30 March 2017

क्या शराबबंदी होगा रमन सरकार का मास्टरस्ट्रोक?

  छत्तीसगढ़ सरकार ने शराब बेचने का फैसला लेकर विपक्ष को ऐसा हथियार दे दिया है, जिसकी गूंज अगले साल यहां होने वाले विधानसभा चुनाव तक रहेगी।  इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह आगामी चुनावों में सबसे प्रमुख मुद्दा बन जाए।
मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस सहित अजीत जोगी की जनता कांग्रेस (जे) ने इस मुद्दे को लपक लिया है और महीने भर से रमन सरकार की नाक में दम किए हुए हैं।
आए दिन शराबबंदी को लेकर धरना-प्रदर्शन, विधानसभा घेराव आदि किए जा रहे हैं। जैसे कभी नरेंद्र मोदी के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर तमाम विपक्षी पार्टियों को एक छत के नीचे लाने की कोशिश हो रही थी, वैसा ही यहां शराब के मुद्दे पर एक हवा, एक लहर बनाने के प्रयास चल रहे हैं और बहुत हद तक इसमें सफलता भी मिल चुकी है।
आमजनता खुलकर इस फैसले के विरोध में है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 416 दुकानों को हाइवे से हटाकर अन्यत्र खोलने की कोशिश कर रही सरकार को बहुत अड़चनें आ रही हैं। कहीं लोग दुकान नहीं खुलने दे रहे हंै, तो कहीं प्रस्तावित दुकानों में तोडफ़ोड़ की जा रही है। हाल में खुले में शौच से मुक्त घोषित अंबिकापुर के बतौली गांव की महिलाओं ने शराब दुकान खुलने पर फिर से खुले में शौच करने का फरमान भी सुना दिया है।
कहा जाता है, चुनाव में जब लहर का जोर रहता है, तब अन्य दूसरे मुद्दे पूरी तरह अप्रासंगिक भी हो जाते हैं। इंदिरा गांधी की मौत के बाद हुए चुनाव में और किसी मुद्दे की प्रासंगिकता नहीं रह गई थी। सहानुभूति लहर पर सवार होकर  राजीव गांधी प्रधानमंत्री बन गए थे। इसी तरह का नजारा 80 के दशक में हुए चुनाव में देखने मिला था, जिसमें राम लहर के चलते दूसरे सारे मुद्दे गौण हो गए थे। हाल में हुए यूपी चुनाव में जहां मोदी लहर ने सालों से चले आ रहे सियासी समीकरणों को ध्वस्त कर मिथकों को तोड़ डाला, वहीं सब तरफ पटखनी खा रही कांग्रेस ने सत्ताविरोधी लहर में सवार होकर पंजाब फतह कर लिया।
चुनावी लहरों को ज्वालामुखी के समान माना जा सकता है, जो भीतर-ही-भीतर खौलता रहता है और समय आने पर फूट पड़ता है।  ये लहरें भी आम जनता के भीतर खौलते हुए विचारों को, उसके सामूहिक अवचेतन में घर कर गए धारणाओं को ही प्रगट करती हैं। और मौजूदा समय में शराब को लेकर छत्तीसगढ़ में जैसा माहौल गरमाया हुआ है, उससे तो यही लगता है कि यदि आज चुनाव हो जाएं तो इसके आगे सारे मुद्दे फीके पड़ जाएंगे। बाकी सारी बातों को छोड़, तमाम पार्टी इसी शराब के मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाएंगी। यह मुद्दा ही निर्णायक भूमिका अदा करेगा।
लेकिन छत्तीसगढ़ में चुनाव अगले साल होने हैं। उस लिहाज से अभी काफी महीने बाकी हैं। अगर राजनीतिक लाभ के नजरिए से देखें तो अभी विपक्ष की जरूरत बहुत दूसरे तरह की होगी। उसे न केवल इस मु्ददे को चुनाव तक जिंदा रखना है, बल्कि एक खास समय तक  विराट जनआंदोलन बनने से भी रोकना है। ऐसा न होने पर, हो सकता है सरकार दबाव में आकर सचमुच शराब बंदी का ऐलान कर दे और एक बेहतरीन मुद्दा हाथ से निकल जाए। तो राजनीतिक फायदे की नीयत से विपक्ष शराब-विरोध के इस अलाव को चुनाव तक मध्यम आंच में ही सुलगाए रखना चाहेगा और ऐन चुनाव के पहले इसे विराट आंदोलन में तब्दील होते देखना चाहेगा। ऐसा होने पर ही वह इसे प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाकर लाभ उठा सकता है।
 शराबबंदी नफा-नुकसान से परे आमजनता की सेहत से जुड़ा सीधा मसला है। भले ही कांग्रेस या जोगी कांग्रेस, राजनीतिक लाभ के इतर, सामाजिक सरोकार के चलते छत्तीसगढ़ में शराब-बिक्री का विरोध कर रहे होंगे, लेकिन उन्हें भी पता है कि आगामी चुनावों में शराबबंदी का मुद्दा केंद्रीय भूमिका निभाने वाला है और इसका उन्हें लाभ भी मिलने वाला है। छत्तीसगढ़ की फिजाओं में बह रही शराबबंदी की बयार यही इशारा कर रही है कि रमन सरकार के लिए समय के साथ-साथ मुश्किलें और भी बढऩे वाली हैं।
लेकिन अहम बात तो यह है कि जिस बात को हर कोई देख पा रहा है, क्या वह छत्तीसगढ़ की रमन सरकार को नजर नहीं आ  रहा है? क्या सचमुच मौजूदा सरकार शराबबंदी के मुद्दे की गंभीरता को समझ नहीं पा रही है, या उसे जानबूझकर नजरअंदाज कर रही है? या उसे अपने विकास कार्यों पर ज्यादा भरोसा है और वह उसे लेकर ही आगामी चुनाव में जनता के बीच जाना चाह रही है?  प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह का यह तीसरा टर्म है। जनता की नब्ज पढ़कर ही उन्होंने हैट्रिक मारी है। तकरीबन 13 सालों से वे प्रदेश की बागडोर थाम रहे हैं और गांव-गरीब, से लेकर शहर-अमीर...  सबकी तासीर... सबकी अपेक्षा-आकांक्षाओं से अच्छी तरह परीचित हैं। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि शराबबंदी जैसे मुद्दे के चुनावी असर से वे अनजान होंगे। मुझे तो लगता है कि वे अभी जानबूझकर विपक्ष को उछल-कूद करने दे रहे हैं। भारत के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की तरह वे भी गेम को आखिरी ओवर तक ले जाना चाह रहे हैं। आखिरी ओवर में ही छक्का मारकर वे मैच जीतना चाहते हैं। बहुत संभव है, ऐन चुनाव के पहले ही वे शराबबंदी की घोषणा करेंगे और इस मुद्दे की हवा निकाल देंगे, विपक्षियों को क्लीन बोल्ड कर देंगे। यही उनका मास्टरस्ट्रोक होगा... उनके सारे विकास कार्यों के इतर...।
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