भी तैयार है। लेकिन सिर्फ इतना तेरे कहा देने से कि तू आकांक्षी है, काफी नहीं हल होता। क्‍योंकि मैं देखता हूं, अकड़ तेरी भारी है। पैर भी तूने झुककर छुए है। शरीर तो झुका, तू नहीं झुका। छू लिए है उपचार वश। छूने चाहिए इसलिए। और लोग भी छू रहे है इसलिए। झुकना ही तुझे नहीं आता। तो जिन हीरों की यहां चर्चा है। वह तो झुकने से ही उनकी परख आती है। तो पहले झुकना सीख कर आ।
ओशो एस. धम्‍मो सनंतनो, भाग-3, प्रवचन—23

अब तुम बताओ कहां गई ज्योति?

एक सूफी फकीर हुआ हसन। जब वह मरने लगा तब उससे उसके कुछ शिष्‍यों ने पूछा कम से कम अब तो आप जा रहे हो इस दुनियां को छोड़ कर। और हम आपके संग सालों रहे है। और आपके जीवन में जो खीला हुआ, जो सुगंध उठ रही है। वो हमने पल-पल जानी है। पर एक बात मन में हमेशा उठती रही की आपका गुरु कोन है। आज तक कभी न वह आपसे मिलने के लिए आया और न ही आप उससे कभी मिलने के लिए गये। क्‍या आपने ये सब बिना गुरु के ही पा लिया।
तब हसन ने कहां की फहरिस्‍त बहुत लम्‍बी है। उसे बताना इतना आसन नहीं है। शायद बता भी न पाऊँ। और मेरे पास अब जीवन भी नहीं बचा की मैं वो सब आप को बता दूँ। क्‍योंकि साँसे मेरे पास कम हे। और अगर सारे गुरूओं की बात कुरू तो मुझे उतनी ही जिन्‍दगी चाहिए। जितनी में जी चुका हूं। क्‍योंकि क्षण-क्षण उनसे मुलाकात होती रही। प्रत्‍येक कदम, प्रत्‍येक डगर पर। जहां भी जाऊँ हर जगह।
फिर भी शिष्‍यों ने कहा कम से कम कुछ तो कहो ताकि हम भी पाता चले की हमारे गुरु को गुरु कोन था। एक गुरु को तो नाम बता ही दो जिससे की तुम्‍हें परमात्‍मा की पहली झलक मिली होगी। तब हसन ने कहां: हां याद है, वो एक श्‍याम थी, मैं एक गांव के पास से गुजर रहा था। सुर्य डूब रहा था। किसान खेतों से अपने घर जा रहे थे। पशु-पक्षी भी अपने-अपने रैन बरसों में जा विश्राम करना चाहते थे। मैं भी मीलों चल चुका था। तब कहीं वो गांव आया था। मैं उस समय बहुत अकड़ा हुआ था। क्‍योंकि मैंने फलसफा पढ़ा था, दर्शन शस्‍त्र पढ़ा थे। शस्‍त्र कंठ हस्त हो गये थे। तर्क सीख लिया था। अपने को बहुत ज्ञानी समझने लगा। जो भी कहीं पर मिलता उससे खूब तर्क करता और उसके सारे प्रश्न को खत्म कर हरा देता। तब अंदर एक अहं की तृप्‍ति मिलती। पर अकड़ खूब हो गई थी। अपने को दुनियां का सबसे ज्ञानी आदमी मानने लगा था। तभी मैं देखता हूं कोई 10-।2 साल एक छोटा सा लड़का हाथ में दीपक लिए जा रहा था। शायद संध्‍या के समय किसी शिवालय में जलाने जा रहा होगा।
मैने उसके पास जा कर उससे पूछा क्‍या ये दीया तूने ही जलाया है? उसने कहां हां-हां मैने ही जलाया है। तब मैने उससे पूछा मैं तुझसे एक प्रश्न पुछता हूं। पर तू तो अभी बच्‍चा है। तेरी तो समझ में शायद वो प्रश्‍न ही नहीं आये। उत्‍तर का तो सवाल ही नहीं उठता। पर शायद जीवन में कभी काम आ जायेगा। जीवन बहुत ही उलझा हुआ है। प्रश्न थोड़ा दार्शनिक है—कि जब तूने ये दीपक जलाया है तो तुझे जरूर पता होगा, कि इस की ज्‍योति जो पहले नहीं है। और तू उसे जला रहा है। तो यह तो जनता ही होगा की वो कहां से आई। इस दीपक की और देख। शायद तेरी समझ में आ जाये। और मैं अंदर ही अंदर बहुत प्रश्नन था कि अब मजा आयेगा। जब ये बच्‍चा निरूत्‍तर हो मेरे सामने खड़ा होगा।
तब उस बच्‍चें ने कहा एक मिनट ठहर जाओ। मैं आपको बताता हूं। और जरा मेरे करीब आओ,और बड़े ध्‍यान से देख इस दिये को फिर न कहना की मैंने देखा नहीं है। ये फिर दोबार मैं उत्‍तर न दे सकूंगा। उस बच्‍चें न जब ये कहा तो उसकी आंखों की चमक देखने जैसी थी। और उस बच्‍चे ने दीपक हसन के सामने कर के उसे जोर से फूंक मार दी। और जो दीपक में ज्‍योति थी वह क्षण में बुझ गई। एक धुएँ की लकीर पीछे रह गई। शायद जैसे उस ज्योति के पद चाप हो। और उसने पूछा हसन से अब बताओ ज्योति जो आपके सामने जल रही थी। मेंने उस को बुझा दिया। फूँक मार कर। अब बताओ कहां गई। आना तो अचानक हुआ किसी भी दशा से हो सकता है। में जान न पाया हूं। पर जो चीज तुम्हारे सामने से जा रही है। उसका तो तुम पता लगा ही सकते है। यह तो पहले से थोड़ा आसान है।
हसन ने कहां, मेरी अकड़ पल में टुट गई एक छोटे से बच्‍चें ने मुझे निरूत्तर कर दिया। मेरे सारे तर्क सारे शस्‍त्र मेरे कुछ काम न आये। उस बालक में मुझे आपने उस गुरु की पहली झलक मिली जिस ने पहली झलक परमात्‍मा की दी। और मैंने झुक कर उसके चरण स्‍पर्श किये। एक छोटे से बच्‍चे ने मेरे सारे दर्शन शस्‍त्र को कूड़े करकट में डाल दीया। और मेरी आंखे खोल दी। एक छोटा बच्‍चा समझ में उसे सिखाने की चेष्‍टा कर रहा था। और शायद जानता में कुछ भी नहीं था। और अपने को गुरु होने के मार्ग पर ले जा रहा था। वह मार्ग उसने पल में एक झटके से तोड़ दिया।
और ये देखना चमत्‍कार की मैं उसी पल, उसी समय गुरु हो गया।

खोल और गिरी और संत बाबा शेख फरीद

शेख फरीद के पास कभी एक युवक आया। और उस युवक ने पूछा कि सुनते है कि हम जब मंसूर के हाथ काटे गये, पैर काटे गये। तो मंसूर को कोई तकलीफ न हुई। लेकिन विश्‍वास नहीं आता। पैर में कांटा गड़ जाता है, तो तकलीफ होती है। हाथ-पैर काटने से तकलीफ न हुई होगी? यह सब कपोल-काल्‍पनिक बातें है। ये सब कहानी किसे घड़े हुये से प्रतीत होते है। और उस आदमी ने कहां, यह भी हम सुनते है कि जीसस को जब सूली पर लटकाया गया,तो वे जरा भी दुःखी न हुए। और जब उनसे कहा गया कि अंतिम कुछ प्रार्थना करनी हो तो कर सकते हो। तो सूली पर लटके हुए, कांटों के छिदे हुए, हाथों में कीलों से बिंधे हुए, लहू बहते हुए उस नंगे जीसस ने अंतिम क्षण में जो कहा वह विश्‍वास के योग्‍य नहीं है। उस आदमी ने कहा, जीसस ने यह कहा कि क्षमा कर देना इन लोगों को, क्‍योंकि ये नहीं जानते कि ये क्‍या कर रहे है।
यह वाक्‍य आपने भी सुना होगा। और सारी दुनिया में जीसस को मानने वाले लोग निरंतर इसको दोहराते है। यह वाक्‍य बड़ा सरल है। जीसस ने कहा कि इन लोगों को क्षमा कर देना परमात्‍मा, क्‍योंकि ये नहीं जानते कि ये क्‍या कर रहे है। आम तौर से इस वाक्‍य को पढ़ने वाले ऐसा समझते है कि जीसस ने यह कहा कि ये बेचारे नहीं जानते कि मुझे अच्‍छे आदमी को मार रहे है। इनको पता नहीं है।
नहीं यह मतलब जीसस का नहीं था। जीसस का मतलब यह था कि इन पागलों को यह पता नहीं है कि जिसको ये मार रहे है, वह मर ही नहीं सकता है। इनको माफ कर देना। क्‍योंकि इन्‍हें पता नहीं है कि ये क्‍या कर रहे है। यक एक ऐसा काम कर रहे है, जो असंभव है। ये मारने का काम कर रहे है, जो असंभव है।
उस आदमी ने कहा कि विश्‍वास नहीं आता कि कोई मारा जाता हुआ आदमी इतनी करूणा दिखा सकता है। उस वक्‍त तो वह क्रोध से भर जाएगा।
शेख फरीद खूब हंसने लगा। और उसने कहा कि तुमने अच्‍छा सवाल उठाया। लेकिन सवाल का जवाब मैं बाद में दूँगा, मेरा एक छोटा सा काम कर लाओ। पास में पडा हुआ एक नारियल उठाकर दे दिया उस आदमी को, और कहा कि इसे फोड लाओ, लेकिन ध्‍यान रहे,इसकी गिरी को पूरा बचा लाना, गिरी टूट न जाये। लेकिन वह नारियल बिलकुल ही कच्‍चा था। उस आदमी ने कहा,माफ कीजिए, यह काम मुझसे ने होगा। नारियल बिलकुल कच्‍चा है। और अगर मैंने इसकी खोल तोड़ी तो गिरी भी टूट जायेगी। तो उस फकीर ने कहां की उसे रख दो। दूसरा नारियल उसने दिया जो कि सूखा था और कहा कि अब इसे तोड़ लाओ। इसकी गिरी तो तुम बचा सकोगे। उस आदमी ने कहा, इसकी गिरी बच सकती है।
तब बाबा फरीद ने कहा मैंने तुम्‍हें जवाब दिया, कुछ समझ में आया? उस आदमी ने कहा, मेरी कुछ समझ में नहीं आया। नारियल से और मेरे जवाब का क्‍या संबंध है? मेरे सवाल का क्‍या संबंध है। बाबा शेख फरीद ने कहा, यह नारियल भी रख दो, कुछ फोड़ना-फाड़ना नहीं है। मैं तुमसे यह कहा रहा हूं। कि एक कच्‍चा नारियल है, जिसकी गिरी और खोल अभी आपस में जुड़ी हुई है। अगर तुम उसकी खोल को चोट पहुंचाओगे तो उसकी गिरी टुट जायेगी। फिर एक सुखा नारियल है। सूखे नारियल और कच्‍चे नारियल में फर्क ही क्‍या है? एक छोटा सा फर्क है कि सूखे नारियल की गिरी सिकुड़ गई है भीतर और खोल से अलग हो गई है। गिरी और खोल के बीच में एक फासला, एक डिस्‍टेंस हो गया है। एक दूरी हो गई है। अब तुम कहते हो कि इसकी हम खोल तोड़ देंगे तो गिरी बच सकती है। तो मैंने तुम्‍हारे सवाल का जवाब दे दिया।
मैं फिर भी नहीं समझा, आपने जो कहा है। तब बाबा फरीद ने कहा जाओ मरो और समझो। इसके बिना तुम समझ नहीं सकते। लेकिन तब भी तुम समझ नहीं पाओगे, क्‍योंकि तब तुम बेहोश हो जाओगे। खोल और गिरी एक दिन अलग होंगे,लेकिन तब तुम बेहोश हो जाओगे। अगर समझना है तो अभी खोल और गिरी को अलग करना सिख लो। अभी मैं भी जिंदा हूं। और अगर खोल और गिरी अलग हो गये तो समझना मोत खत्‍म हो गई। वह फासला पैदा होते ही हम जानते है कि खोल अलग,गिरी अलग। अब खोल टूट जायेगी तो भी में बचूंगा। तो भी मेरे टूटने का कोई सवाल नहीं है, मेरे मिटने का कोई सवाल नहीं है। मृत्‍यु घटित होगी, तो भी मेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकेगी। मेरे बाहर ही घटित होगी। यानी वही मरेगा जो मैं नहीं हूं, जो मैं हूं वह बच जायेगा।
ध्‍यान या समाधि का यही अर्थ है कि हम अपनी खोल और गिरी को अलग करना सीख जाएं। वे अलग हो सकते है। क्‍योंकि वे अलग है, वे अलग-अलग जाने जा सकते है। दोनों का स्‍वभाव भिन्‍न है ये कुदरत को एक चमत्‍कार ही है कि दोनों कैसे मिले है। एक सूक्ष्‍म है एक स्‍थूल है।
इसलिए ध्‍यान को मैं कहता हूं, स्‍वेच्‍छा से मृत्‍यु में प्रवेश, बालेंटरी एन्‍ट्रेंस इनटू डेथ। अपनी ही इच्छा से मौत में प्रवेश। और जो आदमी अपनी इच्‍छा से मौत में प्रवेश कर जाता है, वह मौत का साक्षात्‍कार कर लेता है। कि यह रही मौत और मैं अभी भी हूं।
–ओशो मैं मृत्‍यु सिखाता हूं, प्रवचन—2, संस्करण—1991,

31 August 2012

स्टीव जॉब्स की सफलता के मंत्र!

स्टीव जॉब्स की जिंदगी ने दुनिया भर में करोड़ों लोगों को प्रभावित किया है। उनके बातचीत करने का ढंग हो या प्रस्तुतिकरण की बात हो या फिर किसी भी उत्पाद को देखने और मार्केट करने का ढंग हो, सबकुछ बिलकुल अलग सोच लिए होता था। इसी अलग सोच ने उन्हें स्टीव जॉब्स बनाया। आइए जानते हैं कि स्टीव जॉब्स की सफलता के मूलमंत्र क्या थे।

वही काम करें जिससे आपको प्यार हो : स्टीव के अनुसार आप अगर अपने काम से प्यार करते हैं तब अच्छा है। दुनिया भर में कई लोग ऐसे हैं जो ऐसा काम कर रहे हैं जो उन्हें दिल से पसंद नहीं। अगर दुनिया भर में ऐसा हो जाए कि जिसे जो काम पसंद है वही करे तब दुनिया ही बदल जाएगी।

दुनिया को बताओ कि आप कौन हो : स्टीव के अनुसार दुनिया को पता चलना चाहिए कि आप कौन हैं और दुनिया को बदलने का माद्दा आपमें नहीं होगा तब तक दुनिया आपको नहीं पहचानेगी।

सभी क्षेत्रों में संबंध जोड़ें : जॉब्स ने अपने जीवनकाल में विभिन्न विषयों का अध्ययन किया। उन्होंने कैलिग्राफी भी सीखी और विभिन्न प्रकार के डिजाइन्स का अध्ययन किया। इतना ही नहीं उन्होंने हॉस्पिटेलिटी के क्षेत्र में भी हाथ आजमाए और उसका ज्ञान लिया। यह ज्ञान उन्हें बाद में काम भी आया।

हृष्ठ
मना करना सीखें : स्टीव ने अपनी जिंदगी में मना करना खूब सीखा था और इसका फायदा भी उन्हें मिला था। जब वे 1997 में वापस एप्पल में आए थे तब कंपनी के पास 350 उत्पाद थे। मात्र दो वर्षों में उन्होंने उत्पादों की संख्या कम करके 10 कर दी। 10 उत्पादों पर ध्यान केंद्रित किया और सफलता भी पाई।

ग्राहकों को अलग तरह का अनुभव दो : स्टीव मानते थे कि जब तक आप अपने ग्राहकों को अलग तरह का अनुभव नहीं देंगे, वे आपके उत्पादों की तरफ आकर्षित बिलकुल भी नहीं होंगे। यही कारण था कि उन्होंने एप्पल स्टोर्स को कुछ अलग तरह का बनाया। जहा पर ग्राहकों के लिए अलग तरह का अनुभव था और एप्पल कंपनी के प्रति लोगों का भावनात्मक लगाव हो गया था।

अपनी बात रखने में पीछे न रहें : स्टीव के अनुसार अगर आपके पास अच्छे आइडियाज है और आप इसे सभी के सामने रख नहीं पाए तब ऐसे आइडियाज का क्या काम। स्टीव अपनी बात प्रेजेंटेशन के दौरान रखते थे और केवल अपनी बात नहीं रखते थे बल्कि प्रेजेंटेशन के माध्यम से वे कई तरह की बातें बताते थे जिससे प्रेरणा भी मिलती थी।

सपने बेचें...उत्पाद नहीं : स्टीव हर दम यही कहते थे की अपने ग्राहकों को उत्पाद नहीं सपने बेचो। उनके अनुसार आपके ग्राहकों को आपके उत्पाद के बारे में कोई मतलब नहीं है, उन्हें उनकी आशाओं और आकांक्षाओं से मतलब है और अगर आपने उनके सपनों को उत्पाद से जोड़ा तभी आपको सफलता मिलेगी।

अगाथा क्रिस्ट्री... जासूसी दुनिया की महारानी

अगाथा क्रिस्ट्री जासूसी दुनिया की महारानी... माना जाता है अब तक उनसे बढिय़ा मिस्ट्री राइटर कोई नहीं हुआ। लाजवाब लेखनी, जबरदस्त सस्पेंस, कोई भी अनुमान न लगा सके कि अंत किस तरह का होगा?
तो अगाथा क्रिस्ट्री यह कैसे कर पाती थीं? कैसे वे अपने हर उपन्यास में पाठकों के लिए एक चुनौती बनकर उभरती थीं?
क्या कोई खास तरीका था उनके पास या फिर कोई जादू की छड़ी थी कि वे हर बार इंसानी फितरत को, मानव मनोविज्ञान को घनचक्कर बना देती थीं।
जी हां, उनका एक खास तरीका था उपन्यास लिखने का... अब यदि आप किसी चमत्कारिक तरीके की उम्मीद लेकर बैठे हैं, तो ऐसा भी नहीं है।
वे चीजों को उल्टे से शुरू करती थीं। नजरिया साफ रखके कि क्या लिखना है। उनका नजरिया बिलकुल साफ रहता था, वे चीजों को तोड़कर देखती थीं। स्वभावत: हम लोग, सामान्य इंसान आदर्शवादी तरीके से शुरू करता है। जड़ पर शुरू में ध्यान नहीं देता। आज तक चैनल का भी उदाहरण है। जब वह लांच हुआ था, तो उसने जड़ को साधा था। सीधे काम की बात करो, बिना किसी लटके झटके के...। जी टीवी वहीं से फीका पडऩा शुरू हो गया था।
तो अगाथा ने अपनी राइटिंग स्किल के बारे में भी लिखा है कि वे कैसे लिखती हैं, कैसे अपना माइंडसैट करती हैं? किस चीज पर पहले फोकस करती हैं?
शार्ट में बताऊं तो वे पहले कैरेक्टर डेवलप करती थीं उसके बाद प्लॉट पर ध्यान देती थीं। उसके बाद अन्य दूसरी चीजों पर जाती थीं।
यह मूल आर्टिकल इंग्लिश में हैं, लीजिए तफसील से इसे पढि़ए... और समझिए की नींव पर ही पहले ध्यान देना पड़ता है बाहरी रंगरोगन तो बाद की बात है।
यह आर्टिकल इस वेबसाइट http://www.christiemystery से लिया गया है।  यह अगाथा की संभवत: ऑफिशियल वेबसाइट है, जिसमें उनसे जुड़ी दीगर चीजें और संभवत: उपन्यास भी ऑनलाइन रीडिंग के लिए मौजूद है।
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Agatha Christie - Her Method of Writing



What process did Agatha Christie go through to write her books?

How did she develop her plots and characters?
And does the language she uses in her books explain why they are so compelling that you can't put them down?
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Character Development
Plot Development
How She Wrote
Her Language & The Agatha Christie Code






In writing her first novel, Agatha Christie looked around for inspiration for her characters. She initially started to base her murderer on an acquaintance who lived nearby, but even though she considered it at some length, she could not see the man in question ever murdering anyone. Agatha therefore decided once and for all not to use real people as inspiration, and that she must create her characters for herself. She started looking out for people in trams, trains and restaurants who could act as her starting point, and this worked well.
Agatha Christie tried again later on in her writing career to incorporate a close friend, Belcher, into one of her stories. He was badgering her to be the murderer in the book she was writing, The Man in the Brown Suit. She found this incredibly difficult, and it was only when she gave the character a different name, Sir Eustace Pedler, that his character started to develop - even though he did use some of Belcher’s phrases and anecdotes.

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Agatha Christie Plot Development
Agatha Christie used to start her books from the murder. She would first decide on the method of murder, the murderer and the motive. She would then consider the other suspects and their motives. Finally, she would turn her attention to the clues and red herrings. She was always wary of putting too many false clues into the plot, because with so many things to unravel the book would be not only difficult to solve but also difficult to read.
Agatha admits that she often thought out the plots some time previously to actually writing the book, as plots came to her at such odd moments: as she walked along a street, or examining a hat shop with particular interest. She would suddenly discover a “neat way of covering up the crime so that nobody would see the point”. Whilst all the practical details were still to be sorted out, and the characters had to creep slowly into her consciousness, the plot often came out of the blue, and was jotted down in her notebook. However she then admits that she would invariably lose the notebook!
Christie usually had about 5 or 6 notebooks on the go at once and used to make notes in them of ideas that struck her, notes about some poison or drug, or a clever swindle that she had read about in the newspaper. Although sometimes going back through her notebooks she couldn’t remember what the plot sketch was all about, it then might spark something else.
Other plots just stayed with her, teased her mind, and require her to think about them and play around with them. One such plot was The Murder of Roger Ackroyd, which played on her mind for along time before she could get the detail fixed. In leisure moments, bits of her story would rattle around her head, often making her absent-minded at home.

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Agatha Christie How She Wrote
In her autobiography, Agatha Christie admits to never really having a place or room which was specifically to write in. All she said she needed was a steady table and a typewriter, quite often just the dining room table.
Her family would usually notice a time of approaching activity, recognising the signs when she was broody and urging her to lock herself away in a room and get busy.

Agatha found that the effort involved in actually typing or writing helped her keep to the point. The temptation when using a Dictaphone was to repeat the same thing in a slightly different way, which destroyed the smooth flow of the writing. By about 1930, she had begun to write straight onto her typewriter, although she still used to do the beginning chapters longhand.
She says that there was always a terrible three or four weeks which had to be got through when she first started to write a book. In her autobiography, she says there is no agony like it: such misery and despair, such inability to do anything in the least creative – a feeling of paralysed hopelessness. Then suddenly, she found she would begin to function again, know that “it” was coming and that the mist was clearing.
Independent analysis of Agatha Christie's notebooks by university researchers, showed the pace at which she appeared to write. In one section she wrote fourteen pages, then she stuck a line through it, and the next section was then a perfectly written section without crossings-out; it was as if all her thoughts had clicked into place, and she had only then managed to get it down on paper.
During the Second World War, she decided to start writing two books at once. This was because when writing just one book, she found a danger of it going stale. When this happened, she would have to put it aside and get on with other things. However during the war, there were no other things to do, with few social distractions as most people rarely ever went out in the evenings. In addition, she said that she never found any difficulty writing during the war as she was able to cut herself off into a different compartment in her mind and live in the book with the characters.
In her autobiography, Agatha Christie talks about how strange it feels to have a book growing inside you, building up all the time. In the case of Absent in the Spring (writing as Mary Westmacott), this process took 6 or 7 years, and then suddenly it all fell into place – the characters were already there, waiting in the wings, ready to come onto the stage when their cues were called. Suddenly, she just had to write the book, and she wrote it in just three days. As soon as she had finished the first chapter, she wrote the last, so concerned that any interruption would disturb her train of thought. She took a day off from work, and continued to write, and then at the end of the third day, when the book was complete, she slept for nearly 24 hours straight through, completely exhausted.

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Agatha Christie Her Language & The Agatha Christie Code
Agatha Christie believed that economy of wording was particularly important in detective stories; that the reader did not want to heard the same thing repeated three or four times.
She also uses very simple everyday language, and repeats it, rather than trying to introduce new words and phrases. She also relies heavily on dialogue throughout her books. In addition, the solution often depends upon the reader’s interpretation of something that a character says. Therefore by keeping her dialogue very simple and straightforward, and not challenging the reader with the vocabulary, she leaves us free to focus on the plot.
The simplicity of the language is one of the key points raised in the debate regarding “The Agatha Christie Code”, an ITV documentary backed by research undertaken by a number of universities.
The research team also analysed each of Christie's books for its word length, frequency and sentence structure. They found that all of her books are very similar in style, using the same number of letters in a word on average, and approximately same number of words in a sentence. This is true for books written at the beginning of her career as well as books at the end of her career; it was as if she found a successful formula which captivated her readers and stuck with it.
The researchers also found that there was a level of repetition of key concepts in her words within a small space. When Agatha is getting a concept across, she repeats key words and words which are similar in meaning in rapid succession and in a condensed space. This theory is also backed up by believers of neurolinguistic programming, which is how language affects the mind and how the words can have an affect on how we think and feel. By repeating words at least 3 times in a paragraph, it enables the reader to become convinced about something.
In addition, the programme claims that a person’s conscious mind has a very limited focus, and can only focus on between five and nine things at one time. Once there are more than nine things to focus on, the conscious mind can’t continue to track them all, and so the person literally goes into a hypnotic trance. The Agatha Christie Code claims that Agatha often uses this by using more than nine characters, and by having more than nine plot lines taking place at any one time. As the reader’s mind gets overloaded, they start to begin really experiencing the book, feeling the book, and getting lost in it. And because feelings are infinitely more memorable than thoughts, people associate the feelings with Agatha Christie’s name and also with her novels.
Finally, the research team discovered that Agatha Christie very precisely controls the speed at which we read her books, by changing the level of descriptive passages. There are more descriptive passages at the beginning of her book than at the end, which has the effect that we read more quickly towards the end of her books... literally we are rushing towards the end to see who did it!

30 August 2012

संतों में कोहिनूर

महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने मुझसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन से बारह लोग है—मेरी दृष्‍टि में—जो सबसे चमकते हुए सितारे है? मैंने उन्‍हें सूची दी: कृष्‍ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर,नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्‍ण, कृष्‍ण मूर्ति। सुमित्रानंदन पंत ने आंखे बंद कर लीं, सोच में पड़ गए…..।
सूची बनानी आसान भी नहीं है—क्‍योंकि भारत का आकाश बड़े नक्षत्रों से भरा है। किसे छोड़ो और किसे गिनों? वे प्‍यारे व्‍यक्‍ति थे—अति कोमल अति माधुर्यपूर्ण स्‍त्रैण…..। वृद्धावस्‍था तक भी उनके चेहरे पर वैसी ही ताजगी बनी रही जैसी बनी रहनी चाहिए। वे सुंदर से सुंदरतम होते गये थे….। मैं उनके चेहरे पर आते जाते भाव पढ़ने लगा। उन्‍हें अड़चन भी हुई थी। कुछ नाम जो स्‍वभावत: होने चाहिए थे, नहीं थे। राम का नाम नहीं था। उन्‍होंने आंखे खोली और मुझसे कहा: राम का नाम छोड़ दिया है आपने। मैंने कहा: मुझे बारह की ही सुविधा हो चुनने की, तो बहुत नाम छोड़ने पड़े। फिर मैंने बारह नाम ऐसे चुने है। जिनको कुछ मौलिक देन है। राम की कोई मौलिक देन नहीं है। कृष्‍ण की मौलिक देन है। इसलिए हिंदुओं ने भी उन्‍हें पूर्णावतार कहा है राम को नहीं कहां।
उन्‍होंने फिर मुझसे पूछा: तो फिर ऐसा करें सात नाम मुझे दें। अब बात और कठिन हो गई थी। मैंने उन्‍हें सात नाम दिये: कृष्‍ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, शंकर, गोरख, कबीर। उन्‍होंने कहा आपने जो पाँच नाम छोड़ दिये, वे किस आधार पर। मैंने कहां नागार्जुन बुद्ध में सम्‍माहित है। जो बुद्ध में बीज-रूप था, उसी को नागार्जुन ने प्रगट किया है। नागार्जुन ने प्रगट किया है। नागार्जुन छोड़े जा सकते है। और जब बचाने की बात हो तो वृक्ष छोड़े जा सकते है। बीज नहीं छोड़े जा सकते। क्‍योंकि बीज से फिर वृक्ष हो जाएगा। जहां बुद्ध पैदा होंगे वहां सैकडों नागार्जुन पैदा हो जाएंगे, लेकिन कोर्इ नागार्जुन बुद्ध को पैदा नहीं कर सकता। बुद्ध तो गंगोत्री है, नागार्जुन तो फिर गंगा के रास्‍ते पर आये हुए एक तीर्थ स्‍थल है—प्‍यारे है, अगर छोड़ना हो तो तीर्थ स्थल छोड़े जा सकते है। गंगोत्री नहीं छोड़ी जा सकती है।
ऐसे ही कृष्‍ण मूर्ति भी बुद्ध में समा जाते है। रामकृष्‍ण, कृष्‍ण में सरलता से लीन हो जाते है। मीरा, नानक, कबीर में लीन हो जाते है। जैसे कबीर की ही साखायें है। जैसे कबीर में जो इक्कठ्ठा था, वह आधा नानक में प्रगट हुआ और आधा मीरा में। नानक में कबीर का पुरूष रूप प्रगट हुआ है—इसलिए सारा सिक्‍ख धर्म क्षत्रिय का धर्म हो गया, योद्धा का, तो आर्श्‍चय नहीं है। मीरा में कबीर का स्‍त्रैण रूप प्रगट हुआ है—इसलिए सारा माधुर्य, सारी सुगंध सारा सुवास, सारा संगीत,मीरा के पैरों में धुँघरू बन कर बजा है। मीरा के इकतारे पर कबीर की नारी गाई है, नानक में कबीर का पुरूष रूप बोला है। दोनों कबीर में समाहित हो जाते है।
इस तरह मैंने सात की सूची बनाई। अब उनकी उत्‍सुकता बहुत बढ़ गयी थी। उन्‍होंने कहा: और अगर पाँच की सूची बनाई जाए तो। मैंने कहां काम मेरे लिए कठिन हो गया है। मैंने यह सूची उन्‍हें दी: कृष्‍ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, गोरख….। क्‍योंकि कबीर को गोरख में लीन किया जा सकता है। गोरख मूल है। गोरख नहीं छोड़े जा सकता। और शंकर तो कृष्‍ण में सरलता से लीन हो जाते है। कृष्‍ण के ही एक अंग की व्‍याख्‍या है, कृष्‍ण के ही एक अंग का दार्शनिक विवेचन है।
तब तो वे बोले: बस एक बार और….। अगर चार ही रखने हों।
तो मैंने कहां:’’ कृष्‍ण, पतंजलि, बुद्ध, गोरख….। क्‍योंकि महावीर बुद्ध से बहुत भिन्‍न नहीं है। थोडे ही भिन्‍न है। जरा-सा ही भेद है। वह भी अभिव्‍यक्‍ति का भेद है। बुद्ध की महिमा में महावीर की महिमा लीन हाँ सकती है।
वे कहने लगे एक बार और …..। अब तीन व्‍यक्‍ति चुनें।
तब मैंने कहां: अब असंभव है। अब इन चार में से किसी को भी छोड़ा नहीं जा सकता। मैंने उन्‍हें कहां: जैसे चार दशाएं है, ऐसे ये चार व्‍यक्‍तित्‍व है। जैसे काल और क्षेत्र के चार आयाम है, ऐसे ये चार आयाम है। जैसे परमात्‍मा की हमने चार भुजाओं सोची है, ऐसी ये चार भू जाएं है। ऐसे तो एक ही है, लेकिन उस एक की चार भुजाएं है। अब इनमें से कुछ छोड़ना तो हाथ काटने जैसे है। यह मैं न कर सकूंगा। अभी तक में आपकी बात मानकर चलता रहा, संख्‍या कम करता रहा। क्‍योंकि अभी तक जो अलग करना पडा वह वस्‍त्र था, अब अंग तोड़ने पड़ेंगे। अंग-भंग मैं न कर सकूंगा। ऐसी हिंसा आप न करवायें।
वे कहने लगे: आपने महावीर को छोड़ दिया, गोरख को नहीं?
गोरख को नहीं छोड़ सकता हूं, क्‍योंकि गोरख से इस देश में एक नया ही सूत्रपात हुआ है, महावीर से न कोई नया नहीं हुआ है। वे अपूर्व पुरूष है। मगर जो सदियों से कहा गया था, उन्‍होंने उसकी पुनरूक्ति की है। वे किसी यात्रा का प्रांरभ नहीं है। वे किसी नया शृंखला की पहली कड़ी नहीं है, बल्‍कि अंतिम कड़ी है।
गोरख एक शृंखला की पहली कड़ी है। उनसे नए प्रकार के धर्म का जन्‍म हुआ, अविभाव हुआ। गोरख के बिना न तो कबीर हो सकते थे, न नानक हो सकते थे। न दादू, ना वाजिद, न फरिद, न मीरा, गोरख के बिना ये कोर्इ भी न हो सकते थे। इन सब के मौलिक आधार गोरख में है। फिर मंदिर बहुत ऊँचा उठा। मंदिर पर बड़े स्‍वर्ण कलश चढ़े…..। लेकिन नींव का पत्‍थर नींव का पत्‍थर है। और स्‍वर्ण कलश दूर से दिखाई दे जाते है। लेकिन नीव के पत्‍थर से ज्‍यादा मूल्‍यवान नहीं हो सकते है। और नींव भित्‍तियों सारे शिखर…। शिखर की पूजा होती है, बुनियाद के पत्‍थरों को तो लोग भूल ही जाते है। ऐसे ही गोरख भी भूल गए थे।
लेकिन भारत की सारी संत-परंपरा गोरख की ऋणी है। जैसे पतंजलि के बिना भारत में योग की कोई संभावना न रह जाएगी; जैसे बुद्ध के बिना ध्‍यान की आधारशिला उखड जायेगी। जैसे कृष्‍ण के बिना प्रेम की अभिव्‍यक्‍ति को मार्ग न मिलेगा—ऐसे गोरख के बिना उस परम सत्‍य को पाने के लिए विधियों की मनुष्‍य के भीतर अंतर खोज के लिए उतना शायद किसी ने भी नहीं किया है। उन्‍होंने इतनी विधियां दी की अगर विधियों के हिसाब से सोचा जाए तो गोरख सबसे बड़े आविष्कारक है। इतने द्वार तोड़े मनुष्‍य के अंतरतम में जाने के लिए, इतने द्वार तोड़े कि लोग द्वारों में उलझ गये।
इसलिए हमारे पास एक शब्‍द चल पडा है—गोरख को तो लोग भूल गए—गोरखधंधा शब्‍द चल पडा है। उन्‍होंने इतनी विधियों दीं की लोग उलझ गये की कौन ठीक और कौन गलत, कौन सी करे और कौन सी न करे। अब कोई किसी चीज में उलझा हो तो हम कहते है, क्‍या गोरख धंधे में उलझ गया है।
गोरख के पास अपूर्व व्‍यक्‍तिव था, जैसे आइंस्‍टीन के पास व्‍यक्‍तित्‍व था। जगत के सत्‍य को खोजने के लिए जो पैने से पैने उपाय अल्बर्ट आइंस्‍टीन दे गया, उसके पहले किसी ने भी नहीं दिये थे। हां,अब उनका विकास हो सकता है, उन पर और धार रखी जा सकेगी। मगर जो प्रथम काम था वह आइंस्टीन ने किया है। जो पीछे आयेंगे वे नंबर दो होंगे। वे अब प्रथम नहीं हो सकते। राह पहली तो आइंस्‍टीन ने तोड़ी, अब इस राह को पक्‍का करनेवाले, मजबूत करने वाले मील के पत्‍थर लगाने वाले, सुंदर बनानेवाले, सुगम बनानेवाले बहुत लोंग आयेंगे। मगर आइंस्‍टीन की जगह अब कोर्इ भी नहीं ले सकता। ऐसी ही घटना अंतर जगत में गोरख के साथ घटी है।
लेकिन गोरख को लोग भूल गये, गोरख जिस खादन के हीरे है, वह तो अनगढ़ होता है, कच्‍चा होता है। अगर गोरख और कबीर बैठे हो तो तुम कबीर से प्रभावित होओगे,गोरख से नहीं। क्‍यो गोरख तो खादन से निकला हीरा है और कबीर—जिन पर जौहरियों ने खूब मेहनत की, जिन पर खूब छेनी चली है। जिनको खूब निखार दिया गया है।
यह तो तुम्‍हें पता है ना कि कोहिनूर हीरा जब पहली दफा मिला तो जिस आदमी को मिला था उसे पता भी नहीं था कि कोहिनूर है। उसने बच्‍चों को खेलने के लिए दे दिया था, समझकर की कोई रंगीन पत्‍थर है। गरीब आदमी था। उसके खेत से बहती एक छोटी से नदी की धार में कोहिनूर मिला था। महीनों उसके घर पडा रहा। कोहिनूर बच्‍चे खेलते रहे, फेंकते रहें इस कोने से उस कोने, आँगन में पडा रहा….।
तुम पहचान न पाते कोहिनूर को उसका वज़न तीन गुना था आज को कोहिनूर से। उस पर धार रखी गई, निखार किये गये काटे गए, उस के पहलु उभारे गये, लेकिन दाम करोड़ों गुना ज्‍यादा हो गया। क्‍योंकि गोरख तो अभी गोलकोंड़ा की खादन से निकले कोहिनूर हीरे है। कबीर पर धार रखी गई है। जौहरी ने मेहनत करी है….कबीर पहचाने जा सकते है।
गोरख का नाम भूल गए है। बुनियाद के पत्‍थर भूल जाते है।
ओशो—मरौ है जोगी मरौ, (प्रवचन-1)

वाचस्‍पति और भामति

वाचस्‍पति मिश्र का विवाह हुआ। पिता ने आग्रह किया, वाचस्‍पति की कुछ समझ में नहीं आया। इसलिए उन्‍होंने हां भर दी। सोचा, पिता जो कहते होंगे, ठीक ही कहते होंगे। वाचस्‍पति लगा था परमात्‍मा की खोज में। उसे कुछ और समझ में नहीं आ रहा था। कोई कुछ भी बोले,वह परमात्‍मा की ही बात समझता था। पिता ने वाचस्‍पति को पूछा, विवाह करोगे? उसने कहा हां।
उसने शायद कुछ और सुना होगा, की परमात्‍मा से मिलोंगे। जैसा की हम सब के साथ होता है। जो धन की खोज में लगा है उससे कहो, धर्म खोजोंगे? वह समझता है,शायद कह रहे है, धन खोजोंगे, उसने कहा, हां। हमारी जो भीतर खोज होती है। वहीं हम सुन पाते है। वाचस्‍पति ने शायद सुना; हां भर दी।
फिर जब घोड़े पर बैठ कर ले जाया जाने लगा, तब उसने पूछा कहां ले जा रहे हो? उसके पिता ने कहा, पागल तूने हां भरी थी। विवाह करने चल रहे है। तो फिर उसने न कहना उचित न समझा; क्‍योंकि जब हाँ भर दी थी और बिना जाने भर दी थी, तो परमात्‍मा की मर्जी होगी।
वह विवाह करके लौट आया। लेकिन पत्‍नी घर में आ गई, और वाचस्‍पति को ख्‍याल ही न रहा। रहता भी क्‍या। न उसने विवाह किया था, न हां भरी थी। वह अपने काम में ही लगा रहा। वह ब्रह्म सूत्र पर एक टीका लिखता रहा। वह बारह वर्ष में टीका पूरी हुई। बारह वर्ष तक उसकी पत्‍नी रोज सांझ दीपक जला जाती। रोज सुबह उसके पैरों के पास फूल रख जाती दोपहर उसकी थाली सरका देती। जब वह भोजन कर लेता तो चुपके से उसकी थाली हटा ले जाती। बारह वर्ष के लम्‍बे समय तक अपनी पत्‍नी का वहां होने का वाचस्‍पति को पता ही नहीं चला। की वह वहां है। पत्‍नी ने कोई उपाय नहीं किया कि पता चल जाए; बल्‍कि सब उपाय किए कि कहीं भूल-चूक से पता न चल जाए, क्‍योंकि उनके काम में बाधा न पड़े।
बारह वर्ष जिस पूर्णिमा की रात वाचस्‍पति का काम आधी रात को पूरा हुआ और वाचस्‍पति उठने लगे, तो उनकी पत्‍नी ने दीया उठाया—उनको राह दिखाने के लिए उनके बिस्‍तर तक पहली दफा बारह वर्ष में, कथा कहती है। वाचस्‍पति ने अपनी पत्‍नी का हाथ देखा। क्‍योंकि बारह वर्ष में पहली दफा काम समाप्‍त हुआ था। अब मन बंधा नहीं था किसी काम में। हाथ देखा, चूड़ियाँ देखीं, चूड़ियों की आवज सूनी, लौट कर पीछे देखा और कहा, स्‍त्री, इस आधी रात अकेले मेरी कुटिया में। तू कौन है? यहां कैसे आई। द्वारा दरवाजे तो सब बंध है। तू कहां से आई है? इतनी रात को एक पराये मर्द के कमरे में। चल तू जहां से आई है मैं तुझे वहां पहुंचा दूँ।
उसकी पत्‍नी ने कहा: शायद आप भूल गये होगें। बहुत काम था। बाहर वर्ष से आप इस काम में लगे हो। आप आपने काम में इतना तल्लीन हो। आपके आस पास क्‍या घट यहाँ है, कोन आता है। इसकी खबर तक नहीं है। बारह वर्ष पहले आप ख्‍याल करो, शायद याद आ जाये। आप मुझे पत्‍नी की तरह घर लेकर आये थे। तब से मैं यहीं हूं।
वाचस्‍पति रोने लगा। उसने कहा, यह तो बहुत देर हो गई। क्‍योंकि मैंने तो प्रतिज्ञा कर रखी है कि जिस देन यह ग्रंथ पूरा हो जायेगा, उसी दिन घर का त्‍याग कर दूँगा। तो यह तो मेरे जाने का वक्‍त हो गया। भोर होने के करीब है; तो मैं तो जा रहा हूं। पागल, तूने पहले क्‍यों नहीं बताया। थोड़ा भी तू इशारा कर सकती थी। लेकिन अब बहुत देर हो गई है।
वाचस्‍पति की आंखों में आंसू देख कर पत्‍नी ने अपना सर उनके चरणों में रख दिया। और कहने लगी: जो भी मुझे मिल सकता था। वह इन आंसुओं से मिल गया। इससे सुंदर और क्‍या हो सकता है। यही आपकी पूर्णता एक दिन मुझे भी पूर्ण कर देगा। इससे कीमती और दुनियां में कुछ और हो भी नहीं सकता हे। अब मुझ कुछ भी नहीं चाहिए। आप निश्‍चिंत जाएं। और मैं क्या पा सकती थी? मैं धन्‍य हुई, मुझे बहुत कुछ मिल गया। आप दिल पर बोझ ले कर मत जाना। सब निरझरा हो कर जाना।
वाचस्‍पति ने अपने ब्रह्म सूत्र की टीका का नाम ‘’ भामति’’ रखा है। भामति को कोई संबंध टीका से नहीं है। ब्रह्म सूत्र से कोई लेना देना नहीं है। यह उसकी अपनी पत्‍नी का नाम था। यह कह कर की मैं कुछ और तेरे लिए कर नहीं सकता हूं। लेकिन मुझे लोग चाहे भूल जाये। तुझे न भूले, इसलिए भामति नाम देता हूं। अपने ग्रंथ को। वाचस्‍पति को बहुत लोग भूल गए है; भामति को भूलना मुश्‍किल है। भामति लोग पढ़ते है। अद्भुत टीका है। ब्रह्म सूत्र की वैसी दूसरी टीका नहीं है। उस का नाम भामति है।
फेमिनिन मिस्‍ट्रि इस स्‍त्री के पास होगी। और मैं मानता हूं कि उस क्षण में उसने वाचस्‍पति को जितना पा लिया होगा, उतना हजार वर्ष चेष्‍टा करके कोई स्‍त्री किसी पुरूष को नहीं पा सकती । उस क्षण में, उस क्षण‍ में वाचस्‍पति जिस भांति एक हो गया होगा इस सत्री के ह्रदय से, वैसा कोई पुरूष को कोई स्‍त्री कभी नहीं पा सकती । क्‍योंकि फेमिनिन मिस्ट्रि वह जो रहस्‍य है। वह अनुपस्‍थित का है।
छुआ क्‍या प्राण को वाचस्‍पति के? कि बारह वर्ष, और उस स्‍त्री ने पता भी न चलने दिया कि मैं यहां हूं। और वह रोज दिया उठाती रही होगी। जलती रही होगी। कपड़े धोती रही होगी स्‍नान का पानी खर देती होगी। भोजन परोस देती होगी। पर अपने होने का वाचस्‍पति को अहसान तक ने होने दिया, बहार ही नहीं वह अंदर के अहं को भी देखती रही है। कि में हूं। वाचस्‍पति ने कहा की आज तक तेरा हाथ भी मुझे क्‍यों न दिखाई दिया क्‍या में इतना अंधा हो गया था।
भामति ने कहां की अगर मेरा हाथ भी आपको दिखाई पड़ जाता, तो मेरे प्रेम में कमी साबित न हो गई होती। मैं प्रतीक्षा कर सकती थी, कि आपको मेरे होने पता भी ने चले में अपने में इतनी विलय होकर आपके कमरे में आती थी कि मेरी उर्जा भी आपको छू नहीं पाती थी।
तो जरूरी नहीं कि कोई स्‍त्री स्‍त्रैण रहस्‍य को उपलब्‍ध ही हो। यह तो लाओत्‍से ने नाम दिया, क्‍योंकि यह नाम सूचक है और समझा सकता है। पुरूष भी हो सकता है। असल में आस्‍तित्‍व के साथ तादात्म्य उन्‍हीं को होता है। जो इस भांति प्रार्थना पूर्ण को उपलब्‍ध होते है।
इस स्‍त्रैण रहस्‍यमयी का द्वार स्‍वर्ग और पृथ्‍वी जन्‍मे और चाहे स्‍वर्ग, इस आस्‍तित्‍व की गहराई में जो रहस्‍य छिपा हुआ है। उससे ही सबका जन्‍म होता है। इसलिए मैंने कहा, जिन्‍होंने परमात्‍मा को मदर, मां की तरह देखा,दुर्गा या अंबा की तरह देखा, उनकी समझ परमात्‍मा को पिता की तरह देखने से ज्‍यादा गहरी है। अगर परमात्‍मा कहीं भी है। तो वह स्‍त्रैण होगा। क्‍योंकि इतने बड़े जगत को जन्‍म देने का क्षमता पुरूष में नहीं है। इतने विराट चांद-तारे जिससे पैदा होते हों, उसके पास गर्भ चाहिए। बिना गर्भ के यह संभव नहीं है।
ओशो ताओ उपनिषद—1, प्रवचन -18

तीर्थ - अल्‍कुफा एक रहस्‍य

तीर्थ शब्‍द का अर्थ होता है—घाट। उसका अर्थ होता है, ऐसी जगह जहां से हम उस अनंत सागर में उतर सकते है। जैनों का शब्‍द तीर्थकर तीर्थ से बना है, उसका अर्थ है तीर्थ को बनानेवाला। असल में उस को ही तीर्थ कहां जा सकता है। तीर्थकर कहा जा सकता है जिसने ऐसा तीर्थ निर्मित किया हो जहां साधारण जन खड़े होते, पाल खोलते, ऐसे ही यात्रा पर संलग्न हो जाए। अवतार न कहकर तीर्थकर कहा, और अवतार से बड़ी घटना तीर्थ कर है। क्‍योंकि परमात्‍मा, आदमी में अवतरित हो यह तो एक बात है लेकिन आदमी परमात्‍मा में प्रवेश का तीर्थ बना ले, यह और भी बड़ी बात हे।
जैन, परमात्‍मा में भरोसा करनेवाला धर्म नहीं है, आदमी की सामर्थ्‍य में भरोसा करनेवाला धर्म हे। इसलिए तीर्थ और तीर्थकर का जितना गहरा उपयोग जैन कर पाए उतना कोई भी नहीं कर पाया। क्‍योंकि यहां तो कोई ईश्‍वर की कृपा पर उनको ख्‍याल नहीं है। ईश्‍वर कोई सहारा दे सकता है। इसका कोई ख्‍याल नहीं है। आदमी अकेला है, और आदमी को अपनी ही मेहनत से यात्रा करनी है।
लेकिन दो रास्‍ते हो सकते है। एक-एक आदमी अपनी मेहनत करे। पर तब शायद कभी करोड़ो में एक आदमी उपलब्‍ध हो पाएगा। लेकिन हवाओं का सहारा लेकर यात्रा बड़ी आसान होती है। तो क्‍या अध्यात्मिक हवाएँ संभव है। उसपर ही तीर्थ का सब कुछ निर्भर है। क्‍या यह संभव है कि जब महावीर जैसा एक व्‍यक्‍ति खड़ा होता है तो उसके आप-पास किसी अनजाने आयाम में कोई प्रवाह शुरू होता है। क्‍या यह किसी एक ऐसी दिशा में बहाव को निर्मित करता है कि बहाव में कोई पड़ जाए तो बह जाए, वही बहाव तीर्थ है।
इस पृथ्‍वी पर तो उसके जो निशान है वह भौतिक निशान है, लेकिन वे स्‍थान न खो जाए इसलिए उन भौतिक निशानों की बड़ी सुरक्षा की गयी है। मंदिर बनाए गए है उन जगहों पर, या पैरों के चिन्‍ह बनाए गए है उन जगहों पर यह मूर्तियां खड़ी की गई है उन जगहों पर और उन जगह को हजारों वर्षो तक वैसा का वैसा रखने की चेष्टा की गयी है। इंच भर भी वह जगह न हिल जाए, जहां घटना घटी है कभी बड़े-बड़े खज़ाने गडाए गए है आज भी उनकी खोज चलती है।
जैसे की रूस के आखिरी जार का खजाना अमरीका में कहीं गड़ा है। जो कि पृथ्‍वी का सबसे बड़ा खजाना है, और आज भी खोज चलती है। वह खजाना है, यह पक्‍का है, क्‍योंकि बहुत दिन नहीं हुए…..अभी उन्‍नीस सौ सत्रह को घटे बहुत दिन नहीं हुए। उसका इंच-इंच हिसाब भी रखा गया है कि यह कहां होगा। लेकिन डि कोड नहीं हो पा रहा है। वह जो हिसाब रखा गया है उसको समझा नहीं जा पा रहा है कि एक्‍जैक्‍ट जगह कहां है।
जैसे कि ग्‍वालियर में एक बड़ा खजाना ग्‍वालियर फेमिली का है। जिसका फेमिली के पास सारा का सारा हिसाब है, लेकिन फिर भी जगह नहीं पकड़ी जा रही है कि वह जगह कहां है। वह डि कोड नहीं हो रहा है। नक्‍शा जो है—इस तरह से सब नक्‍शे गुप्‍त भाषा में ही निर्मित किए जाते हे। अन्‍यथा कोई भी डि कोड कर लेगा। समान्य भाषा में वे नहीं लिखे जाते।
इन तीर्थों की भी पूरा का पूरा सूचन है। इसलिए जरूरी है जैसा कि आम लोग समझ लेते है। और वह आम गड़बड़ न कर पाएँ इसलिए बड़े उपाय किए जाते है। वह मैं आपको कहूं तो बहुत हैरानी होगी। जैसे जहां आप जाते है ओर आपसे कहा जाता है कि यह जगह है जहां महावीर निर्वाण को उपलब्‍ध हुए—बहुत संभावना तो यह है कि वह जगह नहीं होंगी। उससे थोड़ी हटकर वह जगह होगी जहां उनका निर्वाण हुआ। उस जगह पर तो प्रवेश उनको ही मिल सकेगा, जो सच में ही पात्र है और उस यात्रा पर निकल सकते है। एक फाल्‍स जगह, एक झूठी जगह आम आदमी से बचाने की लिए खड़ी की जाएगी। जिसपर तीर्थयात्री जाता रहेगा। नमस्‍कार करता रहेगा और लौटता रहेगा। वह जगह तो उनको ही बतायी जाएगी जो सचमुच उस जगह आ गए है। जहां से वह सहायता लेने के योग्‍य है या उनको सहायता मिलनी चाहिए। ऐसी बहुत सी जगह है।
अरब में एक गांव है जिसमें आज तक किसी सभ्‍य आदमी को प्रवेश नहीं मिल सका—आज तक अभी भी। चाँद पर आप प्रवेश कर गए लेकिन छोटे से गांव अल्‍कुफा में आज तक किसी यात्री को प्रवेश नहीं मिल सका। सच तो यह है कि आज तक यह ठीक हो सका नहीं कि वह कहां है। और वह गांव है। इसमें कोई शक-शुबहा नहीं, क्‍योंकि हजारों साल से इतिहास उसकी खबर देता है। किताबें उसकी खबर देती है। उसके नक्‍शे है।
वह गांव कुछ बहुत प्रयोजन से छिपाकर रखा गया है। और सूफियों में जब कोई बहुत गहरी अवस्‍था में होता है तभी उसको उस गांव में प्रवेश मिलता है। उसकी सीक्रेट कि है। अल्‍कुफा के गांव में उसी सूफी को प्रवेश मिलता है जो ध्‍यान में उसका रास्‍ता खोज लेता है। अन्‍यथा नहीं। उसकी की हे फिर तो उसे कोई रोक भी नहीं सकता। अन्‍यथा कोई उपाय नहीं है। नक्‍शे है, सब तैयार है, लेकिन फिर भी उसका पता नहीं लगता वह कहां हे। वह सब एक अर्थ में नक्‍शे थोड़े से झूठ है ओर भटकाने के लिए है। उन नक़्शों को जो मानकर चलेगा वह अल्‍कुफा कभी नहीं पहुंच पाएगा।
इसलिए बहुत यात्री यूरोप के पिछले तीन सौ वर्षों में सैकड़ों यात्री अल्‍कुफा को ढूंढने गए है। उनमें से कुछ तो कभी लौटें नहीं मर गय। जो लौटे वे कभी कहीं पहुंचे नहीं। वे सिर्फ चक्‍कर मारकर वापस आ गए। सब तरह से कोशिश की जा चुकी है। पर उसकी कुंजी है। और वह कुंजी एक विशेष ध्‍यान है; और उस विशेष ध्‍यान में ही अल्‍कुफा पूरा का पूरा प्रगट होता है। और वह सूफी उठता है और चल पड़ता है। और जब इतनी योग्‍यता हो तभी उस गांव से गति है। वह एक सीक्रेट तीर्थ है जो इसलाम से बहुत पुराना है। लेकिन उसको गुप्‍त रखा गया है। इन तीर्थों में भी जो जाहिर है। इन तीर्थों में भी जो जाहिर दिखाई पड़ते है, वे असली तीर्थ नहीं है। आस पास असली तीर्थ है।
जैसे एक मजेदार घटना घटी। विश्वनाथ के मंदिर में काशी में जब विनोबा हरि जनों को लेकर प्रवेश कर गए, तो कर पात्री ने कहा कि कोई हर्ज नहीं, हम दूसरा मंदिर बना लेंगे, और दूसरा मंदिर बनाना शुरू कर दिया। वह मंदिर तो बेकर हो गया। तो दूसरा मंदिर बनाना शुरू कर दिया। साधारणत: देखने में विनोबा ज्‍यादा समझदार आदमी मालूम पड़ते है कर पात्री से। असलियत ऐसी नहीं है। साधारण देखने में कर पात्री निपट पुराणपंथी, नासमझ, आधुनिक जगत और ज्ञान से वंचित मालूम पड़ते है। यह थोड़ी दूर तक सच है बात। लेकिन फिर भी जिस गहरी बात की वह ताईद कर रहे है उसके मामले में वह ज्‍यादा जानकार है।
सच बात यह है कि विश्वनाथ का मंदिर भी असली नहीं है। और वह जो दूसरा बनाएँगे वह भी असली नहीं होगा। असली मंदिर तो तीसरा है। लेकिन उसकी जानकारी सीधी नहीं दी जा सकती। और असली मंदिर को छिपाकर रखना पड़ेगा, नहीं तो कभी भी कोई भी धर्म सुधारक उसको भ्रष्‍ट कर सकता है। अभी जो विश्वनाथ का मंदिर है खड़ा हुआ, इसको तो नष्‍ट किया जा चुका है। इसमें कोई उपाय नहीं है। इसमें कोई कठिनाई नहीं है चाहे नष्‍ट कर दो।
वह जो दूसरा बनाया जा रहा है वह भी फाल्‍स है। लेकिन एक फाल्स बनाए ही रखना पड़ेगा, ताकि असली पर नजर न जाए। और असली को छिपाकर रखना पड़ेगा। विश्वनाथ के मंदिर में प्रवेश की कुंजियों है, जैसे अल्‍कुफा में प्रवेश की कुंजियों है। उसमें कभी कोई सौभाग्‍यशाली संन्‍यासी प्रवेश पाता है। उसमें कोई ग्रह स्थ कभी प्रवेश नहीं पाया और कभी पा नहीं सकता। सभी संन्‍यासी को भी उसमें प्रवेश नहीं मिल पाते है कभी कोई सौभाग्‍यशाली संन्‍यासी उसमें प्रवेश पाते है। और उसे सब भांति छिपाकर रखा जाएगा। उसके मंत्र है और जिनके प्रयोग से उसका द्वार खोलेगा, नहीं तो उसका द्वार नहीं खुले गा। उसका बोध ही नहीं होगा,उसका ख्‍याल ही नहीं आएगा।
काशी में जाकर इस मंदिर की लोग पूजा, प्रार्थना करके वापस लौट आएंगे। मगर इस मंदिर की भी अपनी एक सेंक्‍टिंटी बन गया थी। यह झूठा था, लेकिन फिर भी लाखों वर्षों से उसको सच्‍चा मानकर चला जा रहा था। उसमें भी एक तरह की पवित्रता आ गयी।
सारे धर्मों ने कोशिश की है कि उनके मंदिर में या उनके तीर्थ में दूसरे धर्म का व्‍यक्‍ति प्रवेश न करे। आज हमें बेहूदगी लगती है यह बात। हम कहेंगे इससे क्‍या मतलब है। लेकिन जिन्‍होंने व्‍यवस्‍था की थी उनके कुछ करण थे। यह करीब-करीब मामला ऐसा ही है जैसे कि ऐटमिक एनर्जी की एक लेबोरेटरी है और अगर यह लिखा हो कि यहां सिवाय ऐटमिक साइंटिस्‍ट के कोई प्रवेश नहीं करेगा। तो हमें कोई कठिनाई नहीं होगी। हम कहेंगे, बिलकुल ठीक है, बिलकुल दुरुस्त है। खतरे से खाली नहीं है दूसरे आदमी का भीतर प्रवेश करना।
लेकिन यही बात हम मंदिर और तीर्थ के संबंध में मानने को राज़ी नहीं है। क्‍योंकि हमें यह ख्‍याल ही नहीं है कि मंदिर और तीर्थ की अपनी साइंस है। और वह विशेष लोगों के प्रवेश के लिए है। आज भी एक मरीज बीमार पडा है और उसके चारों तरफ डाक्‍टर खड़े होकर बात करते रहते है। मरीज सुनता है, समझ तो कुछ नहीं आता। क्‍योंकि वह किसी खास कोड लेंग्‍वेज में बात करते है। वह लैटिन या ग्रीक शब्‍दों को उपयोग कर रहे है। यह मरीज के हित में नही है कि उस समझे। इसलिए सारे धर्मों ने अपनी कोड़ लेंग्‍वेज विकसित की थी। उसके गुप्‍त तीर्थ थे, उसकी गुप्‍त भाषाएँ थीं। उसके गुप्‍त शास्‍त्र थे। और आज भी जिनको हम तीर्थ समझ रहे है उनमें बहुत कम संभावना है सही होने की। जिनको हम शास्‍त्र समझ रहे है। उनमें बहुत कम संभावना है सही होने की।
वह जो सीक्रेट ट्रैडीशनल है, उसे तो छिपाने की निरंतर कोशिश की जाती है। क्‍योंकि जैसे ही वह आम आदमी के हाथ में पड़ती है, उसके विकृत हो जाने का डर है। और आन आदमी उससे परेशान ही होगा, लाभ नहीं उठा सकता। जैसे अगर सूफियों के गांव अल्‍कुफा में अचानक आपको प्रवेश करवा दिया जाए तो पागल हो जाएंगे। अल्‍कुफा की यह परंपरा है कि वहां अगर कोई आदमी आकस्‍मिक प्रवेश कर जाए तो पागल होकर लौटे गा—वह लौटे गा ही, इसमें किसी को कोई कसूर नहीं हे।
क्‍योंकि अल्‍कुफा इस तरह की पूरी के पूरे मनस तरंगों से निर्मित है कि आपका मन उसको झेल नहीं पाएगा। आप विक्षिप्‍त हो जाएंगे। उतनी सामथ्‍र्य और पात्रता के बिना उचित नहीं है। कि वहां प्रवेश हो। जैसे अल्‍कुफा के बाबत कुछ बातें ख्‍याल में ले लें तो और तीर्थों का ख्‍याल में आ जाएगा।
जैसे अल्‍कुफा में नींद असंभव है, कोई आदमी सो नहीं सकता। तो आप पागल हो ही जाएंगे जब तक कि आपने जागरण का गहन प्रयोग न किया हो। इसलिए सूफी फकीर की सबसे बड़ी जो साधना है वह रात्रि जागरण है, रातभर जागते रहेंगे। और एक सीमा के बाद ….एक बहुत सोचने जैसी बात है—एक आदमी नब्‍बे दिन तक खाना न खाए तो भी सिर्फ दुर्बल होगा, मर नहीं जाएगा, पागल नहीं हो जाएगा।
साधारण स्‍वस्‍थ आदमी आसानी से नब्‍बे दिन, बिना खाए रह सकता है। लेकिन साधारण स्‍वस्‍थ आदमी इक्‍कीस दिन भी बिना सोए नहीं रह सकता। ती महीने बिना खाए रह सकता है। तीन सप्‍ताह बिना सोए नहीं रह सकता। ती सप्‍ताह तो बहुत ज्‍यादा कह रहा हूं, एक सप्‍ताह भी बिना सोए रहना कठिन मामला है। पर अल्‍कुफा में नींद असंभव है।

खिड़की का चौखटा- एक सूफी कथा

एक चोर चोरी के इरादे से खिड़की की राह, एक महल मैं घुस रहा था। कि अचानक उसके चढ़ने और पकड़ने के कारण जिस खिड़की से वह अंदर महल में जा रहा था। उसके वज़न के कारण टुट गई और चोर नीचे जमीर पर जाकर गिरा। काफ़ी ऊचाई से गिरा था इस कारण उसकी एक टाँग की हड्डी टुट गइ। चोर न जाकर अदालत में मालिक के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया कि में इनके घर चोरी करेने के इरादे से अंदर जा रहा था। और इनकी खिड़की इतनी बेकार थी की मैं नीचे गिर गया और मेरी टाँग टुट गई। अदालत ने गृहपति को बुलाया और पूछा। क्‍या यह बात सच है। गृह पति ने कहां हाँ जनाब सुबह हमारी खिड़की टूट कर नीचे जमीन पर गिरी हुई जरूर थी। बाकी तो मैं कुछ नहीं जानता की क्‍या माजरा है।
जज ने कहां माजरा यह है उस चोर को देखते हो वह तुम्‍हारे घर चोरी के इरादे से अंदर जा रहा था। उस खिड़की के टुट कर नीचे गिरने की वजह से उसकी टाँग टुट गर्इ। अब बताओ क्‍या करे।
मालिक ने कहा जनाब मेरा क्‍या कसूर है, यह तो उसकी गलती है, जिसने यह खिड़की का चौखटा बनाया है। आप उस बढ़ाई पर मुकदमा चलाईये।
अगले दिन बढ़ाई को बुलाया गया। तब बढ़ाई ने कहा मेरा क्‍या कसूर है जनाब यह तो राज मिश्री की गलती है। खिड़की के होल पास उसने ठीक से नहीं दबाये होंगे इस लिए वह निकल गये।
राज मिश्री आया उससे पूछा गया तब राज मिश्री ने सफाई में कहां, इसमें मेरे उपर आप नाहक दोष मढ़ रहे हो। दोष के लिए तो वह सुंदर स्‍त्री का है, जो उसी वक्‍त उधर से निकली थी; जब मैं यह खिड़की का चौखटा लगा रहा था। उस स्‍त्री को बुलाया गया और पूछा। तब उस स्‍त्री ने कहां: ‘’ये सारा का सारा दोष इस मुये दुपट्टे का ही है, जो मैं उस दिन इसे आढ़े हुए थी। जो इस कि चतुराई के साथ इंद्रधनुषी रंग में रंगा गया।‘’ वरना तो मुझे कोई देखता भी नहीं। जब भी में बन संवर कर निकली हूं, ऐसा तो पहली बार हुआ है। अब मेरा क्‍या दोष जनाब।
इस पर न्‍यायपति ने कहा, ‘’अब अपराधी का पता चल गया। इस चोर की टाँग टूटने की सारी की सारी जिम्‍मेवार उस रंगरेज की है। जिसने वह दुपट्टा इतनी चतुराई से इंद्रधनुषी रंग में रंगा हे। उसी सब के कारण इस चोर की टाँग टुट गई।
लेकिन हद तो तब हो गई जब उस रंगरेज को पकड़ कर अदालत में लाया गया। और उसे न्‍यायपति के सामने जब पेश किया गया। यह देख कर सब दंग रह गये कि वह रंग रेज़ कोई और नहीं, उस स्‍त्री का पति था और वही चोर था जिसकी उस खिड़की के चौखटे से गिरकर की टाँग टूटी थी।

पाप-पूण्‍य ओर काशी

आखिरी बात जो तीर्थ के बाबत ख्‍याल ले लेना चाहिए, वह यह कि सिंबालिक ऐक्‍ट का, प्रतीकात्‍मक कृत्‍य का भारी मूल्‍य है। जैसे जीसस के पास कोई आता है और कहता है। मैंने यह पाप किए। वह जीसस के सामने कन्‍फेस कर देता है, सब बता देता है मैंने यह पाप किए। जीसस उसके सिर पर हाथ रख कर कह देते है कि जा तुझे माफ किया। अब इस आदमी न पाप किए है। जीसस के कहने से माफ कैसे हो जाएंगे? जीसस कौन है,और हाथ रखने से माफ हो जाएंगे, जिस आदमी ने खून किया, उसका क्‍या होगा, या हमने कहा, आदमी पाप करे और गंगा में स्‍नान कर ले, मुक्‍त हो जाएगा। बिलकुल पागलपन मालूम हो रहा है। जिसने हत्‍या की है, चोरी की है, बेईमानी की हे, गंगा में स्‍नान करके मुक्‍त कैसे हो जाएगा।
यह दो बातें समझ लेनी जरूरी है। एक तो यह, कि पाप असली घटना नहीं है। स्‍मृति असली घटना है—मैमोरी । पाप नहीं, ऐक्‍ट नहीं असली घटना जो आप में चिपकी रह जाती है। वह स्‍मृति है। आपने हत्‍या की है। यह उतना बड़ा सवाल नहीं है। आखिर में। आपने हत्‍या की है, यह स्‍मृति कांटे की तरह पीछा करेगी।
जो जानते है…..वे जो जानते है कि हत्‍या की है या नहीं। वह नाटक का हिस्‍सा है, उसका कोई मूल्‍य नहीं है। न कभी मरता है कोई न कभी मार सकता है कोई। मगर यह स्‍मृति आपका पीछा करेगी कि मैंने हत्‍या की, मैंने चोरी की। यह पीछा करेगी और यह पत्‍थर की तरह आपकी छाती पर पड़ी रहेगी। वह कृत्‍य तो गया, अनंत में खो गया, वह कृत्‍य तो अनंत ने संभाल लिया। सच तो यह है सब कृत्‍य तो अनंत के है; आप नाहक उसके लिए परेशान है। और चोरी भी हुई है आपसे तो अनंत के ही द्वारा आपसे हुई है। हत्‍या भी हुई है तो भी अनंत के द्वारा आपसे हुई है, आप नाहक बीच में अपनी स्‍मृति लेकर खड़े है। मैंने किया। अब यह ‘’मैंने किया’’ यह स्मृति आपकी छाती पर बोझ है।
क्राइस्‍ट कहते हैं, तुम कन्‍फेस कर दो, मैं तुम्‍हें माफ किए देता हूं। और जो क्राइस्ट पर भरोसा करता है वह पवित्र होकर लोट गा। असल में क्राइस्‍ट पाप से तो मुक्‍त नहीं कर सकते, लेकिन स्मृति से मुक्‍त कर सकते हे। स्‍मृति ही असली सवाल हे। गंगा पाप से मुक्‍त नहीं कर सकती, लेकिन स्‍मृति से मुक्त कर सकती हे। अगर कोई भरोसा लेकर गया है। कि गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप से बाहर हो जाऊँगा और ऐसा अगर उसके चित में है। उसकी कलेक्‍टव अनकांशेस में है, उसके समाज की करोड़ों वर्ष से छुटकारा नहीं होगा वैसे, क्‍योंकि चोरी को अब कुछ और नहीं किया जा सकता। हत्‍या जो हो गई, हो गयी लेकिन यह व्‍यक्‍ति पानी के बाहर जब निकला तो सिंबालिक एक्‍ट हो गया।
क्राइस्‍ट कितने दिन दुनिया में रहेंगे, कितने पापी यों से मिलेंगे,कितने पापी कन्‍फेस कर पाएंगे। इसके लिए हिंदुओं ने ज्‍यादा स्‍थायी व्‍यवस्‍था खोजी है। व्‍यक्‍ति से नहीं बांधा। यह नदी कन्‍फेशन लेती रहेगी। वह नदी माफ करती रहेगी, यह अनंत तक रहेगी, और ये धाराएं स्‍थायी हो जाएंगी। क्राइस्‍ट कितने दिन रहेंगे। मुश्‍किल से क्राइस्ट तीन साल काम कर पाए, कुल तीन साल। तीस से लेकर तैंतीस साल की अम्र तक, तीन साल में कितने पापी कन्‍फेस करेंगे। कितने पापी उनके पास आएंगे। कितने लोगों के सिर पर हाथ रखेंगे। यहां के मनीषी यों ने व्‍यक्‍ति से नहीं बांधा, धारा से बाँध दिया।
तीर्थ है, वहां जाएगा कोई, वह मुक्‍त होकर लौटे गा। तो स्‍मृति से मुक्‍त होगा। स्‍मृति ही तो बंधन है। वह स्वप्न जो आपने देखा, आपका पीछा कर रहा है। असली सवाल वही है, और निश्‍चित ही उससे छुटकारा हो सकता है। लेकिन उस छुटकारे में दो बातें जरूरी है। बड़ी बात तो यह जरूरी है कि आपकी ऐसी निष्‍ठा हो कि मुक्‍ति हो जाएगी। और आपकी निष्‍ठा कैसे होगी। आपकी निष्‍ठा तभी होगी जब आपको ऐसा ख्‍याल हो कि लाखों वर्ष से ऐसा वहां होता रहा है। और कोई उपाय नहीं है।
इसलिए कुछ तीर्थ तो बिलकुल सनातन है—जैसे काशी, वह सनातन है। सच बात यह है, पृथ्‍वी पर कोई ऐसा समय नहीं जब काशी तीर्थ नहीं था। वह एक अर्थ में सनातन है। बिलकुल सनातन है। यह आदमी का पुरानी से पुराना तीर्थ हे। उसका मूल्य बढ़ जाता है। क्‍योंकि इतन बड़ी धारा, सजेशन। वहां कितने लोग मुक्‍त हुए, वहां कितने लोग शांत हुए है। वहां कितने लोगों ने पवित्रता को अनुभव किया है, वहां कितने लोगों के पाप झड़ गए—वह एक लंबी धारा है। वह सुझाव गहरा होता चला जाता है। वह सरल चित में जाकर निष्‍ठा बन जाएगी। वह निष्‍ठ बन जाए तो तीर्थ कारगर हो जाता हे। वह निष्‍ठा न बन पाए तो तीर्थ बेकार हो जाता है। तीर्थ आपके बिना कुछ नहीं कर सकता। आपका कोऔपरेशन चाहिए। लेकिन आप भी कोऔपरेशन तभी देते है कि जब तीर्थ की एक धारा हो एक इतिहास हो।
हिंदू कहते है, काशी इस जमीन का हिस्‍सा नहीं है। इस पृथ्वी का हिस्‍सा नहीं है। वह अलग ही टुकडा है। वह शिव की नगरी अलग ही है। वह सनातन है। सब नगर बनेंगे, बिगड़े गे काशी बनी रहेगी। इसलिए कई दफा हैरानी होती है। व्‍यक्‍ति तो खो जाते है—बुद्ध काशी आये, जैनों के तीर्थकर काशी में पैदा हुए और खो गए। काशी ने सब देखा—शंकराचार्य आए, खो गए। कबीर आए खो गए। काशी ने तीर्थ देखे अवतार देखे। संत देखे सब खो गए। उनका तो कहीं कोई निशान नहीं रह जाएगा। लेकिन काशी बनी रहेगी। वह उन सब की पवित्रता को , उन सारे लोगों के पुण्‍य को उन सारे लोगों की जीवन धारा को उनकी सब सुगंध को आत्‍मसात कर लेती है और बना रहती हे।
यह जो स्‍थिति हे। यह निश्‍चित ही पृथ्‍वी से अलग हो जाती है। मेटाफरीकली। यह इसका अपना एक शाश्‍वत रूप हो गया, इस नगरी का अपना व्‍यक्‍तित्‍व हो गया। इस नगरी पर से बुद्ध गूजरें, इसकी गलियों में बैठकर कबीर ने चर्चा की है। यह सब कहानी हो गयी। वह सब स्वप्नवत् हो गया। पर यह नगरी उन सबको आत्‍मसात किए है। और अगर कभी कोई निष्‍ठा से इस नगरी में प्रवेश करे तो वह फिर से बुद्ध को चलता हुआ देख सकता है वह फिर से पाश्रर्वनाथ को गुजरते हुए देख सकता है। वह फिर से देखेगी तुलसी दास को वह फिर से देखेगी कबीर को।
अगर कोई निष्‍ठा से इस काशी के निकट जाए तो यह काशी साधारण नगरी ने रह जाएगी लंदन या बम्‍बई जैसी। एक असाधारण चिन्‍मय रूप ले लेगी। और इसकी चिन्मय ता बड़ी पुरातन है। इतिहास खो जाते है। असभ्यताऐं बनती है। आती है और चली जाती है। और यह अपनी एक अंत: धारा करने के प्रयोजन है। आप भी हिस्‍सा हो गए है एक अंत धारा को संजोए हुए चलती है। इसके रास्‍ते पर खड़ा होना,इसके घाट पर स्‍नान करना इसमें बैठकर ध्‍यान करने के प्रयोजन है। आप भी हिस्‍सा हो गए है एक अंत: धारा के। यह भरोसा कि मैं ही सब कुछ कर लुंगा,खतरनाक है। प्रभु का सहारा लिया जा सकता है, अनेक रूपों में—उसके तीर्थ में, उसके मंदिरों में उसका सहारा लिया जा सकता है। सहारे के लिए यह सारा आयोजन है।
यह कुछ बातें जो ठीक से समझ में आ सकें वह मैंने कहीं। बुद्धि जिनको देख पाये समझ पाये, पर यह पर्याप्‍त नहीं है। बहुत सी बातें है तीर्थ के साथ,जो समझ में नहीं आ सकेंगी पर घटित होती है। जिनको बुद्धि साफ-साफ नहीं देख पाएगी। जिनका गणित नहीं बनाया जा सकेगा। लेकिन घटित होती है।
–ओशो (मैं कहाता आंखन देखी)

तीर्थ ( अलौकिक निवास कैलाश

दो तीन बातें सिर्फ उल्‍लेख कर दूँ जो घटित होती है। जैसे कि आप कहीं भी जाकर एकांत में बैठकर साधना करें तो बहुत कम संभावना है कि आपको अपने आस पास किन्‍हीं आत्‍माओं की उपस्थिति का अनुभव हो। लेकिन तीर्थ में करें तो बहुत जोर से होगा। कहीं भी करें वह अनुभव नहीं होगा, लेकिन तीर्थ में आपको प्रेजेंस मालूम पड़ेगी—थोड़ी बहुत जोर से होगा। बहुत गहरा होगा। कभी इतनी गहन हो जाती है कि आप स्‍वयं मालूम पड़ेंगे कि कम है, और दूसरे की प्रेजेंस ज्‍यादा है।
जैसे कि कैलास—कैलास हिंदुओं का भी तीर्थ रहा है और तिब्‍बती बौद्धों का भी। पर कैलास बिलकुल निर्जन है, वहां कोई आवास नहीं है। कोई पुजारी नहीं है। कोर्इ पंडा नहीं है। कोई प्रगट आवास नहीं है कैलास पर। लेकिन जो भी कैलास पर जाकर ध्‍यान का प्रयोग करेगा वह कैलाश को पूरी तरह बसा हुआ पाएगा। जेसे ही कैलाश पर पहुँचेगा अगर थोड़ी भी ध्यान की क्षमता है तो कैलाश से कभी वह खबर लेकर लौटे गा कि वह निर्जन है। इतना सधन बसा है, इतने लोग है और इतने अदभुत लोग है। ऐसे कोई बिना ध्‍यान के कैलाश जाएगा, तो कैलाश खाली हे।
चाँद के संबंध में जो लोग और तरह से खोज करते है, उनका ख्‍याल नहीं है कि चाँद निर्जन हे। और जिन्‍होंने कैलाश का अनुभव किया है वह कभी नहीं मानेंगे कि चाँद निर्जन है। लेकिन आपके यात्री को चाँद पर कोई मिलेगा! जरूरी नहीं है इससे कि कोई न हो, पर आपके यात्री को कोई नहीं मिलेगा। जैनों के ग्रंथों में बहुत वर्णन है कि चाँद पर किस-किस तरह के देवता है, कि क्‍या है, पर अब वे बड़ी मुश्‍किल में पड़ गए है। जब पाया गया कि वहां कोई नहीं है। उनके साधु-संन्‍यासी बड़ी मुश्‍किल में है। वे बेचारे एक ही उपास कर सकते है, उन्‍हें कूद और तो पता नहीं है, वह यह कह सकते है कि तुम असली चाँद पर पहुंचे ही नहीं। वह इसके सिवाय और क्‍या कहेंगे। अभी गुजरात में कोई मुझे कह रहा था कि कोई जैन मुनि पैसा इकट्ठा कर रहे है यह सिद्ध करने के लिए कि तुम असली चाँद पर नहीं पहुंचे। ये वे कभी सिद्ध न कर पाएंगे।
आदमी असली चांद पर पहुंच गया है। लेकिन उनकी कठिनाई है कि उनकी किताब में लिखा है कि वहां आवास है, वहां इस-इस तरह के देवता रहते है। उनकी किताब में लिखा है, उनको खुद को तो कुछ पता नहीं। किताब तो आवास का कहती है। और अब वैज्ञानिक की रिपोर्ट है कि वहां कोई भी नहीं है। अब क्‍या करना है। तो साधारण बुद्धि जो कर सकती,वह यह है, कि वे लोग चाँद पर नहीं पहुँचे। क्‍योंकि अगर नहीं सिद्ध कर पाए तो ये मानना पड़ेगा कि हमारा शास्‍त्र गलत हुआ। तो वे जिद बाँध रखेंगे कि नहीं, तुम उस जगह नहीं पहुंचे।
एक जैन मुनि ने तो दावे से यह कहां कि कोई वहां पहुंचा ही नहीं। अब इनकार भी नहीं कर सकते, पहुंचे तो जरूर है, तो फिर कहां पहुंच गए है। कभी-कभी तो हास्यास्पद, रिडीकुलस हो जाती है बात। उन्‍होने कहा, कि वहां देवताओं के जो विमान ठहरे रहते है चारों तरफ, आप किसी विमान पर उतर गए। वह बड़े विराट विमान है। उसी पर उतर कर आप लौट आए है। आप ठीक चाँद की भूमि पर नहीं उतर सके। यह सब पागलपन है, लेकिन इस पागलपन के पीछे कुछ कारण है। यह कारण यह है कि एक धारा है, कोई अंदाजन बीस हजार वर्ष से जैनों की धारा है कि चाँद पर आवास है। पर वह उनके ख्‍याल में नहीं कह वह आवास किस तरह का है। वह आवास कैलास जैसा आवास है। वह आवास तीर्थों जैसा आवास है।
जब आप तीर्थ पर जाएंगे तो एक तीर्थ वह काशी है जो दिखाई पड़ती है। जहां आप ट्रेन पर से उतर जाएँगे स्‍टेशन से एक तो काशी वह है। काशी के दो रूप है। तीर्थ के दो रूप है। एक तो मृण्‍मय रूप है। यह जो दिखाई पड़ रहा है। जहां कोई भी जाएगा सैलानी और घूमकर लौट आएगा। और एक उसका चिन्‍मय रूप है। जहां वहीं पहुंच जाएगाजो अंतरस्‍थ होगा, जो ध्‍यान में प्रवेश करेगा, तो उसके लिए काशी बिलकुल और हो जाएगी। इधर काशी के सौंदर्य का इतना वर्णन है, और इस काशी को देखो तो फिर लगता है कि वह कवि की कल्‍पना है। इससे ज्यादा गंदी कोई वसती नहीं है। यह काशी जिसको हम देखकर आ रहे है। पर किस काशी की बातें कर रहे हो तुम। किस काशी की बात हो रही है। किस काशी के सौंदर्य की जो अपूर्व है। जैसा कोई नगर नहीं आया है इस जगत में । यह सब तुम किसकी बात कर रहे हो, यही काशी अगर है, तब फिर यह सब कवि कल्‍पना हो गई। नहीं, पर वह काशी भी है। नहीं, पर वह काशी भी है। और एक कान्‍टेक्‍ट फील्ड है यह काशी, यहां उस काशी और इस काशी का मिलन होता है।
जो यात्री सिर्फ ट्रेन में बैठकर गया है, वह इस काशी से वापस लौटकर आ जाएगा। वह जो ध्‍यान में भी बैठकर गया है वह उस काशी से भी संपर्क साध पाता है। तब इसी काशी के निर्जन घाट पर उनसे भी मिलना हो जाता है जिनसे मिलने की आपको कभी कल्‍पना नहीं होती।
मैंने अभी बताया,कैलास पर अलौकिक निवास है। करीब-करीब नियमित रूप से। नियम कैलाश का रह है कि कम से कम पाँच सौ बौद्ध-बौद्ध वहां रहे ही, उससे कम नहीं। पाँच सौ बुद्धत्‍व को प्राप्‍त व्‍यक्‍ति कैलाश पर रहेंगे ही। और जब भी एक उनमें से विदा होगा किसी और यात्रा पर, तो दूसरा जब तक न हो तब तक वह विदा नहीं हो सकता। पाँच सौ की संख्‍या वहां पूरी रहेगी। उन पाँच सौ की मौजूदगी कैलाश को तीर्थ बनाती है। लेकिन यह बुद्धि से समझने की बात नहीं हे। इसलिए मैंने पीछे छोड़ रखी। काशी का भी नियमित आंकड़ा है कि उतने संत वहां रहेंगे ही। उनमें कभी कमी नहीं होगी। उनमें से एक को विदा तभी मिलेगी जब दूसरा उस जगह स्‍थापित हो जाएगा।
असली तीर्थ वहीं है। और उनसे जब मिलन होता है तो तीर्थ में प्रवेश करते है। पर उनके मिलन का कोई भौतिक स्‍थल भी चाहिए। आप उनको कहां खोजते फिरेंगे। उस अशरीरी घटना को आप ने खोज सकेंगे, इसलिए भौतिक स्‍थल चाहिए। जहां बैठकर आप ध्‍यान कर सकें और उस अंतर् जगत में प्रवेश कर सकें, जहां संबंध सुनिश्‍चित है।
तीर्थ बुद्धि से ख्‍याल में नहीं आएगा। बुद्धि से कोई संबंध नहीं है तीर्थ का। ठीक तीर्थ का अर्थ जो दिखाई पड़ जाता है वह नहीं है—छिपा है, उसी स्‍थान पर छिपा है। दूसरी बात, इस जमीन पर जब भी कोई व्‍यक्‍ति परम ज्ञान को उपलब्‍ध होकर विदा होता है। तो उसकी करूणा उसे कुछ चिन्‍ह छोड़ देने को कहती है। क्‍योंकि जिनको उसने रास्‍ता बताया। जो उसकी बात मानकर चले, जिन्‍होंने संघर्ष किया, जिन्‍होंने श्रम उठाया, उनमें से बहुत से ऐसे होंगे जो अभी नहीं पहुंच पाए। उनके पास कुछ संकेत तो चाहिए,जिनसे कभी भी जरूरत पड़ने पर वह संपर्क पुन; साध सकें।
इस जगत में कोई आत्‍मा कभी खोती नहीं। पर शरीर तो खो जाता है। तो उन आत्‍माओं के संपर्क साधने के लिए सूत्र चाहिए। उन सूत्रों के लिए तीर्थों ने ठीक वैसे ही काम किया जैसे कि आज हमारे राडार काम करते है। जहां तक आंखें नहीं पहुँचती वहां तक राडार पहुंच जाते है। जो आंखों से कभी देखें नहीं गए तारे, वह राडार देख लेते है। तीर्थ बिलकुल आध्‍यात्‍मिक राडार का इंतजाम है। जो हमसे छूट गए, जिनसे हम छूट गए, उनसे संबंध स्‍थापित किए जा सकते है।
इसलिए प्रत्‍येक तीर्थ निर्मित किया गया उन लोगों के द्वारा,जो अपने पीछे कुछ लोग छोड़ है, जो अभी रास्‍ते पर है, जो पहुंच नहीं गए, और जो अभी भटक सकते है। और जिन्‍हें बार-बार जरूरत पड़ जाएगी कि वह कुछ पूछ लें कुछ जान लें। कुछ आवश्‍यक हो जाए। थोड़ी जानकारी उन्‍हें भटका दे सकती है। क्‍योंकि भविष्‍य उन्‍हें बिलकुल ज्ञात नहीं है। आगे का रास्‍ता उन्‍हें बिलकुल पता नहीं है। तो उन सबने सूत्र छोड़े है। और सुत्रों को छोड़ने के लिए विशेष तरह की व्‍यवस्‍थाएं की है—तीर्थ खड़े किए, मंदिर खड़े किए, मंत्र निर्मित किए। मूर्तियां बनायी सबका आयोजन किया। और सबका आयोजन एक सुनिश्‍चित प्रक्रिया है, जिसे हम ‘रिचुअल’ कहते हे, वह एक सुनिश्‍चित प्रकिया है।
अगर एक जंगली आदिवासी को हम ले आएं और वह आकर देखे कि जब भी प्रकाश करना होता है तो आप अपनी कुर्सी से उठते है, दस कदम चलकर बायी दीवार के पास पहुंचते वहां एक बटन को दबाते है। और बीजली जली जाती है। वह आदी वासी किसी भी तरह न सोच पाएगा कि इस बटन में ओ इस दीवार के भीतर इस बिजली के बल्‍ब से कोई तार जुड़ा है। उसके सोचने का कोई उपास नहीं है।
उसे यह एक रिचुअल मालूम पड़ेगा। कि यह कोई तरकीब है यहां से उठना,ठीक जगह पर दीवार पर जाना,फिर नंबर एक का बटन दबाना। नंबर दो का दबाते है तो पंखा घूमने लगता है। नंबर तीन का दबाते है रेडियों बोलने लग जाता है। उसे यह सब रिचुअल मालूम पड़ेगा। एक क्रिया कांड लगेगा। और समझ लें किसी दिन आप नहीं है घर में और बिजली चली गई है। वह आदमी उठा और उसने जाकर पूरा रिचुअल किया, लेकिन बिजली नहीं जली, पंखा नहीं जला,रेडियो नहीं चला। अब वह यही समझे गा कि रिचुअल में कोई भूल हो गई हे।
अपने क्रिया कांड में कोई भूल हो रही है। शायद हमने ठीक कदम न उठाए। कौन से कदम से पहले सह आदमी गया था। पता नहीं, अंदर-अंदर कोई मंत्र भी पढ़ता हो मन में, और बटन दबाता हो। क्‍योंकि हमने बटन वही दबाया है और बिजली नहीं जल रही है। उस आदिवासी को तो बिजली के पूरे फैलाव का कोई अंदाजा नहीं हो सकता।
करीब-करीब धर्म के संबंध में ऐसा ही है। जिनको भी हम धर्म के क्रिया-काँड़ कहते है, वह सब हमारे द्वारा पकड़े लिए गए ऊपरी कृत्य है। जो बिलकुल कुछ नहीं जानते व्‍यवस्‍था को, उनको हम पूरा भी कर लेते है, फिर पाते है, कुछ नहीं हो रहा है। या कभी हो जाता है, कभी नहीं होता, तो हम बड़ी मुश्‍किल में पड़ते है। कभी हो जाता है, इससे शक होता है कि शायद होता होगा। फिर कभी नहीं होता तो फिर यह शक होता है कि शायद संयोग से हो गया हो। क्‍योंकि अगर होना चाहिए तो हमेशा होना चाहिए।
हमें भीतरी व्‍यवस्‍था का कोई भी पता नहीं है। जिस चीज को आप नहीं जानते उसको ऊपर से देखने पर वह रिचुअल मालूम पड़ेगी। ऐसा छोटी-मोटी आदमियों के साथ होता हो ऐसा नहीं, जिनको हम बहुत बुद्धिमान कहते है उनके साथ भी यहीं होगा। क्‍योंकि बुद्धि ही बचकानी चीज है। बड़े से बड़ा बुद्धिमान भी एक अर्थ में जुवेनाइल है, बचकाना ही होता है। क्‍योंकि बुद्धि बहुत गहरे ले जाने वाली नहीं हे।
जब पहली दफा ग्रामोफोन बना, और फ्रांस के साइंस एकेडमी में जिस वैज्ञानिक ने ग्रामोफोन बनाया वह लेकर गया। तो बड़ी ऐतिहासिक घटना घटी तीन सौ साल पहले। फ्रैंच एकेडमी के सारे बड़े से बड़े वैज्ञानिक सदस्‍य हाजिर थे। कोई सौ वैज्ञानिक घटना देखने आए थे। उस आदमी ने ग्रामोफोन का रिकार्ड चालू किया, तो जो प्रैजिडेंट था फ्रैंच एकेडमी का, वह थोड़ी देर तो देखता रहा फिर उचक कर उसने उस आदमी की गर्दन पकड़ ली, जो ग्रामोफोन लाया था। क्‍योंकि उसने समझा कि यह कोई ट्रिक कर रहा है गले की, यह हो कैसे सकता है। यह गले में अंदर कोई हरकत कर रहा है। कोई तरकीब इसने लगाई है।
यह ऐतिहासिक घटना बन गई। क्‍योंकि एक वैज्ञानिक से ऐसी आशा नहीं हो
सकती थी कि वह जाकर उसकी गर्दन पकड़ ले। वह आदमी तो घबराया,उसने कहा कि आप यह क्‍या करते है। उसने कहा देखो तुम मुझको धोखा न दे पाओगें। वह उसका गला दबाए रहा। लेकिन तब भी उसने देखा की आवाज आ रही है। तब तो वह बहुत घबराया । उस आदमी को कहा,तुम बाहर आओ। उसको बहार ले गया। लेकिन तब भी आवाज आ रही थी। वह सौ के सौ वैज्ञानिक सकते में आ गए, उनमें से एक ने खड़े होकर कहां कि यह कोई शैतानी ताकत हे। इसे छूना-ऊना मत इसमें कुछ न कुछ डेवल जरूर है। शैतान इसमें हाथ बंटा रहा है। यह हो कैसे सकता है? आज हमें हंसी आती है। क्‍योंकि अब हो गया…। इसका हमें परिचय है। जो नहीं होता तो भी हम वैसी परेशानी में पड़ जाते।
अगर किसी दिन एटम गिरे दुनिया पर, यह सभ्‍यता हमारी खो जाए, और किसी आदिवासी के पास एक ग्रामों फोन बच जाए तो उसके गांव के लोग उसको मार डालें। अगर वह ग्रामोफोन बजा दे तो पूरा गांव उसकी जान को आ जाए। क्‍योंकि वह एक्स प्लेन तो कर नहीं पाएगा। यह बता तो नहीं पाएगा कि ये रेकार्ड कैसे बोल रहा है। यह तो आप भी नहीं बता पाओगें। यह बड़े मजे कि बात है। सब सभ्‍यताएं बिलीफ से जीती हे। केवल दो-चार आदमियों के पास कुंजियां होती है। बाकी तो भरोसा होता हे।
आप भी न बता पाओगें कि यह कैसे बोल रहा है। सुन लेते है, मालूम है कि बोलता है, भर लिया जाता है। बाकी बता पाना बहुत मुश्‍किल है। और उसे बनाना तो लगभग असम्‍भव ही है। बटन दबा देते है। बिजली जल जाली है। रोज जला लेते है। पर आप भी न बता पाओगें कि कैसे जल गई। कुंजियां तो दो चार आदमियों के पास होती है सभ्‍यता की, बाकी सारे लोग तो काम चला लेते है। बस जो काम चलाने वाले है, जिस दिन कुंजियां खो जाए उसी दिन मुश्‍किल में पड़ जाएंगे। उसी दिन उसका आत्‍मविश्‍वास डगमगा जाएगा। उसी दिन वह घबरा नें लगेंगे। फिर अगर एक दफा बिजली न जली तो कठिन हो जाएगा।
–ओशो ( मैं कहता हूं आंखन देखी )