23 September 2011

नवीनता के राजदूत


     
यूं तो •िांदगी चलते रहने का नाम है, लेकिन एक समय बाद अधिकतर इंसान के भीतर कुछ नया करने का ज•बा खत्म हो जाता है, उसकी सोच कुंद हो जाती है। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने सारे अनुमानों और अटकलों के विपरीत कुछ ऐसा कर दिखाया, जिसके बारे में किसी ने सोचा न था। नए साल के मौके पर आइए मिलते हैं, ऐसे ही कुछ नवीनता के राजदूत से... 
अमिताभ बच्चन: जवानी की नई परिभाषा
अगर जवानी का मतलब जोश, सक्रियता, उत्साह और ऊर्जा है, तो अमिताभ बच्चन और जवानी का अर्थ भी एक ही है। भारतीय सिने जगत की इस सर्वाधिक मशहूर श$िख्सयत ने जवानी की नई परिभाषा पेश की है। उम्र की ढलान में जब लोग रिटायर होकर घर पर बैठ जाते हैं, वे पूरे जोशो-खरोश के साथ काम कर रहे हैं। बच्चन साहब वर्तमान में 68 साल के हैं, लेकिन वे जिस ऊर्जा और उत्साह से लबरेज होकर काम करते हैं, वह सबको हैरत में डाल देता है। काम के प्रति समर्पण और चपलता के मामले में 20-25 साल के युवा कलाकार भी उनके आगे फीके न•ार आते हैं। बिग-बी ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव झेला है और अपने जीवट स्वभाव के बूते उन्होंने हर चुनौतियों से पार पाया है। १९97 में अमिताभ बच्चन कारपोरेशन लिमिटेड (एबीसीएल) में तगड़ा नु$कसान झेलने के बाद वे कर्जे में डूबे। काफी संघर्षों के बाद 2000 में टीवी शो 'कौन बनेगा करोड़पतिÓ (केबीसी) ने उन्हें वित्तीय संकट से उबारने में संजीवनी का काम किया। और तब से ही वे उम्र को मात देते हुए  काम कर रहे हैं। वो इस समय में एनर्जी लेवल के प्रतिनिधि बनकर उभरे हैं। यह गौरतलब है कि युवाओं के देश में ऊर्जा का प्रतिनिधि साठ पार कर चुका एक आदमी है।
सचिन तेंदुलकर: उम्र को मात देती सफलता
न जाने किस मिट्टी के बने हैं सचिन... कि जब-जब आलोचक उन्हें चूका हुआ करार देते हैं, वे अपने बल्ले से रनों की बारिश कर उनका मुंह बंद कर देते हैं।  क्रिकेट का 'भगवानÓ, 'स्कूलÓ 'प्रोफेसरÓ, 'रनमशीनÓ और न जाने कितने विशेषणों से नवा•ो गए तेंदुलकर ने यह साबित किया है कि सफलता का उम्र से कोई सरोकार नहीं है। उन्होंने यह मिथक तोड़ा है कि 30-35 साल के बाद क्रिकेटर को बल्ला टांग देना चाहिए। 36 साल की उम्र में भी उनके भीतर लाजवाब कर देने वाली रनों की भूख है। इस उम्र में भी वे रिकार्ड पर रिकार्ड बनाए जा रहे हैं, उनका बल्ला लगातार रन उगल रहा है। अपनी लगन और मेहनत से लिटिल मास्टर ने जता दिया कि उम्र 16 की हो या 36 की, करियर का शुरुआत हो या फिर अंत... वे जो चाहते हैं उसे हासिल कर सकते हैं, किसी तरह का 'अंकगणित Ó या 'समीकरणÓ उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।
आमिर खान: नएपन की $खुशबू
आमिर खान हमेशा कुछ नया करने में य$कीन रखते हैं, चाहे फिल्में हों या और कुछ, उनके हर काम में एक ता•ागी, एक नएपन की $खुशबू है। थ्री इडियट, रंग दे बसंती, तारे •ामीं पर, लगान, मंगल पांडे, दिल चाहता है, अर्थ 1947  हो या फिर पीपली लाइव ... वे अपनी हर फिल्म में कुछ हट के, कुछ नया करते हैं, दर्शकों को कुछ नया देते हैं। 90 के दशक में जब शाहरुख, सलमान जैसे अन्य साथी कलाकार धड़ाधड़ फिल्में साइन कर बैंक बैलेंस बढ़ा रहे थे, उन्होंने प्रतिद्वंद्विता छोड़कर कुछ बेहतर, कुछ सार्थक करने की सोची, पैसे का आकर्षण छोड़कर साल में एक फिल्म करने का जोखिम लिया। दिलचस्प बात यह है कि आमिर के भीतर की रचनाधर्मिता और मौलिकता ने मसाला फिल्म बनाने वाले हुसैन-बंधु (चाचा नासिर हुसैन और पिता ताहिर हुसैन) के 'गुणसूत्रोंÓ का •ारा भी असर नहीं लिया। असल में उनके भीतर नवीनता के प्रति, कुछ अलग करने के प्रति जन्मजात आकर्षण है और उनके हर काम में प्रयोगधर्मिता, कुछ हट के काम करने की •िाद झलकती है। शायद इसीलिए लंदन स्थित मैडम तुसाद के संग्रहालय से उनकी मोम की मूर्ति बनाने का प्रस्ताव आया, तो उन्होंने 'मेरी रुचि नहीं हैÓ कहकर उसे ठुकरा भी दिया, जबकि उनसे पहले अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय ने वहां अपनी मूर्ति बनवाई थी।
जूलिया राबर्टस और मैडोना: चलते रहने का नाम •िांदगी
हालीवुड की दो सेलेब्रिटी जूलिया राबर्टस और पॉप स्टार मैडोना भी सारी दुनिया को हमेशा कुछ नया कर चौंकाती रहती हैं। इन दोनों का हाल ही में आध्यात्मिकता की ओर गहरा रुझान बढ़ा है। शांति की तलाश में जूलिया ने जहां हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया है, वहीं मैडोना हिंदू दर्शन को समझने में लगी हैं। मर्लिन मुनरो के बाद सर्वाधिक लोकप्रिय माने जाने वाली जूलिया, यूं तो अभिनय के अलावा भी यूनिसेफ को दान देने, सोशल एक्टीविटीज में भाग लेने जैसा कुछ नया करती हैं। लेकिन जब  फिल्म 'इट प्रे लवÓ की शूटिंग के दौरान उनका भारत आना हुआ था, तब से उनका झुकाव हिंदू दर्शन की ओर हुआ और वे हिंदू बन गई। कमोबेश यही कहानी 20वीं सदी की सर्वाधिक बिकने वाली महिला रॉक कलाकार मैडोना की भी है। 'लाइक अ वर्जिनÓ और 'ट्रू ब्लूÓ जैसे स्टूडियो ऐल्बमों से पॉप आइकॉन के रूप में वैश्विक मान्यता पाने वाली मैडोना बहुत प्रयोगधर्मी हैं। एलबम 'लाइक अ प्रेयरÓ में धार्मिक कल्पना का व्यापक प्रयोग के अलावा उन्होंने फिल्म 'एविटाÓ में नायिका की भूमिका भी निभाई है। इन दिनों उनका हिंदू धर्म के प्रति रुझान बढ़ा है, वे  गुस्से पर काबू पाने और तनाव भगाने के लिए धार्मिक परामर्शदाताओं की मदद ले रही हैं। 
नारायणमूर्ति: ईमानदारी के प्रतीक
एक ओर जहां दुनिया भर में उद्योगपतियों पर अपना काम निकालने के लिए सरकारी तंत्र से नापाक तालमेल के आरोप लगते रहते हैं, वहीं साफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस के संस्थापक नारायणमूर्ति ईमानदारी और नैतिक मूल्यों की शुचिता के प्रतीक बनकर उभरे हैं। उन्होंने सिखाया है कि ईमानदारी पुराने जमाने का मूल्य नहीं है और व्यक्ति अगर मेहनती हो तो सफल हो सकता है। उनकी छवि को देखते हुए ही अनेक लोगों ने कंपनी 'सत्यमÓ को बचाने, उस पर लगे दाग को साफ करने मूर्ति को उसका सीईओ बनाने का सुझाव दिया था। बताते हंै कि चेन्नई के कारोबारी पट्टाभिरमण ने अपनी सारी दौलत इंफोसिस को ही दान कर दी है। वे नारायणमूर्ति को भगवान की तरह पूजते हैं और उन्होंने अपने घर में मूर्ति लगा रखी है। १९८१ में अपनी पत्नी से 10 हजार रुपए मुंबई के एक अपार्टमेंट में कंपनी की नींव रखने वाले मूर्ति की लगन और मेहनत से 1999 में कंपनी को उत्कृष्टता और गुणवत्ता का प्रतीक एसईआई-सीएमएम मिला और इसी साल उनकी कंपनी के शेयर अमरीकी शेयर बाजार एनएएसडीएक्यू में रजिस्टर होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी। अनेक देशी-विदेशी सम्मानों से नवाजे गए मूर्ति को 2005 में को विश्व का आठवां सबसे बेहतरीन प्रबंधक भी चुना गया।
मार्क जकरबर्ग: बदलाव की बयार
टाइम मैगजीन द्वारा इस साल का 'पर्सन आफ द ईयरÓ चुने गए फेसबुक के संस्थापक और सीईओ मार्क जकरबर्ग बदलाव के, नवीनता के सूत्रधार हैं। जब उन्हें लगा कि फेसबुक में मेलफीचर की •ारूरत है, तो उन्होंने उसे जोडऩे में देर नहीं लगाई। जब उन्हें लगा कि भाषा दीवार बन रही है, तो उन्होंने चायनी•ा सीखने की कोशिश शुरू कर दी। उनकी उम्र महज 26 साल है, और 'पर्सन आफ द ईयरÓ चुने जाने वाले वे दुनिया के दूसरा सबसे कम उम्र व्यक्ति हैं।  टाइम पर्सन ऑफ द इयर का सम्मान पाने वाले 25 वर्षीय चाल्र्स लिंडबर्ग विश्व के सबसे कम उम्र के व्यक्ति हैं, उन्हें यह सम्मान 1927 में दिया गया था। जकरबर्ग को यह सम्मान सबसे कमउम्र का अरबपति होने व १०करोड़ डालर शिक्षा में सुधार के लिए दान देने के लिए दिया है। मालूम हो, फेसबुक के रजिस्टर्ड युजर्स की कुल संख्या 55 करोड़ है और विश्व के हर 12वें व्यक्ति के पास फेसबुक एकाउंट है। भारत में यह नंबर वन सोशल नेटवर्किंग साइट है। रोजगार वेबसाइट 'ग्लासडोर डॉट कॉमÓ द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण में फेसबुक को सबसे बेहतर नियोक्ता भी चुना गया है।
राजकुमार हिरानी: दिल से जीयो, दिल से करो
थ्री ईडियट्स और मुन्नाभाई एमबीबीएस के मशहूर डायरेक्टर राजकुमार हिरानी ने भेड़चाल चलने वाले बालीवुड को बता दिया कि सब्जेक्ट में दम हो और अगर स्क्रिप्ट में कसावट हो, तो बिना किसी कमर्शियल एलीमेंट के भी फिल्म हिट हो सकती है। उन्होंने जो अच्छा लगा वो किया, लेकिन जो किया, वो सबको अच्छा लगा। डायरेक्टर, पटकथा लेखक, एडीटर और एडफिल्म निर्माता रहे हिरानी ने बालीवुड के दिग्गज कलाकारों का 'ब्रेनवाशÓ कर दिया। तेजाब, अंकुश, वजूद, युगांधर जैसी विचारोत्तेजक विषयों पर फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक एन चंद्रा इस बात को स्वीकारते भी हंै। उन्होंने 'मुन्नाभाई...Ó हिट होने के बाद हिरानी को बधाई देते हुए कहा था-'अगर यह स्क्रिप्ट लेकर आप मेरे पास आते, तो मैं यह कहकर भगा देता कि इसमें कमर्शियल एलिमेंट नहीं है, अस्पताल, मरीज और डॉक्टर को कौन देखेगा? लेकिन फिल्म देखने के बाद लगा कि जो दिल को अच्छा लगे, वही करना चाहिए। बेशक, हम दूसरों की पसंद के बारे में नहीं जानते हैं, लेकिन हम अपनी पसंद के अनुसार बेहतर काम कर सकते हैं।Ó
ए. आर. रहमान: संगीत का नया सुर
रहमान यानी प्रयोग, प्रयोग और केवल प्रयोग... वे हमेशा नए रास्ते बनाते हैं, लीक से हटकर काम करते हैं।  नए गायकों को मौका देते हैं, नए वाद्य यंत्रों के माध्यम से प्रयोग करते हैं। वे सिंथेसाइजर से बेहद प्रभावित हैं और उसे कला और टेक्नोलॉजी का अद्भुत संगम मानते हैं। टाइम्स पत्रिका द्वारा 'मोजार्ट ऑफ मद्रासÓ की उपाधि से सम्मानित रहमान की फिल्मों से परंपरागत संगीत की बजाय फ्यूजन की ओर रुझान •यादा न•ार आता है। चेन्नई में जन्मे रहमान तमिलभाषी हैं, उन्हें न तो हिंदी आती है और न ही चीनी... वे तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ भी नहीं जानते, लेकिन वे इन भाषाओं की फिल्मों में भी संगीत दे रहे हैं। भाषाई सरहदों को लांघकर वे विश्व संगीत में योगदान दिया है और यह दिखाया है कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती। उनकी हमेशा नया करने की कोशिशों को देखकर ही फिल्म समीक्षकों ने उन्हें नया पंचम दा (आर.डी बर्मन) भी कहा था। गौरतलब है कि उनकी पहली फिल्म 'रोजाÓ के संगीत को टाइम्स पत्रिका ने 'टॉप टेन मूवी साउंडट्रेक ऑफ ऑल टाइम इन 2005Ó में जगह दी थी। वे विश्व संगीत में योगदान के लिए 2006 में स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी से सम्मानित हुए और पिछले साल उन्हें फिल्म 'स्लमडॉग मिलिनेयरÓ के लिए संगीत की दुनिया का ऑस्कर माने जाने वाला 'गोल्डन ग्लोब अवार्डÓ भी मिला।
स्टीवन स्पीलबर्ग: इंज्वाय भी, क्रिएटिविटी भी
स्पीलबर्ग का नाम अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत में गुणवत्तापूर्ण मनोरंजन, नॉलेज, एंटरटेनमेंट और क्वालिटी का पर्याय माना जाता है। डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, स्क्रीन राइटर से लेकर वीडियो गेम डिजाइनर, स्टुडियो एक्जीक्यूटिव तक रह चुके स्पीलबर्ग असल में विविधता के प्रेमी हैं। उन्होंने क्रिएटिवटी को साधा है  और यह सिखाया है कि मुख्यधारा में रहते हुए भी क्रिएटिव काम किया जा सकता है, विविधता दी जा सकती है, काम के साथ भरपूर इंज्वाय किया जा सकता है। 'टाइमÓ व 'लाइफÓ पत्रिका द्वारा शताब्दी के सौ महत्वपूर्ण व्यक्तियों में शामिल स्पीलबर्ग की फिल्म की हर विधा में पकड़ है और बीते चार दशकों में उन्होने साइंस फिक्शन, एडवेंचर्स, बलि, गुलामी, युद्ध और आतंकवाद जैसे विषयों पर फिल्में दी हैं। १९९३ में फिल्म 'शिंडलर्स लिस्टÓ व 1998 में 'सेविंग प्राइवेट रेयानÓ के लिए उन्हें बेस्ट डायरेक्टर का अकादमी अवार्ड भी मिल चुका है। अपनी फिल्मों में मानव प्रयासों को चित्रित करने के कारण वे 'लिबर्टीÓ मेडल से भी नवा•ो गए हैं। जुरासिक पार्क, जॉ•ा इंडियना जोंस उनकी अन्य प्रसिद्ध फिल्में हैं।

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