30 August 2012

वाचस्‍पति और भामति

वाचस्‍पति मिश्र का विवाह हुआ। पिता ने आग्रह किया, वाचस्‍पति की कुछ समझ में नहीं आया। इसलिए उन्‍होंने हां भर दी। सोचा, पिता जो कहते होंगे, ठीक ही कहते होंगे। वाचस्‍पति लगा था परमात्‍मा की खोज में। उसे कुछ और समझ में नहीं आ रहा था। कोई कुछ भी बोले,वह परमात्‍मा की ही बात समझता था। पिता ने वाचस्‍पति को पूछा, विवाह करोगे? उसने कहा हां।
उसने शायद कुछ और सुना होगा, की परमात्‍मा से मिलोंगे। जैसा की हम सब के साथ होता है। जो धन की खोज में लगा है उससे कहो, धर्म खोजोंगे? वह समझता है,शायद कह रहे है, धन खोजोंगे, उसने कहा, हां। हमारी जो भीतर खोज होती है। वहीं हम सुन पाते है। वाचस्‍पति ने शायद सुना; हां भर दी।
फिर जब घोड़े पर बैठ कर ले जाया जाने लगा, तब उसने पूछा कहां ले जा रहे हो? उसके पिता ने कहा, पागल तूने हां भरी थी। विवाह करने चल रहे है। तो फिर उसने न कहना उचित न समझा; क्‍योंकि जब हाँ भर दी थी और बिना जाने भर दी थी, तो परमात्‍मा की मर्जी होगी।
वह विवाह करके लौट आया। लेकिन पत्‍नी घर में आ गई, और वाचस्‍पति को ख्‍याल ही न रहा। रहता भी क्‍या। न उसने विवाह किया था, न हां भरी थी। वह अपने काम में ही लगा रहा। वह ब्रह्म सूत्र पर एक टीका लिखता रहा। वह बारह वर्ष में टीका पूरी हुई। बारह वर्ष तक उसकी पत्‍नी रोज सांझ दीपक जला जाती। रोज सुबह उसके पैरों के पास फूल रख जाती दोपहर उसकी थाली सरका देती। जब वह भोजन कर लेता तो चुपके से उसकी थाली हटा ले जाती। बारह वर्ष के लम्‍बे समय तक अपनी पत्‍नी का वहां होने का वाचस्‍पति को पता ही नहीं चला। की वह वहां है। पत्‍नी ने कोई उपाय नहीं किया कि पता चल जाए; बल्‍कि सब उपाय किए कि कहीं भूल-चूक से पता न चल जाए, क्‍योंकि उनके काम में बाधा न पड़े।
बारह वर्ष जिस पूर्णिमा की रात वाचस्‍पति का काम आधी रात को पूरा हुआ और वाचस्‍पति उठने लगे, तो उनकी पत्‍नी ने दीया उठाया—उनको राह दिखाने के लिए उनके बिस्‍तर तक पहली दफा बारह वर्ष में, कथा कहती है। वाचस्‍पति ने अपनी पत्‍नी का हाथ देखा। क्‍योंकि बारह वर्ष में पहली दफा काम समाप्‍त हुआ था। अब मन बंधा नहीं था किसी काम में। हाथ देखा, चूड़ियाँ देखीं, चूड़ियों की आवज सूनी, लौट कर पीछे देखा और कहा, स्‍त्री, इस आधी रात अकेले मेरी कुटिया में। तू कौन है? यहां कैसे आई। द्वारा दरवाजे तो सब बंध है। तू कहां से आई है? इतनी रात को एक पराये मर्द के कमरे में। चल तू जहां से आई है मैं तुझे वहां पहुंचा दूँ।
उसकी पत्‍नी ने कहा: शायद आप भूल गये होगें। बहुत काम था। बाहर वर्ष से आप इस काम में लगे हो। आप आपने काम में इतना तल्लीन हो। आपके आस पास क्‍या घट यहाँ है, कोन आता है। इसकी खबर तक नहीं है। बारह वर्ष पहले आप ख्‍याल करो, शायद याद आ जाये। आप मुझे पत्‍नी की तरह घर लेकर आये थे। तब से मैं यहीं हूं।
वाचस्‍पति रोने लगा। उसने कहा, यह तो बहुत देर हो गई। क्‍योंकि मैंने तो प्रतिज्ञा कर रखी है कि जिस देन यह ग्रंथ पूरा हो जायेगा, उसी दिन घर का त्‍याग कर दूँगा। तो यह तो मेरे जाने का वक्‍त हो गया। भोर होने के करीब है; तो मैं तो जा रहा हूं। पागल, तूने पहले क्‍यों नहीं बताया। थोड़ा भी तू इशारा कर सकती थी। लेकिन अब बहुत देर हो गई है।
वाचस्‍पति की आंखों में आंसू देख कर पत्‍नी ने अपना सर उनके चरणों में रख दिया। और कहने लगी: जो भी मुझे मिल सकता था। वह इन आंसुओं से मिल गया। इससे सुंदर और क्‍या हो सकता है। यही आपकी पूर्णता एक दिन मुझे भी पूर्ण कर देगा। इससे कीमती और दुनियां में कुछ और हो भी नहीं सकता हे। अब मुझ कुछ भी नहीं चाहिए। आप निश्‍चिंत जाएं। और मैं क्या पा सकती थी? मैं धन्‍य हुई, मुझे बहुत कुछ मिल गया। आप दिल पर बोझ ले कर मत जाना। सब निरझरा हो कर जाना।
वाचस्‍पति ने अपने ब्रह्म सूत्र की टीका का नाम ‘’ भामति’’ रखा है। भामति को कोई संबंध टीका से नहीं है। ब्रह्म सूत्र से कोई लेना देना नहीं है। यह उसकी अपनी पत्‍नी का नाम था। यह कह कर की मैं कुछ और तेरे लिए कर नहीं सकता हूं। लेकिन मुझे लोग चाहे भूल जाये। तुझे न भूले, इसलिए भामति नाम देता हूं। अपने ग्रंथ को। वाचस्‍पति को बहुत लोग भूल गए है; भामति को भूलना मुश्‍किल है। भामति लोग पढ़ते है। अद्भुत टीका है। ब्रह्म सूत्र की वैसी दूसरी टीका नहीं है। उस का नाम भामति है।
फेमिनिन मिस्‍ट्रि इस स्‍त्री के पास होगी। और मैं मानता हूं कि उस क्षण में उसने वाचस्‍पति को जितना पा लिया होगा, उतना हजार वर्ष चेष्‍टा करके कोई स्‍त्री किसी पुरूष को नहीं पा सकती । उस क्षण में, उस क्षण‍ में वाचस्‍पति जिस भांति एक हो गया होगा इस सत्री के ह्रदय से, वैसा कोई पुरूष को कोई स्‍त्री कभी नहीं पा सकती । क्‍योंकि फेमिनिन मिस्ट्रि वह जो रहस्‍य है। वह अनुपस्‍थित का है।
छुआ क्‍या प्राण को वाचस्‍पति के? कि बारह वर्ष, और उस स्‍त्री ने पता भी न चलने दिया कि मैं यहां हूं। और वह रोज दिया उठाती रही होगी। जलती रही होगी। कपड़े धोती रही होगी स्‍नान का पानी खर देती होगी। भोजन परोस देती होगी। पर अपने होने का वाचस्‍पति को अहसान तक ने होने दिया, बहार ही नहीं वह अंदर के अहं को भी देखती रही है। कि में हूं। वाचस्‍पति ने कहा की आज तक तेरा हाथ भी मुझे क्‍यों न दिखाई दिया क्‍या में इतना अंधा हो गया था।
भामति ने कहां की अगर मेरा हाथ भी आपको दिखाई पड़ जाता, तो मेरे प्रेम में कमी साबित न हो गई होती। मैं प्रतीक्षा कर सकती थी, कि आपको मेरे होने पता भी ने चले में अपने में इतनी विलय होकर आपके कमरे में आती थी कि मेरी उर्जा भी आपको छू नहीं पाती थी।
तो जरूरी नहीं कि कोई स्‍त्री स्‍त्रैण रहस्‍य को उपलब्‍ध ही हो। यह तो लाओत्‍से ने नाम दिया, क्‍योंकि यह नाम सूचक है और समझा सकता है। पुरूष भी हो सकता है। असल में आस्‍तित्‍व के साथ तादात्म्य उन्‍हीं को होता है। जो इस भांति प्रार्थना पूर्ण को उपलब्‍ध होते है।
इस स्‍त्रैण रहस्‍यमयी का द्वार स्‍वर्ग और पृथ्‍वी जन्‍मे और चाहे स्‍वर्ग, इस आस्‍तित्‍व की गहराई में जो रहस्‍य छिपा हुआ है। उससे ही सबका जन्‍म होता है। इसलिए मैंने कहा, जिन्‍होंने परमात्‍मा को मदर, मां की तरह देखा,दुर्गा या अंबा की तरह देखा, उनकी समझ परमात्‍मा को पिता की तरह देखने से ज्‍यादा गहरी है। अगर परमात्‍मा कहीं भी है। तो वह स्‍त्रैण होगा। क्‍योंकि इतने बड़े जगत को जन्‍म देने का क्षमता पुरूष में नहीं है। इतने विराट चांद-तारे जिससे पैदा होते हों, उसके पास गर्भ चाहिए। बिना गर्भ के यह संभव नहीं है।
ओशो ताओ उपनिषद—1, प्रवचन -18

तीर्थ - अल्‍कुफा एक रहस्‍य

तीर्थ शब्‍द का अर्थ होता है—घाट। उसका अर्थ होता है, ऐसी जगह जहां से हम उस अनंत सागर में उतर सकते है। जैनों का शब्‍द तीर्थकर तीर्थ से बना है, उसका अर्थ है तीर्थ को बनानेवाला। असल में उस को ही तीर्थ कहां जा सकता है। तीर्थकर कहा जा सकता है जिसने ऐसा तीर्थ निर्मित किया हो जहां साधारण जन खड़े होते, पाल खोलते, ऐसे ही यात्रा पर संलग्न हो जाए। अवतार न कहकर तीर्थकर कहा, और अवतार से बड़ी घटना तीर्थ कर है। क्‍योंकि परमात्‍मा, आदमी में अवतरित हो यह तो एक बात है लेकिन आदमी परमात्‍मा में प्रवेश का तीर्थ बना ले, यह और भी बड़ी बात हे।
जैन, परमात्‍मा में भरोसा करनेवाला धर्म नहीं है, आदमी की सामर्थ्‍य में भरोसा करनेवाला धर्म हे। इसलिए तीर्थ और तीर्थकर का जितना गहरा उपयोग जैन कर पाए उतना कोई भी नहीं कर पाया। क्‍योंकि यहां तो कोई ईश्‍वर की कृपा पर उनको ख्‍याल नहीं है। ईश्‍वर कोई सहारा दे सकता है। इसका कोई ख्‍याल नहीं है। आदमी अकेला है, और आदमी को अपनी ही मेहनत से यात्रा करनी है।
लेकिन दो रास्‍ते हो सकते है। एक-एक आदमी अपनी मेहनत करे। पर तब शायद कभी करोड़ो में एक आदमी उपलब्‍ध हो पाएगा। लेकिन हवाओं का सहारा लेकर यात्रा बड़ी आसान होती है। तो क्‍या अध्यात्मिक हवाएँ संभव है। उसपर ही तीर्थ का सब कुछ निर्भर है। क्‍या यह संभव है कि जब महावीर जैसा एक व्‍यक्‍ति खड़ा होता है तो उसके आप-पास किसी अनजाने आयाम में कोई प्रवाह शुरू होता है। क्‍या यह किसी एक ऐसी दिशा में बहाव को निर्मित करता है कि बहाव में कोई पड़ जाए तो बह जाए, वही बहाव तीर्थ है।
इस पृथ्‍वी पर तो उसके जो निशान है वह भौतिक निशान है, लेकिन वे स्‍थान न खो जाए इसलिए उन भौतिक निशानों की बड़ी सुरक्षा की गयी है। मंदिर बनाए गए है उन जगहों पर, या पैरों के चिन्‍ह बनाए गए है उन जगहों पर यह मूर्तियां खड़ी की गई है उन जगहों पर और उन जगह को हजारों वर्षो तक वैसा का वैसा रखने की चेष्टा की गयी है। इंच भर भी वह जगह न हिल जाए, जहां घटना घटी है कभी बड़े-बड़े खज़ाने गडाए गए है आज भी उनकी खोज चलती है।
जैसे की रूस के आखिरी जार का खजाना अमरीका में कहीं गड़ा है। जो कि पृथ्‍वी का सबसे बड़ा खजाना है, और आज भी खोज चलती है। वह खजाना है, यह पक्‍का है, क्‍योंकि बहुत दिन नहीं हुए…..अभी उन्‍नीस सौ सत्रह को घटे बहुत दिन नहीं हुए। उसका इंच-इंच हिसाब भी रखा गया है कि यह कहां होगा। लेकिन डि कोड नहीं हो पा रहा है। वह जो हिसाब रखा गया है उसको समझा नहीं जा पा रहा है कि एक्‍जैक्‍ट जगह कहां है।
जैसे कि ग्‍वालियर में एक बड़ा खजाना ग्‍वालियर फेमिली का है। जिसका फेमिली के पास सारा का सारा हिसाब है, लेकिन फिर भी जगह नहीं पकड़ी जा रही है कि वह जगह कहां है। वह डि कोड नहीं हो रहा है। नक्‍शा जो है—इस तरह से सब नक्‍शे गुप्‍त भाषा में ही निर्मित किए जाते हे। अन्‍यथा कोई भी डि कोड कर लेगा। समान्य भाषा में वे नहीं लिखे जाते।
इन तीर्थों की भी पूरा का पूरा सूचन है। इसलिए जरूरी है जैसा कि आम लोग समझ लेते है। और वह आम गड़बड़ न कर पाएँ इसलिए बड़े उपाय किए जाते है। वह मैं आपको कहूं तो बहुत हैरानी होगी। जैसे जहां आप जाते है ओर आपसे कहा जाता है कि यह जगह है जहां महावीर निर्वाण को उपलब्‍ध हुए—बहुत संभावना तो यह है कि वह जगह नहीं होंगी। उससे थोड़ी हटकर वह जगह होगी जहां उनका निर्वाण हुआ। उस जगह पर तो प्रवेश उनको ही मिल सकेगा, जो सच में ही पात्र है और उस यात्रा पर निकल सकते है। एक फाल्‍स जगह, एक झूठी जगह आम आदमी से बचाने की लिए खड़ी की जाएगी। जिसपर तीर्थयात्री जाता रहेगा। नमस्‍कार करता रहेगा और लौटता रहेगा। वह जगह तो उनको ही बतायी जाएगी जो सचमुच उस जगह आ गए है। जहां से वह सहायता लेने के योग्‍य है या उनको सहायता मिलनी चाहिए। ऐसी बहुत सी जगह है।
अरब में एक गांव है जिसमें आज तक किसी सभ्‍य आदमी को प्रवेश नहीं मिल सका—आज तक अभी भी। चाँद पर आप प्रवेश कर गए लेकिन छोटे से गांव अल्‍कुफा में आज तक किसी यात्री को प्रवेश नहीं मिल सका। सच तो यह है कि आज तक यह ठीक हो सका नहीं कि वह कहां है। और वह गांव है। इसमें कोई शक-शुबहा नहीं, क्‍योंकि हजारों साल से इतिहास उसकी खबर देता है। किताबें उसकी खबर देती है। उसके नक्‍शे है।
वह गांव कुछ बहुत प्रयोजन से छिपाकर रखा गया है। और सूफियों में जब कोई बहुत गहरी अवस्‍था में होता है तभी उसको उस गांव में प्रवेश मिलता है। उसकी सीक्रेट कि है। अल्‍कुफा के गांव में उसी सूफी को प्रवेश मिलता है जो ध्‍यान में उसका रास्‍ता खोज लेता है। अन्‍यथा नहीं। उसकी की हे फिर तो उसे कोई रोक भी नहीं सकता। अन्‍यथा कोई उपाय नहीं है। नक्‍शे है, सब तैयार है, लेकिन फिर भी उसका पता नहीं लगता वह कहां हे। वह सब एक अर्थ में नक्‍शे थोड़े से झूठ है ओर भटकाने के लिए है। उन नक़्शों को जो मानकर चलेगा वह अल्‍कुफा कभी नहीं पहुंच पाएगा।
इसलिए बहुत यात्री यूरोप के पिछले तीन सौ वर्षों में सैकड़ों यात्री अल्‍कुफा को ढूंढने गए है। उनमें से कुछ तो कभी लौटें नहीं मर गय। जो लौटे वे कभी कहीं पहुंचे नहीं। वे सिर्फ चक्‍कर मारकर वापस आ गए। सब तरह से कोशिश की जा चुकी है। पर उसकी कुंजी है। और वह कुंजी एक विशेष ध्‍यान है; और उस विशेष ध्‍यान में ही अल्‍कुफा पूरा का पूरा प्रगट होता है। और वह सूफी उठता है और चल पड़ता है। और जब इतनी योग्‍यता हो तभी उस गांव से गति है। वह एक सीक्रेट तीर्थ है जो इसलाम से बहुत पुराना है। लेकिन उसको गुप्‍त रखा गया है। इन तीर्थों में भी जो जाहिर है। इन तीर्थों में भी जो जाहिर दिखाई पड़ते है, वे असली तीर्थ नहीं है। आस पास असली तीर्थ है।
जैसे एक मजेदार घटना घटी। विश्वनाथ के मंदिर में काशी में जब विनोबा हरि जनों को लेकर प्रवेश कर गए, तो कर पात्री ने कहा कि कोई हर्ज नहीं, हम दूसरा मंदिर बना लेंगे, और दूसरा मंदिर बनाना शुरू कर दिया। वह मंदिर तो बेकर हो गया। तो दूसरा मंदिर बनाना शुरू कर दिया। साधारणत: देखने में विनोबा ज्‍यादा समझदार आदमी मालूम पड़ते है कर पात्री से। असलियत ऐसी नहीं है। साधारण देखने में कर पात्री निपट पुराणपंथी, नासमझ, आधुनिक जगत और ज्ञान से वंचित मालूम पड़ते है। यह थोड़ी दूर तक सच है बात। लेकिन फिर भी जिस गहरी बात की वह ताईद कर रहे है उसके मामले में वह ज्‍यादा जानकार है।
सच बात यह है कि विश्वनाथ का मंदिर भी असली नहीं है। और वह जो दूसरा बनाएँगे वह भी असली नहीं होगा। असली मंदिर तो तीसरा है। लेकिन उसकी जानकारी सीधी नहीं दी जा सकती। और असली मंदिर को छिपाकर रखना पड़ेगा, नहीं तो कभी भी कोई भी धर्म सुधारक उसको भ्रष्‍ट कर सकता है। अभी जो विश्वनाथ का मंदिर है खड़ा हुआ, इसको तो नष्‍ट किया जा चुका है। इसमें कोई उपाय नहीं है। इसमें कोई कठिनाई नहीं है चाहे नष्‍ट कर दो।
वह जो दूसरा बनाया जा रहा है वह भी फाल्‍स है। लेकिन एक फाल्स बनाए ही रखना पड़ेगा, ताकि असली पर नजर न जाए। और असली को छिपाकर रखना पड़ेगा। विश्वनाथ के मंदिर में प्रवेश की कुंजियों है, जैसे अल्‍कुफा में प्रवेश की कुंजियों है। उसमें कभी कोई सौभाग्‍यशाली संन्‍यासी प्रवेश पाता है। उसमें कोई ग्रह स्थ कभी प्रवेश नहीं पाया और कभी पा नहीं सकता। सभी संन्‍यासी को भी उसमें प्रवेश नहीं मिल पाते है कभी कोई सौभाग्‍यशाली संन्‍यासी उसमें प्रवेश पाते है। और उसे सब भांति छिपाकर रखा जाएगा। उसके मंत्र है और जिनके प्रयोग से उसका द्वार खोलेगा, नहीं तो उसका द्वार नहीं खुले गा। उसका बोध ही नहीं होगा,उसका ख्‍याल ही नहीं आएगा।
काशी में जाकर इस मंदिर की लोग पूजा, प्रार्थना करके वापस लौट आएंगे। मगर इस मंदिर की भी अपनी एक सेंक्‍टिंटी बन गया थी। यह झूठा था, लेकिन फिर भी लाखों वर्षों से उसको सच्‍चा मानकर चला जा रहा था। उसमें भी एक तरह की पवित्रता आ गयी।
सारे धर्मों ने कोशिश की है कि उनके मंदिर में या उनके तीर्थ में दूसरे धर्म का व्‍यक्‍ति प्रवेश न करे। आज हमें बेहूदगी लगती है यह बात। हम कहेंगे इससे क्‍या मतलब है। लेकिन जिन्‍होंने व्‍यवस्‍था की थी उनके कुछ करण थे। यह करीब-करीब मामला ऐसा ही है जैसे कि ऐटमिक एनर्जी की एक लेबोरेटरी है और अगर यह लिखा हो कि यहां सिवाय ऐटमिक साइंटिस्‍ट के कोई प्रवेश नहीं करेगा। तो हमें कोई कठिनाई नहीं होगी। हम कहेंगे, बिलकुल ठीक है, बिलकुल दुरुस्त है। खतरे से खाली नहीं है दूसरे आदमी का भीतर प्रवेश करना।
लेकिन यही बात हम मंदिर और तीर्थ के संबंध में मानने को राज़ी नहीं है। क्‍योंकि हमें यह ख्‍याल ही नहीं है कि मंदिर और तीर्थ की अपनी साइंस है। और वह विशेष लोगों के प्रवेश के लिए है। आज भी एक मरीज बीमार पडा है और उसके चारों तरफ डाक्‍टर खड़े होकर बात करते रहते है। मरीज सुनता है, समझ तो कुछ नहीं आता। क्‍योंकि वह किसी खास कोड लेंग्‍वेज में बात करते है। वह लैटिन या ग्रीक शब्‍दों को उपयोग कर रहे है। यह मरीज के हित में नही है कि उस समझे। इसलिए सारे धर्मों ने अपनी कोड़ लेंग्‍वेज विकसित की थी। उसके गुप्‍त तीर्थ थे, उसकी गुप्‍त भाषाएँ थीं। उसके गुप्‍त शास्‍त्र थे। और आज भी जिनको हम तीर्थ समझ रहे है उनमें बहुत कम संभावना है सही होने की। जिनको हम शास्‍त्र समझ रहे है। उनमें बहुत कम संभावना है सही होने की।
वह जो सीक्रेट ट्रैडीशनल है, उसे तो छिपाने की निरंतर कोशिश की जाती है। क्‍योंकि जैसे ही वह आम आदमी के हाथ में पड़ती है, उसके विकृत हो जाने का डर है। और आन आदमी उससे परेशान ही होगा, लाभ नहीं उठा सकता। जैसे अगर सूफियों के गांव अल्‍कुफा में अचानक आपको प्रवेश करवा दिया जाए तो पागल हो जाएंगे। अल्‍कुफा की यह परंपरा है कि वहां अगर कोई आदमी आकस्‍मिक प्रवेश कर जाए तो पागल होकर लौटे गा—वह लौटे गा ही, इसमें किसी को कोई कसूर नहीं हे।
क्‍योंकि अल्‍कुफा इस तरह की पूरी के पूरे मनस तरंगों से निर्मित है कि आपका मन उसको झेल नहीं पाएगा। आप विक्षिप्‍त हो जाएंगे। उतनी सामथ्‍र्य और पात्रता के बिना उचित नहीं है। कि वहां प्रवेश हो। जैसे अल्‍कुफा के बाबत कुछ बातें ख्‍याल में ले लें तो और तीर्थों का ख्‍याल में आ जाएगा।
जैसे अल्‍कुफा में नींद असंभव है, कोई आदमी सो नहीं सकता। तो आप पागल हो ही जाएंगे जब तक कि आपने जागरण का गहन प्रयोग न किया हो। इसलिए सूफी फकीर की सबसे बड़ी जो साधना है वह रात्रि जागरण है, रातभर जागते रहेंगे। और एक सीमा के बाद ….एक बहुत सोचने जैसी बात है—एक आदमी नब्‍बे दिन तक खाना न खाए तो भी सिर्फ दुर्बल होगा, मर नहीं जाएगा, पागल नहीं हो जाएगा।
साधारण स्‍वस्‍थ आदमी आसानी से नब्‍बे दिन, बिना खाए रह सकता है। लेकिन साधारण स्‍वस्‍थ आदमी इक्‍कीस दिन भी बिना सोए नहीं रह सकता। ती महीने बिना खाए रह सकता है। तीन सप्‍ताह बिना सोए नहीं रह सकता। ती सप्‍ताह तो बहुत ज्‍यादा कह रहा हूं, एक सप्‍ताह भी बिना सोए रहना कठिन मामला है। पर अल्‍कुफा में नींद असंभव है।

खिड़की का चौखटा- एक सूफी कथा

एक चोर चोरी के इरादे से खिड़की की राह, एक महल मैं घुस रहा था। कि अचानक उसके चढ़ने और पकड़ने के कारण जिस खिड़की से वह अंदर महल में जा रहा था। उसके वज़न के कारण टुट गई और चोर नीचे जमीर पर जाकर गिरा। काफ़ी ऊचाई से गिरा था इस कारण उसकी एक टाँग की हड्डी टुट गइ। चोर न जाकर अदालत में मालिक के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया कि में इनके घर चोरी करेने के इरादे से अंदर जा रहा था। और इनकी खिड़की इतनी बेकार थी की मैं नीचे गिर गया और मेरी टाँग टुट गई। अदालत ने गृहपति को बुलाया और पूछा। क्‍या यह बात सच है। गृह पति ने कहां हाँ जनाब सुबह हमारी खिड़की टूट कर नीचे जमीन पर गिरी हुई जरूर थी। बाकी तो मैं कुछ नहीं जानता की क्‍या माजरा है।
जज ने कहां माजरा यह है उस चोर को देखते हो वह तुम्‍हारे घर चोरी के इरादे से अंदर जा रहा था। उस खिड़की के टुट कर नीचे गिरने की वजह से उसकी टाँग टुट गर्इ। अब बताओ क्‍या करे।
मालिक ने कहा जनाब मेरा क्‍या कसूर है, यह तो उसकी गलती है, जिसने यह खिड़की का चौखटा बनाया है। आप उस बढ़ाई पर मुकदमा चलाईये।
अगले दिन बढ़ाई को बुलाया गया। तब बढ़ाई ने कहा मेरा क्‍या कसूर है जनाब यह तो राज मिश्री की गलती है। खिड़की के होल पास उसने ठीक से नहीं दबाये होंगे इस लिए वह निकल गये।
राज मिश्री आया उससे पूछा गया तब राज मिश्री ने सफाई में कहां, इसमें मेरे उपर आप नाहक दोष मढ़ रहे हो। दोष के लिए तो वह सुंदर स्‍त्री का है, जो उसी वक्‍त उधर से निकली थी; जब मैं यह खिड़की का चौखटा लगा रहा था। उस स्‍त्री को बुलाया गया और पूछा। तब उस स्‍त्री ने कहां: ‘’ये सारा का सारा दोष इस मुये दुपट्टे का ही है, जो मैं उस दिन इसे आढ़े हुए थी। जो इस कि चतुराई के साथ इंद्रधनुषी रंग में रंगा गया।‘’ वरना तो मुझे कोई देखता भी नहीं। जब भी में बन संवर कर निकली हूं, ऐसा तो पहली बार हुआ है। अब मेरा क्‍या दोष जनाब।
इस पर न्‍यायपति ने कहा, ‘’अब अपराधी का पता चल गया। इस चोर की टाँग टूटने की सारी की सारी जिम्‍मेवार उस रंगरेज की है। जिसने वह दुपट्टा इतनी चतुराई से इंद्रधनुषी रंग में रंगा हे। उसी सब के कारण इस चोर की टाँग टुट गई।
लेकिन हद तो तब हो गई जब उस रंगरेज को पकड़ कर अदालत में लाया गया। और उसे न्‍यायपति के सामने जब पेश किया गया। यह देख कर सब दंग रह गये कि वह रंग रेज़ कोई और नहीं, उस स्‍त्री का पति था और वही चोर था जिसकी उस खिड़की के चौखटे से गिरकर की टाँग टूटी थी।

पाप-पूण्‍य ओर काशी

आखिरी बात जो तीर्थ के बाबत ख्‍याल ले लेना चाहिए, वह यह कि सिंबालिक ऐक्‍ट का, प्रतीकात्‍मक कृत्‍य का भारी मूल्‍य है। जैसे जीसस के पास कोई आता है और कहता है। मैंने यह पाप किए। वह जीसस के सामने कन्‍फेस कर देता है, सब बता देता है मैंने यह पाप किए। जीसस उसके सिर पर हाथ रख कर कह देते है कि जा तुझे माफ किया। अब इस आदमी न पाप किए है। जीसस के कहने से माफ कैसे हो जाएंगे? जीसस कौन है,और हाथ रखने से माफ हो जाएंगे, जिस आदमी ने खून किया, उसका क्‍या होगा, या हमने कहा, आदमी पाप करे और गंगा में स्‍नान कर ले, मुक्‍त हो जाएगा। बिलकुल पागलपन मालूम हो रहा है। जिसने हत्‍या की है, चोरी की है, बेईमानी की हे, गंगा में स्‍नान करके मुक्‍त कैसे हो जाएगा।
यह दो बातें समझ लेनी जरूरी है। एक तो यह, कि पाप असली घटना नहीं है। स्‍मृति असली घटना है—मैमोरी । पाप नहीं, ऐक्‍ट नहीं असली घटना जो आप में चिपकी रह जाती है। वह स्‍मृति है। आपने हत्‍या की है। यह उतना बड़ा सवाल नहीं है। आखिर में। आपने हत्‍या की है, यह स्‍मृति कांटे की तरह पीछा करेगी।
जो जानते है…..वे जो जानते है कि हत्‍या की है या नहीं। वह नाटक का हिस्‍सा है, उसका कोई मूल्‍य नहीं है। न कभी मरता है कोई न कभी मार सकता है कोई। मगर यह स्‍मृति आपका पीछा करेगी कि मैंने हत्‍या की, मैंने चोरी की। यह पीछा करेगी और यह पत्‍थर की तरह आपकी छाती पर पड़ी रहेगी। वह कृत्‍य तो गया, अनंत में खो गया, वह कृत्‍य तो अनंत ने संभाल लिया। सच तो यह है सब कृत्‍य तो अनंत के है; आप नाहक उसके लिए परेशान है। और चोरी भी हुई है आपसे तो अनंत के ही द्वारा आपसे हुई है। हत्‍या भी हुई है तो भी अनंत के द्वारा आपसे हुई है, आप नाहक बीच में अपनी स्‍मृति लेकर खड़े है। मैंने किया। अब यह ‘’मैंने किया’’ यह स्मृति आपकी छाती पर बोझ है।
क्राइस्‍ट कहते हैं, तुम कन्‍फेस कर दो, मैं तुम्‍हें माफ किए देता हूं। और जो क्राइस्ट पर भरोसा करता है वह पवित्र होकर लोट गा। असल में क्राइस्‍ट पाप से तो मुक्‍त नहीं कर सकते, लेकिन स्मृति से मुक्‍त कर सकते हे। स्‍मृति ही असली सवाल हे। गंगा पाप से मुक्‍त नहीं कर सकती, लेकिन स्‍मृति से मुक्त कर सकती हे। अगर कोई भरोसा लेकर गया है। कि गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप से बाहर हो जाऊँगा और ऐसा अगर उसके चित में है। उसकी कलेक्‍टव अनकांशेस में है, उसके समाज की करोड़ों वर्ष से छुटकारा नहीं होगा वैसे, क्‍योंकि चोरी को अब कुछ और नहीं किया जा सकता। हत्‍या जो हो गई, हो गयी लेकिन यह व्‍यक्‍ति पानी के बाहर जब निकला तो सिंबालिक एक्‍ट हो गया।
क्राइस्‍ट कितने दिन दुनिया में रहेंगे, कितने पापी यों से मिलेंगे,कितने पापी कन्‍फेस कर पाएंगे। इसके लिए हिंदुओं ने ज्‍यादा स्‍थायी व्‍यवस्‍था खोजी है। व्‍यक्‍ति से नहीं बांधा। यह नदी कन्‍फेशन लेती रहेगी। वह नदी माफ करती रहेगी, यह अनंत तक रहेगी, और ये धाराएं स्‍थायी हो जाएंगी। क्राइस्‍ट कितने दिन रहेंगे। मुश्‍किल से क्राइस्ट तीन साल काम कर पाए, कुल तीन साल। तीस से लेकर तैंतीस साल की अम्र तक, तीन साल में कितने पापी कन्‍फेस करेंगे। कितने पापी उनके पास आएंगे। कितने लोगों के सिर पर हाथ रखेंगे। यहां के मनीषी यों ने व्‍यक्‍ति से नहीं बांधा, धारा से बाँध दिया।
तीर्थ है, वहां जाएगा कोई, वह मुक्‍त होकर लौटे गा। तो स्‍मृति से मुक्‍त होगा। स्‍मृति ही तो बंधन है। वह स्वप्न जो आपने देखा, आपका पीछा कर रहा है। असली सवाल वही है, और निश्‍चित ही उससे छुटकारा हो सकता है। लेकिन उस छुटकारे में दो बातें जरूरी है। बड़ी बात तो यह जरूरी है कि आपकी ऐसी निष्‍ठा हो कि मुक्‍ति हो जाएगी। और आपकी निष्‍ठा कैसे होगी। आपकी निष्‍ठा तभी होगी जब आपको ऐसा ख्‍याल हो कि लाखों वर्ष से ऐसा वहां होता रहा है। और कोई उपाय नहीं है।
इसलिए कुछ तीर्थ तो बिलकुल सनातन है—जैसे काशी, वह सनातन है। सच बात यह है, पृथ्‍वी पर कोई ऐसा समय नहीं जब काशी तीर्थ नहीं था। वह एक अर्थ में सनातन है। बिलकुल सनातन है। यह आदमी का पुरानी से पुराना तीर्थ हे। उसका मूल्य बढ़ जाता है। क्‍योंकि इतन बड़ी धारा, सजेशन। वहां कितने लोग मुक्‍त हुए, वहां कितने लोग शांत हुए है। वहां कितने लोगों ने पवित्रता को अनुभव किया है, वहां कितने लोगों के पाप झड़ गए—वह एक लंबी धारा है। वह सुझाव गहरा होता चला जाता है। वह सरल चित में जाकर निष्‍ठा बन जाएगी। वह निष्‍ठ बन जाए तो तीर्थ कारगर हो जाता हे। वह निष्‍ठा न बन पाए तो तीर्थ बेकार हो जाता है। तीर्थ आपके बिना कुछ नहीं कर सकता। आपका कोऔपरेशन चाहिए। लेकिन आप भी कोऔपरेशन तभी देते है कि जब तीर्थ की एक धारा हो एक इतिहास हो।
हिंदू कहते है, काशी इस जमीन का हिस्‍सा नहीं है। इस पृथ्वी का हिस्‍सा नहीं है। वह अलग ही टुकडा है। वह शिव की नगरी अलग ही है। वह सनातन है। सब नगर बनेंगे, बिगड़े गे काशी बनी रहेगी। इसलिए कई दफा हैरानी होती है। व्‍यक्‍ति तो खो जाते है—बुद्ध काशी आये, जैनों के तीर्थकर काशी में पैदा हुए और खो गए। काशी ने सब देखा—शंकराचार्य आए, खो गए। कबीर आए खो गए। काशी ने तीर्थ देखे अवतार देखे। संत देखे सब खो गए। उनका तो कहीं कोई निशान नहीं रह जाएगा। लेकिन काशी बनी रहेगी। वह उन सब की पवित्रता को , उन सारे लोगों के पुण्‍य को उन सारे लोगों की जीवन धारा को उनकी सब सुगंध को आत्‍मसात कर लेती है और बना रहती हे।
यह जो स्‍थिति हे। यह निश्‍चित ही पृथ्‍वी से अलग हो जाती है। मेटाफरीकली। यह इसका अपना एक शाश्‍वत रूप हो गया, इस नगरी का अपना व्‍यक्‍तित्‍व हो गया। इस नगरी पर से बुद्ध गूजरें, इसकी गलियों में बैठकर कबीर ने चर्चा की है। यह सब कहानी हो गयी। वह सब स्वप्नवत् हो गया। पर यह नगरी उन सबको आत्‍मसात किए है। और अगर कभी कोई निष्‍ठा से इस नगरी में प्रवेश करे तो वह फिर से बुद्ध को चलता हुआ देख सकता है वह फिर से पाश्रर्वनाथ को गुजरते हुए देख सकता है। वह फिर से देखेगी तुलसी दास को वह फिर से देखेगी कबीर को।
अगर कोई निष्‍ठा से इस काशी के निकट जाए तो यह काशी साधारण नगरी ने रह जाएगी लंदन या बम्‍बई जैसी। एक असाधारण चिन्‍मय रूप ले लेगी। और इसकी चिन्मय ता बड़ी पुरातन है। इतिहास खो जाते है। असभ्यताऐं बनती है। आती है और चली जाती है। और यह अपनी एक अंत: धारा करने के प्रयोजन है। आप भी हिस्‍सा हो गए है एक अंत धारा को संजोए हुए चलती है। इसके रास्‍ते पर खड़ा होना,इसके घाट पर स्‍नान करना इसमें बैठकर ध्‍यान करने के प्रयोजन है। आप भी हिस्‍सा हो गए है एक अंत: धारा के। यह भरोसा कि मैं ही सब कुछ कर लुंगा,खतरनाक है। प्रभु का सहारा लिया जा सकता है, अनेक रूपों में—उसके तीर्थ में, उसके मंदिरों में उसका सहारा लिया जा सकता है। सहारे के लिए यह सारा आयोजन है।
यह कुछ बातें जो ठीक से समझ में आ सकें वह मैंने कहीं। बुद्धि जिनको देख पाये समझ पाये, पर यह पर्याप्‍त नहीं है। बहुत सी बातें है तीर्थ के साथ,जो समझ में नहीं आ सकेंगी पर घटित होती है। जिनको बुद्धि साफ-साफ नहीं देख पाएगी। जिनका गणित नहीं बनाया जा सकेगा। लेकिन घटित होती है।
–ओशो (मैं कहाता आंखन देखी)

तीर्थ ( अलौकिक निवास कैलाश

दो तीन बातें सिर्फ उल्‍लेख कर दूँ जो घटित होती है। जैसे कि आप कहीं भी जाकर एकांत में बैठकर साधना करें तो बहुत कम संभावना है कि आपको अपने आस पास किन्‍हीं आत्‍माओं की उपस्थिति का अनुभव हो। लेकिन तीर्थ में करें तो बहुत जोर से होगा। कहीं भी करें वह अनुभव नहीं होगा, लेकिन तीर्थ में आपको प्रेजेंस मालूम पड़ेगी—थोड़ी बहुत जोर से होगा। बहुत गहरा होगा। कभी इतनी गहन हो जाती है कि आप स्‍वयं मालूम पड़ेंगे कि कम है, और दूसरे की प्रेजेंस ज्‍यादा है।
जैसे कि कैलास—कैलास हिंदुओं का भी तीर्थ रहा है और तिब्‍बती बौद्धों का भी। पर कैलास बिलकुल निर्जन है, वहां कोई आवास नहीं है। कोई पुजारी नहीं है। कोर्इ पंडा नहीं है। कोई प्रगट आवास नहीं है कैलास पर। लेकिन जो भी कैलास पर जाकर ध्‍यान का प्रयोग करेगा वह कैलाश को पूरी तरह बसा हुआ पाएगा। जेसे ही कैलाश पर पहुँचेगा अगर थोड़ी भी ध्यान की क्षमता है तो कैलाश से कभी वह खबर लेकर लौटे गा कि वह निर्जन है। इतना सधन बसा है, इतने लोग है और इतने अदभुत लोग है। ऐसे कोई बिना ध्‍यान के कैलाश जाएगा, तो कैलाश खाली हे।
चाँद के संबंध में जो लोग और तरह से खोज करते है, उनका ख्‍याल नहीं है कि चाँद निर्जन हे। और जिन्‍होंने कैलाश का अनुभव किया है वह कभी नहीं मानेंगे कि चाँद निर्जन है। लेकिन आपके यात्री को चाँद पर कोई मिलेगा! जरूरी नहीं है इससे कि कोई न हो, पर आपके यात्री को कोई नहीं मिलेगा। जैनों के ग्रंथों में बहुत वर्णन है कि चाँद पर किस-किस तरह के देवता है, कि क्‍या है, पर अब वे बड़ी मुश्‍किल में पड़ गए है। जब पाया गया कि वहां कोई नहीं है। उनके साधु-संन्‍यासी बड़ी मुश्‍किल में है। वे बेचारे एक ही उपास कर सकते है, उन्‍हें कूद और तो पता नहीं है, वह यह कह सकते है कि तुम असली चाँद पर पहुंचे ही नहीं। वह इसके सिवाय और क्‍या कहेंगे। अभी गुजरात में कोई मुझे कह रहा था कि कोई जैन मुनि पैसा इकट्ठा कर रहे है यह सिद्ध करने के लिए कि तुम असली चाँद पर नहीं पहुंचे। ये वे कभी सिद्ध न कर पाएंगे।
आदमी असली चांद पर पहुंच गया है। लेकिन उनकी कठिनाई है कि उनकी किताब में लिखा है कि वहां आवास है, वहां इस-इस तरह के देवता रहते है। उनकी किताब में लिखा है, उनको खुद को तो कुछ पता नहीं। किताब तो आवास का कहती है। और अब वैज्ञानिक की रिपोर्ट है कि वहां कोई भी नहीं है। अब क्‍या करना है। तो साधारण बुद्धि जो कर सकती,वह यह है, कि वे लोग चाँद पर नहीं पहुँचे। क्‍योंकि अगर नहीं सिद्ध कर पाए तो ये मानना पड़ेगा कि हमारा शास्‍त्र गलत हुआ। तो वे जिद बाँध रखेंगे कि नहीं, तुम उस जगह नहीं पहुंचे।
एक जैन मुनि ने तो दावे से यह कहां कि कोई वहां पहुंचा ही नहीं। अब इनकार भी नहीं कर सकते, पहुंचे तो जरूर है, तो फिर कहां पहुंच गए है। कभी-कभी तो हास्यास्पद, रिडीकुलस हो जाती है बात। उन्‍होने कहा, कि वहां देवताओं के जो विमान ठहरे रहते है चारों तरफ, आप किसी विमान पर उतर गए। वह बड़े विराट विमान है। उसी पर उतर कर आप लौट आए है। आप ठीक चाँद की भूमि पर नहीं उतर सके। यह सब पागलपन है, लेकिन इस पागलपन के पीछे कुछ कारण है। यह कारण यह है कि एक धारा है, कोई अंदाजन बीस हजार वर्ष से जैनों की धारा है कि चाँद पर आवास है। पर वह उनके ख्‍याल में नहीं कह वह आवास किस तरह का है। वह आवास कैलास जैसा आवास है। वह आवास तीर्थों जैसा आवास है।
जब आप तीर्थ पर जाएंगे तो एक तीर्थ वह काशी है जो दिखाई पड़ती है। जहां आप ट्रेन पर से उतर जाएँगे स्‍टेशन से एक तो काशी वह है। काशी के दो रूप है। तीर्थ के दो रूप है। एक तो मृण्‍मय रूप है। यह जो दिखाई पड़ रहा है। जहां कोई भी जाएगा सैलानी और घूमकर लौट आएगा। और एक उसका चिन्‍मय रूप है। जहां वहीं पहुंच जाएगाजो अंतरस्‍थ होगा, जो ध्‍यान में प्रवेश करेगा, तो उसके लिए काशी बिलकुल और हो जाएगी। इधर काशी के सौंदर्य का इतना वर्णन है, और इस काशी को देखो तो फिर लगता है कि वह कवि की कल्‍पना है। इससे ज्यादा गंदी कोई वसती नहीं है। यह काशी जिसको हम देखकर आ रहे है। पर किस काशी की बातें कर रहे हो तुम। किस काशी की बात हो रही है। किस काशी के सौंदर्य की जो अपूर्व है। जैसा कोई नगर नहीं आया है इस जगत में । यह सब तुम किसकी बात कर रहे हो, यही काशी अगर है, तब फिर यह सब कवि कल्‍पना हो गई। नहीं, पर वह काशी भी है। नहीं, पर वह काशी भी है। और एक कान्‍टेक्‍ट फील्ड है यह काशी, यहां उस काशी और इस काशी का मिलन होता है।
जो यात्री सिर्फ ट्रेन में बैठकर गया है, वह इस काशी से वापस लौटकर आ जाएगा। वह जो ध्‍यान में भी बैठकर गया है वह उस काशी से भी संपर्क साध पाता है। तब इसी काशी के निर्जन घाट पर उनसे भी मिलना हो जाता है जिनसे मिलने की आपको कभी कल्‍पना नहीं होती।
मैंने अभी बताया,कैलास पर अलौकिक निवास है। करीब-करीब नियमित रूप से। नियम कैलाश का रह है कि कम से कम पाँच सौ बौद्ध-बौद्ध वहां रहे ही, उससे कम नहीं। पाँच सौ बुद्धत्‍व को प्राप्‍त व्‍यक्‍ति कैलाश पर रहेंगे ही। और जब भी एक उनमें से विदा होगा किसी और यात्रा पर, तो दूसरा जब तक न हो तब तक वह विदा नहीं हो सकता। पाँच सौ की संख्‍या वहां पूरी रहेगी। उन पाँच सौ की मौजूदगी कैलाश को तीर्थ बनाती है। लेकिन यह बुद्धि से समझने की बात नहीं हे। इसलिए मैंने पीछे छोड़ रखी। काशी का भी नियमित आंकड़ा है कि उतने संत वहां रहेंगे ही। उनमें कभी कमी नहीं होगी। उनमें से एक को विदा तभी मिलेगी जब दूसरा उस जगह स्‍थापित हो जाएगा।
असली तीर्थ वहीं है। और उनसे जब मिलन होता है तो तीर्थ में प्रवेश करते है। पर उनके मिलन का कोई भौतिक स्‍थल भी चाहिए। आप उनको कहां खोजते फिरेंगे। उस अशरीरी घटना को आप ने खोज सकेंगे, इसलिए भौतिक स्‍थल चाहिए। जहां बैठकर आप ध्‍यान कर सकें और उस अंतर् जगत में प्रवेश कर सकें, जहां संबंध सुनिश्‍चित है।
तीर्थ बुद्धि से ख्‍याल में नहीं आएगा। बुद्धि से कोई संबंध नहीं है तीर्थ का। ठीक तीर्थ का अर्थ जो दिखाई पड़ जाता है वह नहीं है—छिपा है, उसी स्‍थान पर छिपा है। दूसरी बात, इस जमीन पर जब भी कोई व्‍यक्‍ति परम ज्ञान को उपलब्‍ध होकर विदा होता है। तो उसकी करूणा उसे कुछ चिन्‍ह छोड़ देने को कहती है। क्‍योंकि जिनको उसने रास्‍ता बताया। जो उसकी बात मानकर चले, जिन्‍होंने संघर्ष किया, जिन्‍होंने श्रम उठाया, उनमें से बहुत से ऐसे होंगे जो अभी नहीं पहुंच पाए। उनके पास कुछ संकेत तो चाहिए,जिनसे कभी भी जरूरत पड़ने पर वह संपर्क पुन; साध सकें।
इस जगत में कोई आत्‍मा कभी खोती नहीं। पर शरीर तो खो जाता है। तो उन आत्‍माओं के संपर्क साधने के लिए सूत्र चाहिए। उन सूत्रों के लिए तीर्थों ने ठीक वैसे ही काम किया जैसे कि आज हमारे राडार काम करते है। जहां तक आंखें नहीं पहुँचती वहां तक राडार पहुंच जाते है। जो आंखों से कभी देखें नहीं गए तारे, वह राडार देख लेते है। तीर्थ बिलकुल आध्‍यात्‍मिक राडार का इंतजाम है। जो हमसे छूट गए, जिनसे हम छूट गए, उनसे संबंध स्‍थापित किए जा सकते है।
इसलिए प्रत्‍येक तीर्थ निर्मित किया गया उन लोगों के द्वारा,जो अपने पीछे कुछ लोग छोड़ है, जो अभी रास्‍ते पर है, जो पहुंच नहीं गए, और जो अभी भटक सकते है। और जिन्‍हें बार-बार जरूरत पड़ जाएगी कि वह कुछ पूछ लें कुछ जान लें। कुछ आवश्‍यक हो जाए। थोड़ी जानकारी उन्‍हें भटका दे सकती है। क्‍योंकि भविष्‍य उन्‍हें बिलकुल ज्ञात नहीं है। आगे का रास्‍ता उन्‍हें बिलकुल पता नहीं है। तो उन सबने सूत्र छोड़े है। और सुत्रों को छोड़ने के लिए विशेष तरह की व्‍यवस्‍थाएं की है—तीर्थ खड़े किए, मंदिर खड़े किए, मंत्र निर्मित किए। मूर्तियां बनायी सबका आयोजन किया। और सबका आयोजन एक सुनिश्‍चित प्रक्रिया है, जिसे हम ‘रिचुअल’ कहते हे, वह एक सुनिश्‍चित प्रकिया है।
अगर एक जंगली आदिवासी को हम ले आएं और वह आकर देखे कि जब भी प्रकाश करना होता है तो आप अपनी कुर्सी से उठते है, दस कदम चलकर बायी दीवार के पास पहुंचते वहां एक बटन को दबाते है। और बीजली जली जाती है। वह आदी वासी किसी भी तरह न सोच पाएगा कि इस बटन में ओ इस दीवार के भीतर इस बिजली के बल्‍ब से कोई तार जुड़ा है। उसके सोचने का कोई उपास नहीं है।
उसे यह एक रिचुअल मालूम पड़ेगा। कि यह कोई तरकीब है यहां से उठना,ठीक जगह पर दीवार पर जाना,फिर नंबर एक का बटन दबाना। नंबर दो का दबाते है तो पंखा घूमने लगता है। नंबर तीन का दबाते है रेडियों बोलने लग जाता है। उसे यह सब रिचुअल मालूम पड़ेगा। एक क्रिया कांड लगेगा। और समझ लें किसी दिन आप नहीं है घर में और बिजली चली गई है। वह आदमी उठा और उसने जाकर पूरा रिचुअल किया, लेकिन बिजली नहीं जली, पंखा नहीं जला,रेडियो नहीं चला। अब वह यही समझे गा कि रिचुअल में कोई भूल हो गई हे।
अपने क्रिया कांड में कोई भूल हो रही है। शायद हमने ठीक कदम न उठाए। कौन से कदम से पहले सह आदमी गया था। पता नहीं, अंदर-अंदर कोई मंत्र भी पढ़ता हो मन में, और बटन दबाता हो। क्‍योंकि हमने बटन वही दबाया है और बिजली नहीं जल रही है। उस आदिवासी को तो बिजली के पूरे फैलाव का कोई अंदाजा नहीं हो सकता।
करीब-करीब धर्म के संबंध में ऐसा ही है। जिनको भी हम धर्म के क्रिया-काँड़ कहते है, वह सब हमारे द्वारा पकड़े लिए गए ऊपरी कृत्य है। जो बिलकुल कुछ नहीं जानते व्‍यवस्‍था को, उनको हम पूरा भी कर लेते है, फिर पाते है, कुछ नहीं हो रहा है। या कभी हो जाता है, कभी नहीं होता, तो हम बड़ी मुश्‍किल में पड़ते है। कभी हो जाता है, इससे शक होता है कि शायद होता होगा। फिर कभी नहीं होता तो फिर यह शक होता है कि शायद संयोग से हो गया हो। क्‍योंकि अगर होना चाहिए तो हमेशा होना चाहिए।
हमें भीतरी व्‍यवस्‍था का कोई भी पता नहीं है। जिस चीज को आप नहीं जानते उसको ऊपर से देखने पर वह रिचुअल मालूम पड़ेगी। ऐसा छोटी-मोटी आदमियों के साथ होता हो ऐसा नहीं, जिनको हम बहुत बुद्धिमान कहते है उनके साथ भी यहीं होगा। क्‍योंकि बुद्धि ही बचकानी चीज है। बड़े से बड़ा बुद्धिमान भी एक अर्थ में जुवेनाइल है, बचकाना ही होता है। क्‍योंकि बुद्धि बहुत गहरे ले जाने वाली नहीं हे।
जब पहली दफा ग्रामोफोन बना, और फ्रांस के साइंस एकेडमी में जिस वैज्ञानिक ने ग्रामोफोन बनाया वह लेकर गया। तो बड़ी ऐतिहासिक घटना घटी तीन सौ साल पहले। फ्रैंच एकेडमी के सारे बड़े से बड़े वैज्ञानिक सदस्‍य हाजिर थे। कोई सौ वैज्ञानिक घटना देखने आए थे। उस आदमी ने ग्रामोफोन का रिकार्ड चालू किया, तो जो प्रैजिडेंट था फ्रैंच एकेडमी का, वह थोड़ी देर तो देखता रहा फिर उचक कर उसने उस आदमी की गर्दन पकड़ ली, जो ग्रामोफोन लाया था। क्‍योंकि उसने समझा कि यह कोई ट्रिक कर रहा है गले की, यह हो कैसे सकता है। यह गले में अंदर कोई हरकत कर रहा है। कोई तरकीब इसने लगाई है।
यह ऐतिहासिक घटना बन गई। क्‍योंकि एक वैज्ञानिक से ऐसी आशा नहीं हो
सकती थी कि वह जाकर उसकी गर्दन पकड़ ले। वह आदमी तो घबराया,उसने कहा कि आप यह क्‍या करते है। उसने कहा देखो तुम मुझको धोखा न दे पाओगें। वह उसका गला दबाए रहा। लेकिन तब भी उसने देखा की आवाज आ रही है। तब तो वह बहुत घबराया । उस आदमी को कहा,तुम बाहर आओ। उसको बहार ले गया। लेकिन तब भी आवाज आ रही थी। वह सौ के सौ वैज्ञानिक सकते में आ गए, उनमें से एक ने खड़े होकर कहां कि यह कोई शैतानी ताकत हे। इसे छूना-ऊना मत इसमें कुछ न कुछ डेवल जरूर है। शैतान इसमें हाथ बंटा रहा है। यह हो कैसे सकता है? आज हमें हंसी आती है। क्‍योंकि अब हो गया…। इसका हमें परिचय है। जो नहीं होता तो भी हम वैसी परेशानी में पड़ जाते।
अगर किसी दिन एटम गिरे दुनिया पर, यह सभ्‍यता हमारी खो जाए, और किसी आदिवासी के पास एक ग्रामों फोन बच जाए तो उसके गांव के लोग उसको मार डालें। अगर वह ग्रामोफोन बजा दे तो पूरा गांव उसकी जान को आ जाए। क्‍योंकि वह एक्स प्लेन तो कर नहीं पाएगा। यह बता तो नहीं पाएगा कि ये रेकार्ड कैसे बोल रहा है। यह तो आप भी नहीं बता पाओगें। यह बड़े मजे कि बात है। सब सभ्‍यताएं बिलीफ से जीती हे। केवल दो-चार आदमियों के पास कुंजियां होती है। बाकी तो भरोसा होता हे।
आप भी न बता पाओगें कि यह कैसे बोल रहा है। सुन लेते है, मालूम है कि बोलता है, भर लिया जाता है। बाकी बता पाना बहुत मुश्‍किल है। और उसे बनाना तो लगभग असम्‍भव ही है। बटन दबा देते है। बिजली जल जाली है। रोज जला लेते है। पर आप भी न बता पाओगें कि कैसे जल गई। कुंजियां तो दो चार आदमियों के पास होती है सभ्‍यता की, बाकी सारे लोग तो काम चला लेते है। बस जो काम चलाने वाले है, जिस दिन कुंजियां खो जाए उसी दिन मुश्‍किल में पड़ जाएंगे। उसी दिन उसका आत्‍मविश्‍वास डगमगा जाएगा। उसी दिन वह घबरा नें लगेंगे। फिर अगर एक दफा बिजली न जली तो कठिन हो जाएगा।
–ओशो ( मैं कहता हूं आंखन देखी )