21 February 2017

मोदी और कोहली : पोस्टर ब्वॉय से ब्रांड एंबेसडर तक...


साल भर पहले देश भर में असहिष्णुता ( इनटोलरेंस) का मुद्दा गरमाया हुआ था। उस दौरान प्रधानमंत्री मोदी सबके निशाने पर थे। उन दिनों इस बात की बड़ी चर्चा थी कि मोदी सरकार पत्रकारों को टारगेट कर रही है...  ऐसे पत्रकारों को जो उनके विरोधी हैं, उनसे असहमति जताते हैं।  कहा जा रहा था, समर्थक, विरोधी और मध्यमार्गी पत्रकारों (ऐसे पत्रकार जो कभी तारीफ करते तो कभी विरोध करते हैं) की बाकायदा लिस्ट बनाई गई है।  कुछ खास लोगों को मध्यमार्गी पत्रकारों को समर्थक खेमे में लाने का जिम्मा सौंपा गया है और जो पक्ष में आने को तैयार नहीं हैं उन्हें विरोधी खेमे में डालकर उन्हें उनकी जगह बताने, च्ठिकाने लगानेज् की योजना है।
हो सकता है ये बातें कोरी अफवाह हों, लेकिन अमूमन यही देखने में आता है कि व्यक्ति जितना ज्यादा सफल होता जाता है, उसके लिए आलोचना या असहमति उतनी ही असहनीय हो जाती है। बिरले ही होते हैं, जो विरोध या आलोचना की कड़वी घुट्टी को बिना किसी पूर्वग्रह के, दुर्भावनापूर्ण माने बिना पी लेते हैं। प्राय: यही होता है कि व्यक्ति के अंदर सफलता के अनुपात में तानाशाही प्रवृत्ति बढऩे लगती है। वह अपने आसपास असहमति जताने वालों को खारिज करना चाहता है, उसे यसमैन पसंद आते हैं। इसे सफलता का साइड इफेक्ट कहा जा सकता है। और इस साइड इफेक्ट के शिकार संभवत: एक और शिखर-पुरुष हो रहे हैं....भारतीय क्रिकेट के दैदीप्यमान नक्षत्र विराट कोहली।
 कोहली आज शाहरुख खान के बाद हिंदुस्तान के दूसरे सबसे महंगे सेलेब बन गए हैं। वे लगातार सफलता की नई-नई मीनारों पर चढ़ते जा रहे हैं, नए-नए शिखर चूमते जा रहे हैं।  लेकिन उन्हें भी आलोचना करने वाले फूटी आंख नहीं सुहाते हैं। पिछले दिनों एक बंगाली अखबार ने दावा किया कि कॉमेंट्रेटर हर्षा भोगले को विराट कोहली और मुरली विजय की नाराजगी भारी पड़ी थी, इसी के चलते उन्हें कॉमेंट्री से हटाया गया था।
आपको याद ही होगा 2016 वल्र्ड टी-20 में हर्षा की भारतीय क्रिकेटरों पर टिप्पणी से खासा बवाल मचा था। भोगले ने भारत-बांग्लादेश मैच के दौरान कोहली के 7 रन बनाने पर कहा था- च्उन्होंने रन बनाने से ज्यादा शॉट खेल दिए हैं।ज् इस पर विराट नाराज हुए थे। अखबार के मुताबिक, कोहली को जब भोगले के कमेंट्स के बारे में पता चला था तो उन्होंने पूछ लिया कि ऐसे कमेंट क्यों किए। इस पर भोगले ने कोहली को समझाने का प्रयास भी किया और वॉट्सएप पर भी सफाई दी, लेकिन कोहली शांत नहीं हुए। भोगले की टिप्पणी को दिग्गज फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन ने भी गलत मानते हुए ट्वीट किए थे, जिसे बाद में कप्तान धोनी ने रिट्वीट कर दिया था। पूरे मामले का समापन हर्षा की छुट्टी से हुआ था। उस सीरीज के बाद स्टार स्पोट्र्स ने उनसे करार खत्म कर दिया था।
यकीनन, कोहली ने भोगले को हटवाने कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं किया होगा, उन्हें दबाव डालकर नहीं हटवाया होगा। लेकिन अहम बात तो यह है कि वे अपनी आलोचना पर इतने नाराज... असहनशील क्यों हुए? भोगले ने ऐसा क्या कह दिया जो नाकाबिल-ए-बर्दाश्त था? और यदि गलत था भी तो क्या उसे नजरअंदाज कर बड़प्पन नहीं दिखाया जा सकता था? परोक्ष रूप से ही सही, लेकिन कोहली व टीम इंडिया को भोगले के निर्वासन के लिए जिम्मेदार माना जाएगा... उनके लिए इस लांछन से बचना मुश्किल होगा।  यही समझा जाएगा कि कोहली-बिग्रेड आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाती, उसने हर्षा को ठिकाने लगा दिया।
इस मामले का एक पहलू और भी है। स्टार ने भले ही विवाद टालने की गरज से अनुबंध खत्म किया हो।  लेकिन मानने वाले यही मानेंगे कि स्टार ने गलत परंपरा को ही आगे बढ़ाया है। उगते सूरज को सलाम किया, दबंगों की नाराजगी मोल लेना पसंद नहीं किया। इस पूरे मामले में सबसे घातक बात भी यही है।  दरअसल, हर्षा को जिस कारण से हटाया गया है, उसके बाद...  इसी बात की संभावना ज्यादा है कि निष्पक्ष आलोचना से लोग बचने लगेंगे... डरेंगे। चरण वंदना...  झूठी तारीफ करने वाले चारण-भाटों  को बढ़ावा मिलने लगेगा। व्यक्ति पूजा महत्वपूर्ण हो जाएगी, तानाशाही प्रवृत्ति सर उठाने लगेगी।
वास्तव में, जस्बाती होकर तुरत-फुरत फैसले लिया जाना ही गलत था। अगर भोगले को हटाना जरूरी भी था, तो बाद में... मामला ठंडा पडऩे पर, खिलाडिय़ों व भोगले के बीच सुलह करा... गैप खत्म कराकर वापसी करवाई जानी थी। क्रिकेट के अन्य दिग्गज खिलाडिय़ों को भी बेहतर संवाद के लिए प्रयास करने थे। खुद कोहली को बड़ा दिल दिखाना था... आलोचना को पाजीटिव लेना था। उन्हें यह सोचना था कि भोगले ने क्या जानबूझकर, इंटेशनली उन्हें नीचा दिखाने टिप्पणी की है? यकीनन, ऐसा हरगिज नहीं रहा होगा। और अगर ऐसा भी होगा, तो बजाय आलोचना को कान देने के च्हाथी चले बाजार....ज् वाली फिलासफी को अमल में लाकर अपना बीपी हाई नहीं करना था।
सच तो यह है भोगले ने ऐसा कुछ गलत नहीं कहा था, जिस पर इतना बवाल मचना था। क्योंकि उन्होंने थोड़ा क्रूर, सपाट तरीके से कमियों पर टिप्पणी की थी, इसलिए अमिताभ बच्चन जैसे क्रिकेट प्रेमियों को अखर गया था और उन्होंने बजाय नतीजे या खिलाडिय़ों की कमियों पर ऊंगली उठाने के... उनकी मेहनत पर ध्यान देने की जरूरत बताई थी। खिलाडिय़ों से प्यार करने वाले प्रशंसक ऐसे ही होते हैं, उन्हें अपने आइकॉन में कमियां नहीं दिख पाती हैं। लेकिन कुछ कबीर-परंपरा को आगे बढ़ाने वाले लोग भी होते हैं, जो कमियों पर बात करते हैं। हर्षा भोगले, शोभा डे ऐसे ही लोग हैं। अपनी इस आदत की वजह से वे निशाने पर भी आते हैं, सोशल मीडिया पर भी जमकर ट्रोल होते हैं।
 लेकिन आलोचकों, निंदकों का अपना महत्व होता है, जिसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी की तरह ही, असहमति की आजादी भी मूलभूत अधिकार है। उसकी की भी जगह होनी चाहिए। कोहली-ब्रिगेड को याद रखना चाहिए कि उनके पूवर्वती सचिन-सौरव के खेल पर भी टीका-टिप्पणी होती थी, लेकिन वे कभी अपने आलोचकों पर नाराज नहीं होते थे।
एक बात और...
मोदी व कोहली आज भले ही अपने दल व टीम के च्पोस्टर-ब्वॉयज् हैं... उनका सक्सेस रेट भले ही अपने सीनियर अटल-सचिन से ज्यादा है, लेकिन दिलों पर राज करने के मामले में ये उनसे पीछे ही हैं। ये दिग्गज (अटल-सचिन) अपने दल-टीम से बहुत ऊपर ... राजनीति-क्रिकेट के एंबेसडर माने जाते हैं, विरोधियों का भी प्यार, सम्मान इन्हें हासिल है। यह मुकाम सह्रदयता से... सबको साथ लेकर चलने से आता है। आज के पोस्टर ब्वॉयों को याद रखना चाहिए कि हर सफल व्यक्ति महान नहीं होता... सच्ची महानता तो दिलों पर राज करती है।
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27 October 2016

डोनाल्ड ट्रंप : भारत के कितने दूर... कितने पास


च्राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर में पिछले दिनों डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में जमकर प्रदर्शन हुए। यह प्रदर्शन उसी च्हिंदू सेनाज् ने किया था, जिसने 14 जून को ट्रंप के जन्मदिन पर 7 किलो का बड़ा केक काटा था। प्रदर्शन के दौरान, इसके कार्यकर्ता ट्रंप के पक्ष में नारे लगा रहे थे। उन्हें मानवता का रक्षक बता रहे थे।ज्
रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी ट्रंप के मुस्लिम विरोधी बयानों ने एक तरफ जहां उन्हें विवादित किया है, वहीं दूसरी ओर, उनकी लोकप्रियता गैर मुस्लिम देशों में बढ़ा भी दी है। और हिंदु व हिंदुस्तान की तारीफ करने के बाद, तो उनके फैन क्लब में कट्टरपंथियों के साथ-साथ अनेक भारतीय व भारतवंशी (अमेरिका में रहने वाले) भी शामिल हो गए हैं।  ट्रंप ने भारत की शान में खूब कसीदे पढ़े हैं। वे कहते हैं- 'मैं हिंदू और भारत का प्रशंसक हूं, अगर मैं चुना जाता हूं तो हिंदू समुदाय को व्हाइट हाउस में सच्चा दोस्त मिल जाएगा। हम आतंकवाद के खिलाफ  लड़ाई में भारत का साथ देंगे, सैन्य सहयोग भी मजबूत करेंगे।Ó

ट्रंप के ऐसे विचारों से अभिभूत अनेक भारतीय व च्हिंदू सेनाज् जैसे संगठन चाहते हैं कि रिपब्लिकन पार्टी के इस उम्मीदवार को अमेरिका का राष्ट्रपति बनना चाहिए। तो क्या भारत हितैषी होने भर से ट्रंप, भारतीयों के नैतिक समर्थन व भारतवंशियों के वोट के हकदार बन जाते हैं? क्या किसी व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व, उसकी विचारधारा गौण हो सकती है?  कोई व्यक्ति हमारी तारीफ करता है, इसलिए उसकी सारी चीजों को नजरअंदाज कर, हमें उसे समर्थन दे देना चाहिए... या फिर कथा सम्राट प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी च्पंच-परमेश्वरज् के किरदारों (अलगू चौधरी, जुम्मन शेख) की तरह व्यक्तिगत संबंधों के ऊपर सही व न्यायोचित चीजों के साथ हो लेना चाहिए?
दरअसल, ट्रंप को लेकर दुनिया भर में वैचारिक सुनामी चल रही है। उनके बयान व उन पर लग रहे आरोपों ने विश्व समुदाय को चिंता में डाल रखा है। ट्रंप मुस्लिमों के अमेरिका-प्रवेश पर प्रतिबंध के पक्षधर हैं। वे आतंकी गतिविधियों के लिए लगातार मुस्लिमों पर आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने कहा है- च् वे इस समुदाय के प्रवासियों की संख्या पर रोक लगाने सीमा पर नियंत्रण व्यवस्था मजबूत करेंगे।ज्  टं्रप अनेक देशों के तनावपूर्ण रिश्तों में बारूद भरने का काम भी करते रहे हैं। उन्होंने सत्ता में आने पर विवादित येरूशलम को इजराइल की 'वास्तविकÓ राजधानी के रूप में मान्यता देने का वादा किया है। उनके इस बयान को पूर्वग्रह से प्रेरित व इजराइल-फिलिस्तीन के सुलगते रिश्तों में घी डालने वाला माना जा रहा है। इसके अलावा, इस रिपब्लिक प्रत्याशी के महिलाओं के संबंध में विचार भी शर्मसार करने वाले हैं।  च्वॉशिंगटन पोस्टÓ के पास उनका 2005 का एक वीडियो मौजूद है। इसमें वे रेडियो एवं टीवी प्रस्तोता बिली बुश के साथ बातचीत के दौरान, बिना सहमति के महिलाओं को छूने और उनके साथ यौन संबंध को लेकर बेहद अश्लील टिप्पणियां करते दिखाई दे रहे हैं।ज्
मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग ने कहा है, च्व्यक्ति के विचार उसके अंतर्मन का दर्पण होते हैं और ये ही उसके भविष्य को संचालित करते हैं।ज् ट्रंप के विचार उनके भीतर बैठे तानाशाह को उजागर करते हैं, इनसे सामंती सोच पता चलती है। महिलाओं के संबंध में उनकी हरकतें उनकी अय्याश तबीयत को नुमांया करते हैं। ऐसा शख्स जो सेलेब्रिटी स्टेटस का फायदा उठाकर, पूरी बेशर्मी के साथ महिलाओं को तंग करता है।  जो महिलाओं का सम्मान करना नहीं चाहता और अपनी इच्छा पूरी करने किसी भी हद तक जा सकता है। इसी तरह, उनके मुस्लिम विरोधी विचार उस मनोवृति को दर्शाते हैं, जिससे हिटलर, मुसोलिनी जैसे तानाशाह कभी शासित हुए थे। हो सकता है, सत्ता में आने पर ट्रंप भी अपने इस्लामोफोबिया के चलते पूर्वग्रह से भरे फैसले लेते चले जाएं... नए सिरे से विश्व का इतिहास लिखने की कोशिश करने लगें। आखिर, कभी नाजी तानाशाह हिटलर ने भी तो आर्य रक्त को श्रेष्ठ मानकर, दोबारा विश्व का नक्शा खींचने की कोशिश की थी... अपनी सनक भरी नफरत के चलते लाखों यहुदियों को मौत के घाट उतारा था।
इन्हीं सब वजह से संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त जैद राद अल हुसैन सहित अनेक लोग मानते हैं- च्ट्रंप का अमेरिका जैसे च्चौधरीज् राष्ट्र का महामहिम बनने से वैश्विक शांति, सहिष्णुता कभी भी दांव पर लग सकती है।ज् इसीलिए यह सवाल उठना भी लाजमी है, क्या ट्रंप का च्भारत प्रेमज् भारत व भारतवंशियों के लिए उनके समर्थन का एकमात्र आधार हो सकता है?
खैर, इस बात को भी छोड़ दें और स्वार्थी होकर सोचें, भारतीय नजरिए को तवज्जो दें... तब भी- इसकी क्या गारंटी है कि राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप भारत के लिए मुफीद ही होंगे? हो सकता है, अब तक की उनकी बातें चुनावी शिगूफा हों, लफ्फाजी हों।  यह संदेह इसलिए है क्योंकि यह हमारा सालों का तर्जुबा रहा है। हम भारत में देखते आए हैं, चुनावी घोषणा पत्र कैसे होते हैं और उनकी कितनी बातें अमल में आ पाती हैं? अमेरिका भी कोई इससे अलग नहीं है।  यहां भी अनेक चुनावी वायदे च्हाथी के दांतज् बनकर रह जाते हैं।
खैर, यह भी मान लें कि ट्रंप का भारत-प्रेम सच्चा है, अपनी बातों को लेकर वे ईमानदार हैं। लेकिन, तब भी च्कुर्सी के तकाजोंज् के चलते क्या वे भारत के हितों का ख्याल रखने की स्थिति में होंगे? क्या अमेरिका की विदेश नीति इसकी इजाजत देगी? यह चिंता भी इसीलिए सर उठा रही है क्योंकि अनेक मर्तबा यह देखने में आया है कि नीयत होते हुए भी सत्ता शीर्ष में बैठे लोग अपने वायदों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं। हमें याद करना चाहिए, 2014 के भारत के लोकसभा चुनाव... जिसमें भाजपा ने काला धन वापस लाने का वादा किया था।  लेकिन अब तक नरेंद्र मोदी जैसे कद्दावर प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली पूर्ण बहुमत की सरकार इसे पूरा नहीं कर पाई है, बावजूद इसके कि यह मुद्दा भाजपा व उसकी मातृसंस्था आरएसएस की नीति, छवि व एजेंडे के अनुकूल है।
तो कुल जमा यही निष्कर्ष निकलता है, ट्रंप भारत, विश्व व खुद अमेरिका के लिए कितना उपयोगी साबित हो पाएंगे, इसमें भारी संदेह है। वैसे, इसमें कोई दो राय नहीं है कि डोनाल्ड ने मौजूदा चुनाव को काफी रोचक व चटखारेदार बना दिया है। भारत में दो साल पहले हुए लोकसभा चुनाव से इसमें समानता भी नजर आ रही है। आपको याद ही होगा, 2014 में हमारे यहां हुआ चुनाव मोदी बनाम अन्य में तब्दील हो गया था। इसमें प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत छवि बड़ा मुद्दा थी। 2002 में हुई गुजरात हिंसा का प्रेत तब भी उनका पीछा कर रहा था।  विपक्षी नेताओं ने उन्हें च्मगरूरज्, च्मौत का सौदागरज्  च्उग्र हिंदू नेताज् बताया था। अनेक व्यक्ति-संगठन उन्हें शांति-अखंडता के लिए खतरा मानकर, उनके खिलाफ कैंपेन चला रहे थे।  कुछ लोगों ने उनके पीएम बनने पर देश छोडऩे का एलान तक कर दिया था।
कुछ इसी तरह का इस बार ट्रंप के साथ भी हो रहा है। वे भी अपनी निगेटिव छवि को लेकर सबके निशाने पर हैं। उनके बयान, उनकी हरकतें... बड़ा मुद्दा बन चुकी हैं। ये चुनाव भी जबरदस्त ध्रुवीकरण का इशारा कर रहे हैं।  काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशन्स (सीएआईआर) के सर्वे के अनुसार, अमेरिका में रहने वाले 33 लाख प्रवासी मुस्लिमों में से 72 प्रतिशत ट्रंप के विरोध में हैं। ऐसा ही एकतरफा विरोधी रुख महिला मतदाताओं का भी नजर आ रहा है।
बहरहाल, मोदी तो तमाम नकारात्मक प्रचार के बावजूद, अपने आभामंडल व एंटी इन्कंबंसी की लहर पर सवार होकर न केवल धमाकेदार जीत दर्ज कर चुके हैं, बल्कि प्रधानमंत्री बनकर नए रूप ( कम आक्रामक, ज्यादा समन्वयवादी, सुलझे हुए) में भी दिखाई पड़ रहे हैं... जबकि ट्रंप अभी इम्तिहान देने बैठ रहे हैं, लोगों का विश्वास जीतने, जुगत कर रहे हैं।
अब यह तो नवंबर में होने वाले चुनाव के बाद ही पता चलेगा कि डोनाल्ड ट्रंप   33 लाख प्रवासी मुस्लिमों, 34 लाख भारतवंशियों सहित 200 मिलियन अमेरिकी वोटर में कितनों का दिल जीत पाते हैं?  लेकिन एक बात तय है, उन्होंने मौजूदा चुनाव को ऐसी लड़ाई में तब्दील कर दिया है, जिससे अछूता नहीं रहा जा सकता... या तो लोग उनके साथ होंगे या उनके विरोध में... यकीनन, ये चुनाव ट्रंप के लिए परीक्षा और अमेरिका के लिए अग्नि परीक्षा साबित होने वाले हैं...
एक बात और...
एक तरफ ट्रंप के समर्थन में 'एवीजी ग्रुप ऑफ  कंपनीजÓ के अध्यक्ष भारतीय-अमेरिकी शलभ कुमार हैं, जिन्होंने उनके चुनावी अभियान में 10 लाख अमेरिकी डॉलर से भी ज्यादा का योगदान दिया है, तो दूसरी तरफ ट्रंप विरोधी प्रवासी नेता राज मुखजी भी हैं, जो कहते हैं- च्यदि आप असली हिंदू हैं तो आप एक मुसलमान भी हैं... आप ईसाई व यहूदी भी हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इसी में मेरा समुदाय विश्वास करता है।ज्
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16 October 2016

पाक कलाकारों का विरोध... नफरत, जरूरत या नियति?

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर आधारित, मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन का उपन्यास च्लज्जाज् 90 के दशक में बहुत मकबूल हुआ था। इसमें सांप्रदायिकता (मुस्लिम व हिंदू दोनों) को निशाना बनाया गया था और च्बाबरी विध्वंसज् को तत्कालीन उपद्रव की प्रतिक्रिया दर्शाया गया था। लेखिका का मानना था, च्भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि) की आत्मा एक है और यहां कहीं भी कुछ होगा, तो उसका असर सब तरफ फैलेगा। भारत में यदि फोड़े का जन्म होगा, तो उसके प्रभाव से पड़ोसी देश भी अछूते नहीं रहेंगे। यहां का साझा इतिहास व साझा भविष्य है।ज्
भारत में इन दिनों पाकिस्तानी कलाकारों का जो विरोध हो रहा है, वह भी एक प्रतिक्रिया ही है। उरी सेक्टर में हुए हमले के बाद, यहां लोगों में जबरदस्त गुस्सा है।  वे आतंकियों, उनके सरपरस्तों, उनसे सरोकार रखने वाली किसी भी वस्तु-व्यक्ति के प्रति सीने में अंगार लिए बैठे हैं।  यह आम लोगों के जस्बात हैं। इसे भले ही सही-गलत या तार्किक-अतार्किक कहा जा सकता है, लेकिन आम प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है, स्वस्फूर्त... खुशी या गम से तुरंत आंदोलित होने वाली...।
और क्योंकि बॉलीवुड कलाकार भी क्रिया-प्रतिक्रिया, आवेग-मनोवेग से प्रभावित होते हैं, लिहाजा वे भी इस मामले से बेअसर नहीं हैं।  नाना पाटेकर, अनुपम खेर जैसे अनेक एक्टर हैं, जो चाहते हैं... पाक कलाकारों पर बैन लगे, वे यहां से चले जाएं। हालांकि इस मामले में बॉलीवुड का एक तबका पाक कलाकारों के समर्थन में भी खड़ा है। सलमान खान, करण जौहर जैसे लोगों का कहना है- च्कलाकार आतंकी नहीं होता व कला और राजनीति को अलग रखा जाना चाहिए।ज्
तो एक तरफ तो राष्ट्रवादी भावनाएं हैं और दूसरी तरफ पाक कलाकारों के पक्ष में दिए बयान....किसे सही माना जाए?
 यकीनन, किसी भी उदारवादी, खुले दिल वाले शख्स को पाक कलाकारों के समर्थन वाले तर्क सही लगेंगे... इनसे मन सहमत भी होता है, लेकिन राष्ट्रवादी भावनाओं का क्या?  क्या इससे खुद को अलग रखा जा सकता है? उदाहरण के तौर पर अगर भारत, पाकिस्तान पर हमला करके कत्लेआम कर दे... तब भी क्या पाकिस्तानी कलाकार भारत में इस घटना का असर लिए बिना काम कर पाएंगे? क्या उनका मन भारत, भारतीयोंं के लिए कसैला नहीं होगा?
यकीनन, ऐसा ही कुछ होगा... आम पाकिस्तानी मन की यही प्रतिक्रिया होगी। आखिर इसीलिए तो उरी हमले के बाद इधर, भारत में पाक कलाकारों का विरोध हो रहा है तो उधर कराची, इस्लामाबाद के सिनेमाघरों में भारतीय फिल्मों पर रोक लगी हुई है। लाहौर के सुपर सिनेमा ने फेसबुक में लिखा था- च्हम अपनी पाक सेना के समर्थन में भारतीय फिल्मों का विरोध करते हैं।ज्
दरअसल, राष्ट्रीय हित-अहित, पसंद-नापसंद से खुद को अलग नहीं रखा जा सकता है। इस तरह की प्रतिक्रियात्मक भावनाएं स्वाभाविक रूप से उपजती हैं। लेकिन दिक्कत तब खड़ी होती है, जब ये अतिवादी रुख अख्तियार कर निर्दोष लोगों को अपनी चपेट में ले लेती हैं। यही इसका दुखद पहलू है। लेकिन इनके साइडइफेक्ट से बचना आम इंसान के लिए आसान भी नहीं होता, इसीलिए गेहूं के साथ घुन भी पिसता चला जाता है।
वैसे, देखा जाए तो खिलाडिय़ों, कलाकारों के रिश्ते... राष्ट्रीय संबंधों के आगे उथले ही होते हैं। ये एक समय तक ही संभाले जा सकते हैं। वास्तव में, राष्ट्रगत मामलों में राजनीतिक संबंध ही केंद्र पर होते हैं, इनके बनने-बिगडऩे से सारी चीजें अपने आप प्रभावित होने लगती हैं। इसके उलट, कला, संस्कृति, व्यापार, खेल या अन्य कोई संबंध एक पक्षीय होते हैं, जिसका क्षेत्र विशेष पर ही असर रहता है।
यह ऐसा ही है, जैसे दो परिवार के मुखिया के बीच विवाद होने पर अन्य सदस्यों के आपसी ताल्लुकात प्रभावित होने लगते हैं। यदि विवाद बड़ा न हो तो बच्चों व महिलाओं के बीच बोलचाल, लेनदेन जारी भी रहता है। लेकिन बात बढऩे पर महिलाएं-बच्चे भी अपने-अपने मुखिया के साथ खड़े हो जाते हैं, या उन्हें खड़ा होना पड़ता है। जैसे लडऩे वाले दो मुखिया के परिजनों के निजी संबंध कायम नहीं रह पाते, वैसा ही हाल राष्ट्रगत मामलों में कला, खेल जैसे संबंधों का होता है। यही महिलाओं-बच्चों, कलाकारों-खिलाडिय़ों के संबंधों की नियति है। लेकिन बदकिस्मती से इनसे बचने का कोई उपाय भी मालूम नहीं पड़ता है।
वैसे, सारे पहलुओं को ताक पर रखकर निजी रिश्ते को तरजीह देना, कोई सही चुनाव नहीं है। यह एकपक्षीय नजरिया है और इस तरह का अतिवादी रुख गैरव्यवहारिक होता है। जो लोग यह कहते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, पाक कलाकारों पर बैन लगना ही नहीं चाहिए... उन्हें यह समझना होगा कि किसी भी फैसले के पीछे बहुत सारे कारक होते हैं। ऐसा नहीं है कि पाक कलाकारों पर बैन, नफरत या आम लोगों के प्रतिक्रियात्मक रुख की वजह से ही हो। यह कूटनीतिक दबाव बनाने या असामान्य हालात में उनकी सुरक्षा के मद्देनजर भी हो सकता है।
इसी तरह, ऐसे लोग जो पाक कलाकारों का विरोध स्थायी नफरत के चलते कर रहे हैं, उन्हें अपने पूर्वग्रह से ऊपर उठकर चीजों को खुले रूप में देखने की जरूरत है। उन्हें समझना होगा कि नफरत का बीज ही राष्ट्रवाद, जातिवाद, नस्लवाद, क्षेत्रवाद भाषावाद की आड़ में अनिवार्य फसाद का कारण बनता है... जिसकी गवाह तारीखें बनती हैं और जिसका दंश सदियों को भुगतना पड़ता है।
सच तो यह है अच्छा या बुरा किसी भी तरह का एकपक्षीय रवैया घातक ही होता है। अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी को मुस्लिम होने के चलते रामलीला में भाग नहीं लेने देना जितना गलत है, उतना ही गलत मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते, ममता सरकार द्वारा मुहर्रम के दिन दुर्गा विसर्जन का समय तय करना भी है। दोनों के ही दीर्घकालिक नुकसान हैं।
वास्तव में एकपक्षीय नजरिए या अतिवादी रुख से जिंदगी नहीं चल सकती है, लेकिन हम अपने मत, धारणा के इतर चीजों को उसकी पूर्णता में देखना नहीं चाहते हैं। अभी पिछले दिनों अगस्त में कुत्तों के आतंक से परेशान, केरल में 65 साल की महिला को 50 कुत्तों ने नोचकर मार डाला था। इसके बाद, राज्य  सरकार ने कुत्तों को चुनकर मारने का फैसला लिया।  सुप्रीम कोर्ट ने भी खतरा बने आवारा कुत्तों को मारना जायज ठहराया था। लेकिन पशुप्रेमी केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी किसी भी हालात में, किसी भी कुत्ते को मारने के विरोध में हैं। बेशक, पशु प्रेम अच्छी बात है, लेकिन क्या उसे इंसानियत पर तरजीह दिया जा सकता है?
मेनका गांधी या उन जैसे अतिवादियों की ऐसी सोच के चलते ही चीजें एक समय बाद खतरनाक रुख अख्तियार कर लेती हैं। व्यक्तिगत या राष्ट्रगत मामले में भी ऐसा ही होता है। शांति, प्यार, सद्भावना जैसे आदर्श भी एक समय तक... एक सीमा तक ही निबाहे जा सकते हैं... वे अंतिम लक्ष्य या साध्य नहीं बन सकते...
एक बात और...
महाभारत युद्ध के दौरान, मृत्युशैय्या पर पड़े भीष्म से चर्चा के दौरान भगवान कृष्ण ने कहा था- च् आपने शांति कायम रखने और युद्ध से बचने के लिए दुर्योधन की हर गलती हो नजरअंदाज किया था।  लेकिन न युद्ध टाला जा सका, न शांति कायम रह पाई। अगर आप दुर्योधन की नाजायज हरकतों का... महत्वाकांक्षाओं का शुरू में ही विरोध कर देते... उसे रोक देते तो शायद युद्ध नहीं होता... भरत वंश का नाश नहीं होता...
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04 October 2016

सारा जमाना....गोरे रंग का दीवाना.


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च् मान्यताएं-धारणाएं कब सोच में घर कर जाती हैं, पता ही नहीं चलता। लेकिन गाहे-बगाहे, औपचारिक-अनौपचारिक मौकों पर हमारा व्यवहार-प्रतिक्रिया हमारे अवचेतन का आईना बन ही जाते हैं। ज्
हाल में टीवी शो 'कॉमेडी नाइट्स बचाओÓ में एक्ट्रेस तनिष्ठा चटर्जी के सांवले रंग को लेकर जमकर मजाक बनाया गया था। उन्हें इतना कुछ कहा गया कि वे नाराज होकर... शो बीच में छोड़कर चली गईं।  तनिष्ठा को चिढ़ाते हुए कहा गया- आपने  बचपन में जामुन बहुत खाया होगा। उनके सरनेम चटर्जी का जिक्र कर व्यंग्य किया गया कि वे ब्राह्मण होकर भी सांवली हैं।
पश्चिम से आयातित इस शो का स्वरूप इसी तरह का है। इसमें आने वाले मेहमानों की जमकर खिंचाई की जाती है।  उनकी कमियों-कमजोरियों को निशाना बनाया जाता है। तनिष्ठा के साथ जो कुछ हुआ उसकी स्क्रिप्ट भी पहले से तय होगी। माना जा सकता है, उन्हें जो कुछ कहा गया, उसके पीछे जानबूझकर अपमानित करने की नीयत नहीं होगी। शो के एंकर्स का इरादा अपनी च्स्टाइलज् में केवल कॉमेडी करना होगा।
लेकिन इसके बाद भी तनिष्ठा के रंग को लेकर किया गया तंज कहीं-न-कहीं हमारे अवचेतन में छिपे गोरे रंग के प्रति आग्रह को ही दर्शाता है।  इससे यही बात जाहिर होती है कि हम भले कितने ही खुले विचारों वाले... कितने ही विकसित हो जाएं, लेकिन हमारी सोच में कहीं-न-कहीं गौरवर्ण के लिए महीन आकर्षण बरकरार रहता है।
और इसमें कोई अचरज नहीं होना चाहिए कि सोच में जड़ जमाए इस तरह के विचार हमारे व्यवहार-प्रतिक्रिया पर भी असर डालते हैं।  आखिरकार, कुछ समय पहले अभिनेत्री नंदिता दास ने सांवलेपन के कारण फिल्में न मिलने की बात कही ही थी। समानांतर सिनेमा का परिचित चेहरा कोंकणा सेन शर्मा ने भी माना था कि फिल्म इंडस्ट्री में रंग को लेकर भेदभाव होता है।  वास्तव में, त्वचा के रंग को लेकर भारतीय जनमानस में कुंठा नई बात नहीं है। आज भी गोरे रंग व गोरे लोगों को स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ माना जाता है।  आज भी हमारे यहां शादी के लिए लड़की का रंग महत्वपूर्ण पैमाना होता है। अधिकांश मां-बाप गोरी लड़कियों को ही तरजीह देते हैं।
कुछ लोग तर्क देते हैं, 150 साल तक अंग्रेजों (गोरों) की गुलामी ने हमारे भीतर  हीनभावना भर दी है। हमारे अवचेतन ने अंग्रेज, अंग्रेजी, अंग्रेजियत को अपने से श्रेष्ठ स्वीकार कर लिया है। इसीलिए हमारे भीतर गोरे रंग को लेकर इतना लगाव है। यह बात कितनी सच है, यह तो नहीं पता, लेकिन गौरवर्ण के चाहने वाले सारी दुनिया में हैं।  समाजवादी कहे जाने वाले चीन में भी इसके शैदाई हैं। पिछले दिनों वहां एक विज्ञापन ने बहुत सुर्खियां बटोरी थी।  उसमें च्एक चीनी औरत एक काले आदमी को डिटर्जेंट खिलाकर वॉशिंग मशीन में डाल देती है, जिसमें धुलने के बाद वो नीग्रो गोरा होकर निकलता है। महिला यह देखकर खुश हो जाती है और मुस्करा कर उसका स्वागत करती है।ज्
इस एड की चीन में जमकर आलोचना हुई थी, इसे काले लोगों के प्रति नस्लीय रवैये का उदाहरण माना गया था। इस तरह के विज्ञापन का विरोध बिलकुल सही है।  वास्तव में, गोरे रंग के प्रति आकर्षण बहुत ही घातक है। इससे जबरदस्त विभाजन पैदा होता है।  इतिहास गवाह है, इसके चलते ही नस्लीय भेदभाव हुए हैं। टेनिस स्टार सेरेना विलियम्स, अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी से  लेकर दिवंगत बॉक्सर मोहम्मद अली, महात्मा गांधी तक इसके शिकार हो चुके हैं।  शायद, इन्हीं सब खतरे को देखकर हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने रंगभेद के प्रति उदार रवैया अपनाया था और आजादी के तुरंत बाद अफ्रीकी छात्रों के लिए शिक्षण संस्थाओं के द्वार खोल दिए थे। प्राचीन हिंदू समाज भी शायद रंगभेद की गंभीरता को समझता था। इसीलिए, संभवत: हमारे अनेक देवी-देवताएं श्याम वर्ण के बताए गए हैं।
लेकिन बदकिस्मती से ये विचार हमारी सोच में जगह नहीं बना पाए। मजे की बात यह है कि हम सब, प्रत्यक्ष (चेतन ) रूप  से कई चीजों को जानते-समझते हैं, लेकिन उसके बाद भी परोक्ष  (अचेतन) रूप से हम उसे बढ़ावा देते चले जाते हैं।  जैसे, हम अच्छी तरह जानते हैं, त्वचा के रंग के लिए भौगोलिक परिवेश जिम्मेदार होते हैं। हम यह भी जानते हैं, रंग कभी भी योग्यता का पर्याय नहीं बन सकते। बावजूद इसके, हमारे अंदर गोरे होने की ललक बनी रहती है... काले रंग के प्रति कमतरी का भाव बना रहता है।
पिछले दिनों, एक मार्केट रिसर्च कंपनी ग्लोबल इंडस्ट्री एनालिस्ट इनकॉर्पोरेटेड ने दावा किया कि विश्व में 2020 तक गोरे होने वाले उत्पादों का कारोबार 23 बिलियन डॉलर्स तक जा पहुंचेगा और उसमें सबसे बड़ी भागीदारी एशियाई देशों की होगी। इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि त्वचा के रंग को लेकर हमारे मन में किस तरह की हीनता, किस तरह के पूर्वग्रह हैं।
और जब तक हमारी सोच इस तरह की होगी, तब तक तनिष्ठा चटर्जी जैसे लोग अपनी त्वचा के रंग को लेकर अपमानित होते रहेंगे...
और जिस दिन हम फेयर क्रीम खरीदना बंद कर देंगे, उस दिन शायद माना जा सकेगा कि हमारा अवचेतन रंगों की गुलामी से मुक्त हो चुका है...
                                                                   एक बात और...     

कोच्चि, केरल की जया ने इस साल 26 जनवरी से 100 दिन का मिशन शुरू किया था। वे  रंगभेद को लेकर जागरुक करने रोजाना चेहरे पर कालिख पोतकर सड़कों पर घूमा करती थीं।  मांट्रियल, कनाडा में भी काली लड़कियां गोरी जितनी खूबसूरत, स्मार्ट व आकर्षक मानी जाती हैं। यहां के क्लबों में अफ्रीकन नृत्यांगनाओं को गोरी लड़कियों से ज्यादा दाम दिए जाते हैं।
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19 September 2015

एकांत और रचनात्मकता

रचनात्मकता के लिए ‘एकांत’ अथवा ‘निजता’ का बड़ा महत्व है. विश्व इतिहास में अनेक महान रचनाशील चिन्तक, वैज्ञानिक, और कलाकार हुए हैं जिन्होंने एकांत के क्षणों में दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया. ऐसे ही कुछ महान व्यक्तियों जीवन और निजता पर उनके विचारों की बानगी आपके लिए प्रस्तुत है.वोल्फगैंग अमेडियस मोज़ार्ट 
 मोज़ार्ट उन्नीसवीं शताब्दी के महान शास्त्रीय संगीतकार थे. उन्होंने 600 से भी अधिक अमर धुनों की रचना की. पैंतीस वर्ष की अवस्था में ही उनका निधन हो गया.
“घोड़ागाड़ी के भीतर सफ़र करते समय, भोजन के बाद की सैर के वक़्त या नींद की तलाश में अपने बिस्तर पर मैं खुद के साथ, निपट अकेला और अपने में मगन रहता हूँ. यही वे क्षण हैं जब मेरे विचारों की श्रृंखला निर्बाध चलती है और रचनात्मकता फूट पड़ती है”.
अलबर्ट आइन्स्टीन – 
 सैद्धांतिक भौतिकविद, दार्शनिक, और लेखक के रूप में विभूषित होने वाले विद्वान और बीसवीं शती के सबसे चर्चित और प्रभावशाली वैज्ञानिक. इन्हें आधुनिक भौतिकी का जनक भी कहते हैं.
“हांलांकि मैं नियत समय के अनुसार काम करता हूँ पर मुझे अचानक ही समुद्रतट पर अकेले लम्बी सैर पर चल  पड़ना अच्छा लगता है. उस समय मैं अपने भीतर हो रही हलचल को सुन सकता हूँ. जब मेरा काम नहीं बन रहा हो तब मैं उसे बीच में ही छोड़कर लेट जाता हूँ और छत को निहारता रहता हूँ. तब मेरी कल्पनाशक्ति मेरे समक्ष साकार हो उठती है. मैं उसे देख और सुन भी सकता हूँ.”
फ्रेंज काफ्का 
 बीसवीं शताब्दी के सर्वथा मौलिक रचनाकार थे. उनके लघु उपन्यासों और छोटी-छोटी कहानियों को आधुनिक साहित्य में बेजोड़ माना जाता है.
“तुम्हें अपना कमरा छोड़कर कहीं जाने की ज़रुरत नहीं है. अपनी टेबल पर बैठकर ध्यान से सुनते रहो. तुम्हें सुनने की ज़रुरत भी नहीं है – बस इंतजार करो… शांत और अचल रहने का प्रयास करो. यह दुनिया खुद-बखुद तुम्हारे सामने स्वयं को उजागर करेगी. इसके सामने और कोई विकल्प नहीं है…यह भावातिरेक में तुम्हारे पैरों पर उमड़ पड़ेगी.”
निकोला टेस्ला 
 आविष्कारक और विद्युत के व्यापारिक उत्पादन के क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान देनेवाले वैज्ञानिक. विद्युत चुम्बकत्व के क्षेत्र में उनकी खोज ने अनेक वैज्ञानिकों को प्रेरित किया.
“एकांत में हमारा मन केन्द्रित और स्पष्ट हो जाता है. निजता के क्षणों में मौलिकता उर्वर हो जाती है और इसपर बाहरी उद्दीपनों का प्रभाव नहीं पड़ता. कुछ पल अकेले रहकर देखिये – यही आविष्कारकों का रहस्य है. अकेले रहिये और अपने विचारों को जन्म लेते देखिये.”
जोज़फ़ हैडेन 
ऑस्ट्रिया के संगीतज्ञ हैडेन ने अपना लगभग पूरा जीवन एक धनिक के निजी संगीतज्ञ के रूप में उनकी दूरस्थ रियासत पर व्यतीत किया. इस तरह उनपर दूसरे संगीतज्ञों और रचनाकारों का प्रभाव नहीं पड़ा. उन्हीं के शब्दों में – “मौलिक होना तो जैसे मेरी मजबूरी ही थी”.

योहान वोल्फगैंग वोन गोथे 
– जर्मनी के बहुश्रुत लेखक. कविता, नाटक, धार्मिक साहित्य, दर्शन, और विज्ञान के विषयों पर उनका समान अधिकार था.
“सामाजिकता हमें सिखा सकती है पर निजता हमें प्रेरित करती है”.

पाब्लो पिकासो 
 बीसवीं शती के लम्बे कालखंड में अपनी विविध रचना शैलियों के कारण आधुनिक कला पर अपनी अभिनव छाप छोड़नेवाले कलाकार. उनकी क्रांतिकारी उपलब्धियों के कारण वे अत्यधिक सम्मानित और समृद्ध हुए. बीसवीं शती के संभवतः एकमात्र प्रतिनिधि कलाकार.
“गहन एकांत के बिना गंभीर कर्म कर पाना मुमकिन नहीं है”.
थॉमस मान 
महान जर्मन उपन्यासकार, कथाकार, आलोचक, मानवतावादी, निबंधकार और 1929 के नोबल पुरस्कार विजेता. वे अपने लेखन में गहन प्रतीकों और विसंगतियों के चित्रण और मानव स्वभाव की परख करनेवाले साहित्यकार के रूप में प्रसिद्द हैं.
“एकांत के क्षणों में हमारे भीतर कुछ मौलिक उपजता है – जैसे अनजानी खूबसूरत या ध्वंसात्मक कविता.”