06 March 2012

राहुल का बयान

यूपी चुनाव में सपा की जीत और कांग्रेस के उल्लेखनीय प्रदर्शन न करने पर राहुल गांधी ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए सपा प्रमुख को बधाई दी। उनके बयान में मुझे कई बातें तोता रटंत से परे गैरराजनीतिक लगीं। आमतौर पर हार या जीत के बाद जिस तरह की रटी-रटायी टेपरिकॉर्डर बयानबाजी होती है, उससे हटकर उन्होंने कई बातें दिल से कहीं।
मुझे अच्छा लगा उनका यह कहना- 'मैं सबसे आगे खड़ा था, इसलिए नतीजों की जिम्मेदारी मेरी है।Ó
दूसरी  गैरराजनीतिक बात उन्होंने कही- 'मैं आपको बताता हूं कि बयान से नुकसान होता है।Ó तीसरी शानदार बात- 'मैं इस देश के लोगों के लिए काम कर रहा हूं। मैं इस देश की राजनीति में सुधार लाना चाहता हूं और मेरा यह काम चलता रहेगा। मुझे जीत भी मिलेगी और हार भी। यह हार मेरे लिए बहुत अच्छा सबक है।
Ó राहुल की बातें, सोच और चाल में कछुवे की झलक मिल रही है...
उनके बयान की लिंक ये रही... http://www.bhaskar.com/

05 March 2012

तीर्थों में तीर्थ कैलाश...
मेरा कैलाश...
मुझे हमेशा से आकर्षित करता रहा है।
यह शायद सबसे कठिन और सबसे महानतम तीर्थ माना जाता है...
शायद इसीलिए मेरे मन में इसके लिए आग्रह बना है।
इंसान की फितरत है ना, जमीन में पड़ी दूब को नजरअंदाज करता है और एवरेस्ट की ख्वाइश रखता है। कठिन-दुर्लभ को पाने-जीतने में अहंकार को भी बड़े होने का एहसास मिलता है, शायद इसीलिए।
बहरहाल, कारण चाहे जो भी हो... कैलाश की चाह, पहाड़ों की चाह... जाने क्यों मेरे अंतरम को खींचती है। कैलाश के अलावा भी पहाड़ी जीवन मुझे खींचता रहा है। शायद इसीलिए हिमालय दर्शन, गुल गुलशन गुलफाम टीवी सीरियल की डीवीडी मैं अरसे से तलाश रहा हूं। मुझे इनकी तलब होती रही है।
फिर बात अगर कैलाश की करूं, तो यही कि यहां पहुंचने की मेरी बड़ी इच्छा रही है। कैलाश-मानसरोवर की यात्रा में जाने की और दूसरे श्रद्धालुओं की तरह मेरी भी बड़ी तमन्ना है।
 कैलाश और बनारस (जहां से मैं एक बार हो कर आ चुका हूं) यही दो तो हैं, जो मेरे मेंरे भीतर के धार्मिक संस्कार को जगाते हैं। बनारस भी मुझे मोहता रहा है... बनारस के साथ भी संभवत: वही बात जुड़ी है। यह कालजयी सनातन शहर अपने ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक और न जाने कितने रहस्यपूर्ण महत्व के कारण मेरे लिए चुंबकीय बन गया है। इसके गुरुत्वाकर्षण के आगे मैं बेबस हो जाता हूं। एक बार जा चुका हूं, और फिर जाने की तमन्ना है। एक बार देखा है और देखने की तमन्ना है, एक बार खाया है और खाने की ...। एक बार पीया है और दोबारा...। इस शहर में मैं संभवत: 2004 में गया था, तब ही से यह दोबारा मुझे बुला रहा है। कि यहां कुछ ऐसा है, जो छूट गया है, जिसे मुझे देखना है। बनारस के बारे में फिर कभी अलग से लिखूंगा.. ।
 दिलचस्प बात यह है यह दोनों स्थान भगवान शंकर से संबद्ध हैं। और शिवजी तो मेरे बचपन के आराध्य हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तिकड़ी में मुझे यह अवधूत ही लुभाते थे। मेरे दोस्त अतुल को विष्णु (उनका रंगीन पहनावा) पसंद थे। हम दोनों की पसंद के बाद, तीसरे दोस्त भवानी के लिए ब्रह्मा ही बच गए थे। जाहिर है उसके पास कोई च्वाइस नहीं थी। लेकिन उसने कभी ऐतराज भी जाहिर नहीं किया था ब्रह्मा को लेने से और न ही कभी शिव या विष्णु के प्रति विशेष लगाव ही दर्शाया था।
तो कैलाश, बनारस, भोलेनाथ सब एक ही थैली के हैं और शायद मैं भी...। हालांकि अब बड़े होने के बाद, विवेकानंद के राजयोग, जे कृष्णमूर्ति, ओशो, बुद्ध जैसे निर्गुण उपासकों को पढऩे के बाद ईश्वर को लेकर नई अवधारणा चेतन मन में पैठ गई। भगवान या ईश्वर अब ईश्वर तत्व बन गए, सैद्धांतिक रूप से ही सही...। (ईश्वर का मतलब होता है, जो कभी नष्ट नहीं होता।  यह नश्वर का विपरीत शब्द है। ऐसा मैंने ओशो द्वारा पतंजलि योगसूत्र की व्याख्या में पढ़ा था)
तो इसी कैलाश की चाह के पीछे मैं इससे संबंधित चीजें पढ़ता रहा हूं। दो लोग जो कैलाश की यात्रा पर जा चुके हंै, उनके संस्मरण को बहुत स्वाद लेकर पढ़ा। ऐसे कि उनके अनुभव से मैं ही गुजर रहा हूं। उसी दौरान मैंने एक चीज मैंने पाई थी भारत (दिल्ली) से कैलास-मानसरोवर की यात्रा का मार्ग। इसे मैंने अपने पास रख लिया वो ये हैं...

हल्द्वानी--- कौसानी--- बागेश्वर--- धारचूला--- तवाघाट--- पांगू--- सिरखा--- गाला--- माल्पा--- बुधि--- गुंजी--- कालापानी--- लिपू लेख दर्रा--- तकलाकोट---जैदी--- बरखा मैदान--- तारचेन--- डेराफुक---श्रीकैलाश...

अगर आप भी कैलाश- संस्मरण को पढऩे के इच्छुक हैं, तो उनकी लिंक नीचे है...

कैलाश...

तीर्थों में तीर्थ कैलाश...
मेरा कैलाश...
मुझे हमेशा से आकर्षित करता रहा है।
यह शायद सबसे कठिन और सबसे महानतम तीर्थ माना जाता है...
शायद इसीलिए मेरे मन में इसके लिए आग्रह बना है।
इंसान की फितरत है ना कि जमीन में पड़ी दूब को नजरअंदाज करता है और एवरेस्ट की ख्वाइश रखता है। कठिन-दुर्लभ को पाने-जीतने में अहंकार को भी बड़े होने का एहसास मिलता है, शायद इसीलिए।
बहरहाल, कारण चाहे जो भी हो... कैलाश की चाह, पहाड़ों की चाह... जाने क्यों मेरे अंतरम को खींचती है। कैलाश के अलावा भी पहाड़ी जीवन मुझे खींचता रहा है। शायद इसीलिए हिमालय दर्शन, गुल गुलशन गुलफाम टीवी सीरियल की डीवीडी मैं अरसे से तलाश रहा हूं। मुझे इनकी तलब होती रही है। 
फिर बात अगर कैलाश की करूं, तो यही कि यहां पहुंचने की मेरी बड़ी इच्छा रही है। कैलाश-मानसरोवर की यात्रा में जाने की और दूसरे श्रद्धालुओं की तरह मेरी भी बड़ी तमन्ना है।  कैलाश और बनारस (जहां से मैं एक बार हो कर आ चुका हूं) यही दो तो हैं, जो मेरे मेंरे भीतर के धार्मिक संस्कार को जगाते हैं। बनारस भी मुझे मोहता रहा है... बनारस के साथ भी संभवत: वही बात जुड़ी है। यह कालजयी सनातन शहर अपने ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक और न जाने कितने रहस्यपूर्ण महत्व के कारण मेरे लिए चुंबकीय बन गया है। इसके गुरुत्वाकर्षण के आगे मैं बेबस हो जाता हूं।
एक बार जा चुका हूं, और फिर जाने की तमन्ना है। एक बार देखा है और देखने की तमन्ना है, एक बार खाया है और खाने की ...। एक बार पीया है और दोबारा...।
 इस शहर में मैं संभवत: 2004 में गया था, तब ही से यह दोबारा मुझे बुला रहा है। कि यहां कुछ ऐसा है, जो छूट गया है, जिसे मुझे देखना है। बनारस के बारे में फिर कभी अलग से लिखूंगा.. ।
 दिलचस्प बात यह है ये दोनों स्थान भगवान शंकर से संबद्ध हैं। और शिवजी तो मेरे बचपन के आराध्य हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तिकड़ी में मुझे यह अवधूत ही लुभाते थे। मेरे दोस्त अतुल को विष्णु (उनका रंगीन पहनावा) पसंद थे। हम दोनों की पसंद के बाद,  तीसरे दोस्त भवानी के लिए ब्रह्मा ही बच गए थे। जाहिर है उसके पास कोई च्वाइस नहीं थी। लेकिन उसने कभी ऐतराज भी जाहिर नहीं किया था ब्रह्मा को लेने से और न ही कभी शिव या विष्णु के प्रति विशेष लगाव ही दर्शाया था।
तो कैलाश, बनारस, भोलेनाथ सब एक ही थैली के हैं और शायद मैं भी...। हालांकि अब बड़े होने के बाद, विवेकानंद के राजयोग, जे कृष्णमूर्ति, ओशो, बुद्ध जैसे निर्गुण उपासकों को पढऩे के बाद ईश्वर को लेकर नई अवधारणा चेतन मन में पैठ गई। भगवान या ईश्वर अब ईश्वर तत्व बन गए, सैद्धांतिक रूप से ही सही...। (ईश्वर का मतलब होता है, जो कभी नष्ट नहीं होता।  यह नश्वर का विपरीत शब्द है। ऐसा मैंने ओशो द्वारा पतंजलि योगसूत्र की व्याख्या में पढ़ा था)
तो इसी कैलाश की चाह के पीछे मैं कभी इससे संबंधित चीजें मैं पढ़ता रहा हूं। दो लोग जो कैलाश की यात्रा पर जा चुके है, उनके संस्मरण बहुत स्वाद लेकर पढ़ा। ऐसे कि उनके अनुभव से मैं ही गुजर रहा हूं। उसी दौरान मैंने एक चीज मैंने पाई थी भारत (दिल्ली) से कैलास-मानसरोवर की यात्रा का मार्ग। इसे मैंने अपने पास रख लिया वो ये हैं...
हल्द्वानी--- कौसानी--- बागेश्वर--- धारचूला--- तवाघाट--- पांगू--- सिरखा--- गाला--- माल्पा--- बुधि--- गुंजी--- कालापानी--- लिपू लेख दर्रा--- तकलाकोट---जैदी--- बरखा मैदान--- तारचेन--- डेराफुक---श्रीकैलाश...

(अगर आप भी कैलाश- संस्मरण को पढऩे के इच्छुक हैं, तो उनकी लिंक नीचे है...
http://mansarovar-yatra.blogspot.in/

कैलाश के कुछ मनभावन फोटोग्राफ 




03 March 2012

पाकिस्तानी डॉक्युमेंट्री फिल्म

हाल ही में एक लेख पढ़ा, दीपक असीम का...। पाकिस्तानी डॉक्युमेंट्री फिल्म जिसे ऑस्कर मिला है, यह लेख उस पर आधारित है। पूरे तीखेपन के साथ इसके बासी विषय पर तीखी टिप्पणी की गई है लेख में। अवार्ड मिलने के पीछे भी पश्चिमी डायरेक्टर के होने की वजह और मुस्लिमों के प्रति पश्चिमी पूर्वग्रह को डॉक्युमेंट्री द्वारा पुष्ट करना वजह बताया गया है।
दीपक असीम का नवदुनिया में नियमित प्रकाशित होने वाला यह कॉलम यूं तो फिल्म पर आधारित रहता है, लेकिन वे भी चौकसे जी की (दैनिक भास्कर में प्रकाशित नियमित कॉलम.. परदे के  पीछे के प्रसिद्ध स्तंभकार) की तरह ही समसामायिक विषयों पर टिप्पणी करते हैं। चौकसे व इनके कॉलम में जो बुनियादी अंतर मुझे समझ आता है वह यह है कि चौकसे जी मीठी छुरी से हलाल करते हैं, जबकि ये सीधा-सीधा नश्तर चुभाते हैं। इनके लेख में हरी मिर्ची जैसा करारा तीखा तेवर नजर आता है, जबकि चौकसे जी शहद में कुनैन घोलकर पिलाते हैं...। दोनों का अपना-अपना अंदाज है... जहां तक संवेदनाओं की बात, मुद्दों की समझ, जीवन के प्रति आग्रहपूर्ण होने की बात.... असीम भी गहरे उतरे मालूम पड़ते हैं। आलोचक चौकसे भी हैं, ये भी हैं, चौकसे की ताकत उनकी उपमा है, तो असीम का हथियार उनका तीखापन है.... वे सीधे कत्ल करते हैं। इन्हें पढ़ते-पढ़ते कभी-कभी परसाई की याद हो आती है...
आर्टिकल की लिंक नीचे है...http://hindi.webdunia.com/

02 March 2012

अंदाज-ए-अदायगी ... 
 भाषा की ताकत, अंदाज-ए-अदाएगी देखना चाहते हैं, तो गीत जी का यह लेख पढि़ए। उनकी बातों में मुरली से ज्यादा घुमाव है और वे शेनवार्न से भी अच्छे स्पिनर हैं.... यदि कागज के मैदान पर कलम से गेंदबाजी करनी हो तब ही...
प्रेम और समंदर को अंतर्संबंधित करने वाले इस लेख में शायद यही कहा जा रहा है कि प्रेम की स्थूल अभिव्यक्ति, स्थूल रूप समंदर है और समंदर की विशाल, अनंत गहराई जैसा ही प्रेम है। आर्टिकल की लिंक नीचे दी जा रही है.... http://www.bhaskar.com 
गीत जी के वैतागवाड़ी ब्लॉग में भी इस आर्टिकल का विस्तारित रूप पढ़ा जा सकता है... उसकी लिंक ये रही... http://geetchaturvedi.blogspot.in/