09 February 2014

कोई तो समझे, धोनी-ब्रिगेड की फीलिंग???



धोनी और उनके धुरंधर... क्या कहा जाए? बेचारे... जबरन टारगेट में आ जाते हैं। जरा-सा कुछ हुआ नहीं कि उन पर लानत-मलामत शुरू हो जाती है, लोग कोचकना शुरू कर देते हैं।  इनकी इमोशन, फीलिंग कोई समझना ही नहीं चाहता। अभी टीम इंडिया ने विदेश में दो सीरीज क्या गंवाई,  शोर मचना शुरू हो गया कि इसको हटाना था, उसको रखना था, ये  तो बस घर के शेर हैं, वगैरह, वगैरह।
यार, ये बड़ी दिक्कत है। अरे, दो सीरीज ही तो हारे हैं, कोई सल्तनत तो नहीं लुटा आए। केवल दो सीरीज... वो भी विदेश में... उसी में इतना हल्ला हो रहा है।  ये भी कोई बात हुई। जब तक परदेस में बारह-पंद्रह सीरीज न हारें, तब तक सीरियसली लेना ही नहीं चाहिए। और  खिलाड़ी तीस-चालीस पारी में खराब न खेले, उसे ऊंगली करना ही नहीं चाहिए। पता नहीं क्यों, लोग-बाग एक-दो मेें ही माइंड करना शुरू कर देते हैं।
भई, मेरा तो स्पष्ट मानना है कि विदेश में दो सीरीज हारना कहीं से बुरा नहीं है, बल्कि विदेशों में हारना ही बुरा नहीं है। सच पूछिए, तो यह बड़े फक्र की बात है। दरअसल, इससे  हमारी सनातन परंपरा को बढ़ावा मिलता है।  संभवत: यह बात टीम इंडिया भी जानती है, इसीलिए वह इस पुण्य-कार्य को पूरे मनोयोग से करती है।
आपको तो पता ही है, भारत आध्यात्मिक देश है और समता-सहिष्णुता इसके मेरुदंड हैं।  इसी समतामूलक विचारधारा को हमारी टीम फालो करती है और हमारे खिलाड़ी ‘जीयो और जीने दो’ के तर्ज पर ‘जीतो और जीतने दो’ का फलसफा अपनाते हैं। इसीलिए वे घर में जीतते हैं और विदेशों में हारते हैं।
इसके अलावा अतिथिभाव ... यह भी एक अहम वजह है, जिसके चलते भारतीय टीम हारने में इंट्रेस्टेड रहती है। अब आप ही सोचिए, मेजबान को उसके घर में हराना, लाखों-करोड़ों स्थानीय दर्शकों का दिल दुखाना, क्या अच्छी बात है? क्या यह अतिथि को शोभा देगा? उसकी गरिमा के अनुरूप होगा? अरे, साहब, मेहमानवाजी के भी अपने उसूल होते हैं। और हमें इस बात पर गर्व करना चाहिए कि  भारतीय टीम इसमें पूरी तरह निपुण है।  हमारे लोग कहीं भी जाकर, किसी भी टीम से, यहां तक कि क्वालीफायर से भी मैच हारकर आ सकते हैं।
और यकीन मानिए, विदेशों में मैच हारकर हमारे खिलाड़ी मेहमानवाजी का तकाजा भर पूरा करते हैं। आध्यात्मिकतावश ही ये ‘घर के शेर’ बाहर मेमने बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें मेजबान टीम को घर का शेर बनाना होता है। हां, जहां मेजबानी ज्यादा पसंद आती है, वहां सीधे क्लीप स्वीप होते हैं। नहीं पसंद आती तो एक-दो मैच जीतकर, मलाल करने छोड़ देते हैं। 
और अब तो शेर-मेमने वाले इस भारतीय दर्शन को अन्य टीमों ने भी आत्मसात करना शुरू कर दिया है। मिसाल के तौर पर 2013 का रिकार्ड उठाकर देखिए। इक्का-दुक्का को छोड़ दें, तो सारी टीमें आपसी भाई-चारे के तहत विदेशों में सीरीज थ्रो करके आई हैं। यानी हमारी फिलासफी फैल रही है। 
तो अब आप ही सोचिए, पूरे विश्व में सनातन-चिंतन का प्रचार प्रसार करने वाली हमारी टीम इंडिया को निशाने पर लेना सही है? अरे, ये तो हमारे मिशनरी हैं... युुवा मिशनरी। सीरीज हारकर स्वदेश लौटने पर इनका जोरदार स्वागत होना चाहिए...  भव्य स्वागत, यादगार स्वागत। पर होता है, इसका उलटा।
 खैर, धर्म-अध्यात्म, सत्य-अहिंसा की राह तो कांटो भरी होती ही है। हंसते-हंसते जहर पीना पड़ता है। इसीलिए मैं धोनी ब्रिगेड से पूरा जोर देकर कहना चाहूंगा कि उन्हें आलोचनाओं पर कान देने की जरूरत नहीं है। विपरीत परिस्थितियों में भी वे अपनी आध्यात्मिकता अक्षुण्य रखें, अतिथिभाव बनाए रखें।  अपना आत्मविश्वास कतई न खोएं और विदेशों में हारना बिलकुल बंद न करें। आलोचनाओं से कुछ अपसेट हों, तो किशोर कुमार का गीत है... कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना... इसे बार-बार सुनें।
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18 January 2014

डॉ. साहब की ऐतिहासिक प्रेस-कॉन्फ्रेंस


अपने डॉ. साहब और शोले की बसंती में एक बात कॉमन है।  दोनों को ‘बेफिजूल’ बात करने की आदत नहीं है। दोनों किसी का टाइम ‘खराब’ करना पसंद नहीं करते। डॉ. साहब को ही लीजिए, सालों तक मीडिया से बचते रहे। बोलने के लिए कुछ खास नहीं था, लिहाजा टाइम खोटी •ाी नहीं किया। अरसे बाद ‘शेयर’ करने का दिल हुआ, तो मुखातिब हुए।
हां, यार लोग ने कुछ और उम्मीद बांध ली थी। उन्हें लगा था, कोई बड़ा धमाका होगा। कुछ ऐसा कहेंगे कि आसमान हिल जाएगा, धरती फट जाएगी। किसी की पतलून गीली हो जाएगी, किसी की पेंट फट जाएगी।  उम्मीद •ाी इसीलिए , क्योंकि अब तो विदाई की बेला है, और लौटने का •ारोसा •ाी कम।  लुुटिया तो डूब ही रही है, तो डर कैसा... कि कोई कुछ बिगाड़ लेगा। इसीलिए लगा था, कोई बड़ा बम फोड़ेंगे। सारा गुबार निकाल कर ही छोड़ेंगे। जिस-जिस ने खुजाया (पंगा लिया) था, सबको निबटा डालेंगे।  ऐसा तीर छोड़ेंगे कि आठ-दस क्या... कई जनपथ का सीना छलनी हो जाएगा।
समय •ाी माकूल था, सारा अदा-बिदा करने का। बिलकुल कांटे का टाइम। और फिर माहिर खिलाड़ी तो होते ही हैं, मौका देखकर चौका मारने वाले। ठीक अड़ी के समय अपना रंग दिखाने वाले। लगा था, वे •ाी खिलाड़ियों का खिलाड़ी बनेंगे। ऐसा उस्तरा चलाएंगे कि न उधो को उ करते बनेगा, न माधो को मु।
पर यहां तो खोदा पहाड़ निकली चुहिया। बम क्या, टिकली फटाका •ाी न फूटा। उम्मीद थी, रुखसती में कुछ कर गुजरेंगे। पर अपने डॉ. साहब नहीं सुधरे, कहने का मतलब नहीं ‘बिगड़े’। रहे अपनी वाली पर ही। वही पुरानी, 10 साल वाली।  फिर से बजा दी पुरानी कैसेट।  प्रेस कॉन्फ्रेंस में  कुछ अपनी कही, कुछ उसकी। कुछ इधर की, कुछ उधर की। किसी को पुचकारा, किसी को दुतकारा। किसी के कसीदे पढ़े, किसी को खतरा बताया। बोलने को तो बहुत कुछ बोले, लेकिन यार लोग के काम की (धमाकेदार) बात एक •ाी न बोले।
हां, बातों-बातों में वे इमोशनल हो गए थे, इसी दरमियान उनके मुखारविंद से एक बात निकली, जिसे ‘काम’ की कहा जा सकता है।  उन्होंने •ााव-विह्ल होकर कहा था- ‘इतिहास उन्हें याद रखेगा।’
पूरे पीसी में यही एक बात खास थी, सहेजने जैसी... बाकी सब बेमानी।  बाकी जो •ाी कहा, सब सेकंडरी... महज •ाूमिका बांधने के लिए। उनका कोई मोल न था। न होतीं तो •ाी चल जाता, कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता।  लेकिन यह बात... अपने ऐतिहासिक महत्व वाली... यूं सार्वजनिक नहीं करते, तो यकीन मानिए अनर्थ हो जाता। इसीलिए उन्होंने आॅन दि रिकॉर्ड बात रखने का स्टैंड लिया।  सच पूछिए, तो पत्रकार-वार्ता बुलाई ही इसीलिए थी, ताकि वे यह बात कर सकें, यानी अपने ऐतिहासिक महत्व को उजागर कर सकें। 
आपको लग रहा होगा, वे इसे आॅफ दि रिकॉर्ड •ाी कह सकते थे। अरे नहीं जनाब... तब पता नहीं लोग-बाग उन्हें सीरियसली लेते या नहीं। हो सकता, •ाूल जाते कि कुछ ऐतिहासिक कहा है। इसीलिए उन्होंने रिस्क नहीं लिया, पीसी में ‘खुलासा’ किया। कम-से-कम अब यह तो तय हो गया कि इतिहास उन्हें याद रखे, न रखे, उनके कहे को जरूर याद रखा जाएगा।
वैसे, यह सोचने की गुस्ताखी बिलकुल न करें कि डॉ. साहब को अपनी उपलब्धिों पर किसी तरह का शुबहा था। हरगिज नहीं, इंटरनली वे पूरी तरह कॉन्फिडेंट थे कि इतिहास उन्हें याद रखेगा।  हां, ये हो सकता है  कि उन्हें अपनी याददाश्त पर •ारोसा कम हो ( बढ़ती उम्र जो ठहरी)। इसीलिए उन्हे प्रेस-कॉन्फ्रेंस में सार्वजनिक एलान की जरूरत समझ आई, ताकि बाद में क•ाी ‘वे’ •ाूलने •ाी लगें, तो लोग उन्हें •ाूलने न दें कि वे ‘इतिहास-पुरूष’ हैं। 
वैसे, डॉ. साहब •ाूलने वाली चीज हैं •ाी नहीं। पिछले 10 साल में उन्होंने जो इतिहास रचा है, उसके बाद तो हरगिज •ाी नहीं। सामाजिक, राजनीतिक, सार्वजनिक... जीवन के हर क्षेत्र में उन्होंने ‘संत-परंपरा’ के निर्वाह की जो अद्•ाुत नींव रखी है, उसके बाद तो उन्हें ‘नमन’ ही किया जा सकता है। वे इतने बड़े वाले हो गए हैं, इतनी ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं कि उनके इर्द-गिर्द कोई •ाी नहीं ठहर पा रहा है।
सं•ावत: गांधीजी के बंदर उनके रोलमॉडल हंै... वो •ाी पूरे तीन-के-तीन।  एक-दो •ाी कम होते, तो शायद वे ‘डाउन टू अर्थ’ होते। बहरहाल, इसीलिए उन्होंने बुराई (गड़बड़ियां, गलतियां) के खिलाफ पूरे 10 साल मुंह, आंख, कान बंद रखा।  उनके दाएं-बाएं कई चंगू-मंगू गड़बड़झाला करते रहे, लेकिन मजाल है, क•ाी उन्हें रोका हो, कुछ बुरा कहा हो।  उन्हें बुराई से इस कदर नफरत रही कि उसे किसी •ाी कंडीशन में देखना पसंद नहीं किया। यहां तक कि बताने पर •ाी आंखें नहीं खोलीं। इसके उलट उन्हें बताने वालों की बात ही बुरी लगने लगी। लिहाजा उन्हें उस पर कान देना बंद करना पड़ा, मजबूरन... न चाहते हुए... बुराई से नफरत के चलते।
काजल की कोठरी में कमलवत जीवन जीते हुए, पूरे दस साल वे बेदाग रहे। वे सही मायने में कर्मयोगी हैं...
‘असरदार... चितचोर... मन को मोहने वाले।’  जैसे •ागवान कृष्ण का विश्वरूप देखने के बाद परम श्रद्धा के वशी•ाूत अर्जुन ने कहा था- ‘आपको आगे से प्रणाम, पीछे से प्रणाम, ऊपर से प्रणाम, नीचे से प्रणाम, सब तरफ से प्रणाम’।  वैसे ही उसी स्तर की श्रद्धा के साथ आपको हर तरफ से प्रणाम... डॉ. साहब। 
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31 December 2013

सलमान अख्तर



समझ सके तो समझ जिंदगी की उलझन को
सवाल उतने नहीं है, जवाब जितने हैं
 स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख्तर के पिता जाँ निसार अख्तर  उर्दू शायरी में जाना-पहचाना नाम हैं. यह शेर उन्ही का है, जो मुझे बहुत पसंद आया. संभवत: वे कहना चाहते हैं कि चीजें उतनी कठिन नहीं हैं. हम ही उन्हें अपने-अपने चश्मों (धारणाओं-मान्यताओं) से कठिन बना देते हैं.
पता नहीं क्यों, पढ़ते ही यह शेर मुझे  आजिज आ गया और इसके भव से मेरे भीतर एक इत्तफाक, एक सहमति खड़ी हो गई. उनके एक-दो और पसंदीदा शेर ये रहे..
ये ठीक है कि सितारों पे घूम आए हैं
मगर किसे है सलीका जमीं पे चलने का
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जिंदगी जिस को तेरा प्यार मिला वो जाने
हम तो नाकाम रहे चाहने वालों की तरह
जिंदगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो
कुछ न कुछ हमने तिरा कर्ज उतारा ही न हो

04 January 2013

कांग्रेस जिंदाबाद!


उदाहरण

टीचर - ए बराबर बी और बी बराबर सी, तो ए बराबर सी होता है। इसका उदाहरण देकर समझाओ।
सोनू - सर मैं आपसे प्यार करता हूं और आप अपनी बेटी मोनू से प्यार करते हैं। तो इसका मतलब हुआ मैं मोनू से प्यार करता हूं।