30 August 2012

पूर्ण

पूर्ण का जन्‍म सुपारा(मुम्‍बई) में एक अमीर व्‍यापारी के घर हुआ। उस व्यापारी की पहले ही तीन पत्‍नी होने के बाद भी उसका एक दासी से प्रेम हो गया। एक दासी और एक व्यापारी के मधुर प्रेम की उत्‍पती थे पूर्ण। पहली तीनों पत्नियों से एक-एक पुत्र पहले ही से थे। जब पूर्ण नवयुवक हुआ तब उसने अपनी पिता से पूछा की वह अपनी भाईयों के संग व्यापार कर सकता है। समुन्दरी यात्राओं पर जाने का उसका बड़ा मन करता था। पर उसके पिता ने कहा नहीं तुम दुकान देखो। मणि माणिक का व्यापार थी पूर्ण के पिता, थाईलैंड,मलेशिया, मलद्वार, सिंगापुर, बसरा…..दूर-दूर तक उनका आना जाना थी। दुकान पर बैठ कर भी पूर्ण ने अच्‍छा व्‍यवसाय किया और जो भी मुनाफा मिलता अपने तीनों भाइयों का हिस्‍सा अलग कर देता था। यानि एक हिस्‍सा अपने पास रखता और तीन हिस्‍से तीनों भाइयों में बराबर बाट देता। इससे उसके भाई उसकी चतुराई से बहुत प्रसन्‍न हुए और धीरे-धीरे उसे समुन्दरी यात्राओं पर भी संग ले जाने लगे।
पूर्ण मेधावी और चतुर था पर चालाक नहीं था। वह जब दुर समुन्दरी यात्रा पर चलता तब बहुत से और व्यापारियों को संग ले लेता उस जमाने में समुन्दरी यात्रा करना जान जोखिम में डालने जैसा था। चोर डाकू के साथ तूफान का खतरा हमेशा बना रहता था। जितने ज्‍यादा व्यापारी संग ले सकता उतने ले कर चलता पूर्ण और किसी को कोई कर देने की आवश्‍यकता भी नहीं होती।
एक बार एक व्यापारी दल श्रावस्‍ती से आया वह पूर्ण को अपने संग समुन्‍द्ररी यात्रा पर साथ ले जाना चाहता था। पूर्ण इससे पहले छ: बार सुरक्षित यात्रा कर चुका था। इस लिए लोगों को भरोसा था की पूर्ण के संग चलने से जान की जोखिम कम है। फिर मणि-माणिक की भी अच्‍छी परख रखता था पूर्ण। पूर्ण के लाख मना करता रहा पर वह दल माना ही नहीं और पूर्ण को अपने संग ले गया। तीन माह का सफर था। रास्‍ते में व्यापारियों ने भगवान बुद्ध की बातें की। श्रावस्‍ती का मनुष्‍य हो और भगवान की बातें न करे ये असंभव था। पूर्ण उनकी बातों से इतना प्रभाविता हुआ की उसने उसी समय मन में धारणा बना ली कि एक बार जरूर भगवान के दर्शन को जायेगा।
जब एक साल बाद पूर्ण उस दल के साथ सुपारा आया तब उसके भाइयों ने जिद की तुम अब शादी कर लो। पूर्ण ने कहां बस कुछ माह और। मैं इन व्यापारी दल के साथ एक बार श्रावस्‍ती जाना चाहता हूं उसके बाद आप जो कहेंगे वही करूंगा। श्रावस्‍ती पहुंच कर उन व्यापारियों ने पूर्ण अनाथ पिंडक से मिलवाया। अनाथ पिंडक न समझा कोई व्‍यापारी मिलने आ रहा है। उसने कहां देखो युवक मुझे इस व्यापार आदि में अब कोई रूचि नहीं रही। सही मायने में इससे मुक्‍त हो गया हूं। आप किसी दूसरे व्यापारी से बात करे। पर पूर्ण ने कहा। मैं आपसे व्यापार के संबंध में नहीं आप मुझे एक बार भगवान के दर्शन करा दे आपकी अति कृपा होगी। मैं 3000 मील चल कर आ रहा हूं केवल भगवान के दर्शन के लिए।
अनाथ पीड़क पूर्ण को ले भगवान की गंध कुटी में गया। पूर्ण ने भगवान को देखा और आंखें बंद कर ली और कहां अब कुछ नहीं देखना मुझे दीक्षित कर दीजिए। अब कहीं भी न आन है न जाना। है पूर्ण ने तत्क्षण दीक्षा ली और अपने पीछे आये मुनीम और दूसरें लोगों को घर भज दिया में माता-पिता और भाई बंधुओं से मेरी और से क्षमा मांगना। पर मुझे मेरा घर मिल गया। अब मैं कभी नहीं जाऊँगा। मुनीम और दूसरे साथ उसके साहस और संकल्प देख कर हतप्रभ थे। पूर्ण भगवान के कुछ गिने हुए शिष्‍यों में से एक था। बिहार में एक जगह है। सुक्का और वहां के आदमी अति कुरूर और हंसक है। वहां पर धर्म प्रचार के लिए जो भी गया उसे या तो मार दिया गया या उसे बहुत सताया गया। इस लिए वहां पर कोई भी भिक्षु जाने के लिए तैयार नहीं था। पूर्ण जब अरिहंत को उपल्बध हुआ और उसे लगा कि अब मेरे पास आनंद है। और मैं इसे बांट सकता हूं।
उस समय की खूबसूरत घटना को कविता में श्री भवानी प्रसाद मिश्र ने वर्णन किया है। पूर्ण भगवान से आज्ञा मांगता है सुक्का जाने के लिए…..
अर्धोन्‍मीलित नयन बुद्ध बैठे थे पद्मासन में,
शिष्‍य पूर्ण ने कहा, जिस तरह प्राण व्‍याप्‍त त्रिभुवन में,
अथवा वायु निरभ्र गगन में जैसे मुक्‍त विचरता
मैं त्रिलोक में वैसा ही कुछ है प्रभु, घुमा करता
शैल-शिखर, नदियों की धारा, पारावार तरू में
वचन आपके जहां कहीं, जा पहुंचूं वहीं मरूं मैं
विकल मानवों के मन जागें शांति प्रभा में ऐसे,
सूर्योदय के साथ जाग जाते है शतदल जैसे
पूर्ण ने कहा कह आपके वचनों की सुगंध फैलाता हुआ मरूं, बस यही एक आकांक्षा है। जैसे सूर्य के ऊगने पर हजार-हजार कमल खिल जाते है, ऐसे आपकी ज्योति को पहुंचाऊं और लोगों के ह्रदय-कमल खिले।
वत्‍स, किंतु यदि लोग न समझें, करें तुम्‍हें अपमानित?
कहा पूर्ण ने, प्रभु उनको में नहीं गिनुंगा अनुचित
धन्‍यवाद ही दूँगा, फेंकी धूल न पत्‍थर मारे
केवल कुछ अपशब्‍द, विरोधी बातें सुनी, उचारे
बुद्ध ने पूछा कि अगर लोग अपमान करेंगे पूर्ण तो फिर तुझे क्‍या होगा? लोग न समझेंगे तो फिर तुझे क्‍या होगा? तू तो समझाने जाएगा, लोग समझते कहां है। लोग समझना चाहते ही नहीं। लोग तो जो समझाने आता है उस पर नाराज हो जाते है। लोग अगर तेरा अपमान करेंगे, तो तुझे क्‍या होगा?
पुर्ण ने कहां बड़े भले लोग है, ऐसा धन्‍यवाद मानूँगा। कुछ थोड़े से अपशब्‍द ही कहे, पत्‍थर भी मार सकते थे। धूल ही उछाल सके। थोड़े अपशब्‍द ही कहे। अपशब्‍दों से क्‍या बनता बिगड़ता है। न कोई चोट लगती है, न कोई धाव होता है बड़े भले लोग है।
किंतु अगर वे हाथ उठाएं, फेंके तुम पर ढेले?
धन्‍यवाद ही दूँगा, मानूँगा छेड़छाड़ की खेले।
असि न कोश से खींची उनने, किया नहीं वध मेरा
अगर ऐसा भी हो सकता है वे ढेले भी मारे, तुम्‍हारी पिटाई भी करें, पत्‍थरों से तुम्‍हारा सर तोड़ दें, पूर्ण ने कहा, खुश होऊंगा, बड़े भले लोग है। तरकस से तीन न निकाला, प्राण ही न ले लिए मेरे, सिर्फ पत्‍थर ही मारे। खेल ही क्रीड़ा ही समझूंगा, मारा ही, मार नहीं डाला, इतना क्‍या कम है।
और वत्‍स, यदि वध कर डाला उन लोगों ने तेरा?
धर्म-पंथ पर प्राण गए, निर्वाण उसे जानूंगा
प्रभु ने अर्धोन्‍मीलित लोचन खोल पूर्ण को देखा
अधरों पर प्रस्‍फुटित हो उठी सहज स्‍नेहमय रेखा
रखा शीश पर हाथ पूर्ण के, कहा वत्‍स तुम जाओ
निर्भय होकर विकल मनों में शांति प्रभा प्रकटाओ
जब पूर्ण ने कहा कि सिर्फ मारते है, मार ही नहीं डालते; तो बुद्ध ने पूछा, और अगर वे मार ही डालें? फिर तुझे क्‍या होगा पूर्ण? तो उसने कहा, धर्म के पथ पर अगर मर जाऊँ तो उससे शुभ और मृत्‍यु क्‍या होगी?
प्रभु ऐसी यदि मृत्‍यु मिले तो भाग्‍य उसे मानूँगा
धर्म-पंथ पर प्राण गए, निर्वाण उसे जानूंगा
इतनी शांति भीतर हो कि मौत भी पीड़ा न दे। इतना ध्‍यान भीतर हो अपमान भी अपमान न लगे। ध्‍यान का अर्थ होता है? जो तुम्हारे अंतरतम में छिपा है। उसे उघाड़ कर देख लेना। पर्दे को हटाना। अपनी निजता का अनुभव कर लेना।
ऐसे ही ध्‍यान को उपल्‍बध व्‍यक्‍ति इस जगत में सुख की थोड़ी सी गंगा को उतार ला सकते है। ऐसे ही भगीरथ गंगा को पुकार सकते है। सुख की तुमसे यह है हो सकेगा। ध्‍यान का तुम्‍हें अर्थ भी पता नहीं है। यह बड़ा दुस्चक्र है। ध्‍यान का अर्थ है—होश पूर्वक जीना। बिना ध्‍यान के जो आदमी जीता है बेहोशी में जीता है।
पूर्ण सच में ही पूर्ण हो गया ऐसे शिष्‍य को देख गुरु भी धन्‍य हो जाता है।

ऊब

जब जहां भी ऊब आ जाए वहीं टर्निंग प्वाइंट होता है। अगर आपने बंद कर दिया तो आप अपनी पुरानी स्‍थिति में लौट जाते है। और अगर जारी रखा तो आप नयी चेतना को जनम दे लेते हे। (मैं कहता आंखन देखी–ओशो)

उद्दालक और श्‍वेतकेतु

उपनिषद में कथा है:- उद्दालक का बेटा श्‍वेतकेतु ज्ञान लेकर घर लौटा; विश्‍वविद्यालय से घर आया। बाप ने देखा, दूर गांव की पगडंडी से आते हुए। उसकी चाल में मस्‍ती कम और अकड़ ज्‍यादा थी। सुर्य पीछे से उग रहा था। अंबर में लाली फेल रही थी। पक्षी सुबह के गीत गा रहे थे। पर उद्दालक सालों बाद अपने बेटे को घर लोटते देख कर भी उदास हो गया। क्‍योंकि बाप ने सोचा था विनम्र होकर लौटेगा। वह बड़ा अकड़ा हुआ आ रहा था। अकड़ तो हजारों कोस दूर से ही खबर दे देती है अपनी। अकड़ तो अपनी तरंगें चारों तरफ फैला देती है। वह ऐसा नहीं आ रहा था की कुछ जान का आ रहा है। वह ऐसे आ रहा था जैसे मूढ़ता से भरा हुआ। ऊपर-ऊपर ज्ञान तो संग्रहीत कर लिया है। पंडित होकर आ रहा है। ज्ञानी होकर आ रहा है। विद्वान होकर आ रहा है। प्रज्ञावान होकर नहीं आ रहा। ज्ञानी हो कर नहीं आ रहा। कोई अपनी समझ की ज्‍योति नहीं जली है। अंधेरे शास्‍त्रों का बोझ लेकर आ रहा है। बाप दुःखी और उदास हो गया
बेटा आया, उद्दालक ने पूछा कि क्‍या–क्‍या तू सीख कर आया?
उसने कहा, सब सीख कर आया हूं। कुछ छोड़ा नहीं, यही तो मूढ़ता का वक्‍तव्‍य है। उसने गिनती करा दी, कितने शास्‍त्र सीख कर आया हूं। सब वेद कंठ हस्थ कर लिए है। सब उपनिषद जान लिए है। इतिहास, भूगोल, पुराण, काव्‍य, तर्क,दर्शन, धर्म सब जान लिया है। कुछ छोड़ा नहीं है। सब परीक्षाए पूरी करके आया हूं। स्‍वर्ण पदक लेकर आया हूं।
बाप ने कहा लेकिन तूने उस एक को जाना, जिसे जान कर सब जान लिया जाता है?
उसने कहा कैसा एक? किस एक की बात कर रहे है आप? बाप ने कहां ,तूने स्‍वयं को जाना, जिसे जानने से सब जान लिया जाता है। श्वेत केतु उदास हो गया। उसने कहा, उस एक की तो कोई चर्चा वहां हुई ही नहीं।
तो बाप ने कहा, तुझे फिर जान पड़ेगा। क्‍योंकि हमारे कुल में हम सिर्फ जन्‍म से ही ब्राह्मण नही होते रहे है। हम जान कर ब्राह्मण होते है। यह हमारे कुल की परम्‍परा है। मेरे बाप ने भी मुझे ऐसे ही वापस लौटा दिया था। एक दिन तेरे की तरह मैं भी अकड़ कर घर आया था। सोचकर की सब जान लिया है। सब जान कर आ रहा हूं। झुका था बाप के चरणों में, लेकिन मैं झुका नहीं था। अंदर से। भीतर तो मेरे यही ख्‍याल था की मैं अब बाप से ज्‍यादा विद्वान हो गया हूं। ज्‍यादा जान गया हूं। लेकिन मेरे पिता उदास हो गये। और उन्‍होंने कहां वापस जा। उस एक को जान, जिसे जानने से सब जान लिया जाता है। ब्रह्मा को जान कर ही हम ब्राह्मण होते है। तुझे भी वापस जाना होगा श्‍वेतकेतु।
श्‍वेतकेतु की आंखों मैं पानी आ गया। और अपने पिता के चरण छुए। और वापस चला गया। घर के अंदर भी न गया था। मां ने कहां बेटा आया हैं सालों बाद, बैठने को भी नहीं कहां और कुछ खानें को भी नहीं। कैसे पिता हो। लेकिन श्‍वेतकेतु ने मां के पैर छुए और जल पिया और कहां मां अब तो उस एक को जान कर ही तुम्हारे चरणों में आऊँगा। जिसे पिता जी ने जाना है। या जिसे हमारे पुरखों ने जाना है। मैं कुल पर कलंक नहीं बनुगां।
श्‍वेतकेतु गया गुरु के पास। और पूछा गुरूवर उस एक को जानने के लिए आया हूं। तब गुरु हंसा। और कहां चार सौ गायें बंधी है गो शाला में उन्‍हें जंगल में ले जा। जब तक वह हजार न हो जाये तब तक न लोटना। श्वेत केतु सौ गायों को ले जंगल में चला गया। गये चरती रहती, उनको देखता रहता। अब हजार होने में तो समय लगेगा। बैठा रहता पेड़ो के नीचे, झील के किनारे, गाय चरती रहती। श्‍याम जब गायें विश्राम करती तब वह भी विश्राम करता। दिन आये, रातें आई, ,चाँद उगा, चाँद ढला, सूरज निकला, सूरज गया। समय की धीरे-धीरे बोध ही नहीं रहा। क्‍योंकि समय का बोध आदमी के साथ है।
कोई चिंता नहीं, न सुबह की न श्‍याम की। अब गायें ही तो साथी है। और न वहां ज्ञान जो सालों पढ़ा था उसे ही जुगाल कर ले। किसके साथ करे। खाली होता चला गया श्‍वेतकेतु गायों की मनोरम स्‍फटिक आंखे, आसमान की तरह पारदर्शी। देखना कभी गयों की आंखों में झांक कर तुम किसी और ही लोक में पहुंच जाओगे। कैसे निर्दोष और मासूम, कोरी, शुन्य वत होती है गायें की आंखे। उनका का ही संग साथ करते, कभी बैठ कर बांसुरी बजा लेता, अपने अन्‍दर की बांसुरी भी धीरे-धीरे बजने लगी, सालों गुजर गये। और अचानक गुरु का आगमन हो गया। तब पता चला गुरु को मैं यहां किस लिया आया था। तब गुरु ने कहा श्‍वेतकेतु हो गायें एक हजार एक गाय।
अब तू भी गऊ के समान निर्दोष हो गया है। और तूने उसे भी जान लिया जो पूर्ण से पूर्ण है। पर श्वेतकेतु इतना पूर्ण हो गया की उसमे कहीं मैं का भाव ही नहीं था। श्‍वेत केतु बुद्ध हो गया अरिहंत हो गया जान लिया ब्राह्मा को। जब श्वेत केतु अपने घर आया तो ऐसे आया कि उसके पदचाप भी धरा पर नहीं छू रहे थे। तब ऐसे आया विनम्रता आखिरी गहराइयों को छूती हो। मिट कर आया। और जो मिट कर आया। वहीं होकर आया। अपने को खोकर आया। वह अपने का पाकर आया। ये कैसा विरोधा भाष है।
शास्‍त्र का बोझ नहीं था अब, सत्‍य की निर्भार दशा थी। विचारों की भीड़ न थी। अब ध्‍यान की ज्‍योति थी। भीतर एक विराट शून्‍य था। भीतर एक मंदिर बनाकर आया। एक पूजा ग्रह का भीतर जन्‍म हुआ। अपने होने का जो हमे भेद होता है। वह सब गिर गया श्वेत केतु का, अभेद हो गया। वही जो उठता है निशब्द में। शब्‍दों के पास।
–ओशो एस. धम्‍मो. सनंतनो, भाग-3, प्रवचन—27,

विज्ञान भैरव तंत्र

एक अद्भुत ग्रंथ है भारत मैं। और मैं समझता हूं, उस ग्रंथ से अद्भुत ग्रंथ पृथ्‍वी पर दूसरा नहीं है। उस ग्रंथ का नाम है, विज्ञान भैरव तंत्र। छोटी सी किताब है। इससे छोटी किताब भी दुनियां में खोजनी मुश्किल है। कुछ एक सौ बारह सूत्र है। हर सुत्र में एक ही बात है। पहले सूत्र में जो बात कह दी है, वहीं एक सौ बारह बार दोहराई गई है—एक ही बात, और हर दो सूत्र में एक विधि हो जाती है।
पार्वती पूछ रहीं है शंकर से,शांत कैसे हो जाऊँ? आनंद को कैसे उपलब्‍ध हो जाऊँ? अमृत कैसे मिलेगा? और दो-दो पंक्‍तियों में शंकर उत्‍तर देते है। दो पंक्‍तियों में वे कहते है, बाहर जाती है श्‍वास, भीतर जाती है श्‍वास। दोनों के बीच में ठहर जा, अमृत को उपलब्‍ध हो जाएगी। एक सूत्र पूरा हुआ। बाहर जाती है श्‍वास, भीतर आती है श्‍वास, दोनों के बीच ठहरकर देख ले, अमृत को उपलब्‍ध हो जाएगा।
पार्वती कहती है। समझ में नहीं आया। कुछ और कहें। शंकर दो-दो में कहते चले जाते है। हर बार पार्वती कहती है। नहीं समझ में आया। कुछ और कहें। फिर दो पंक्‍तियां। और हर पंक्‍ति का एक ही मतलब है, दो के बीच ठहर जा। हर पंक्‍ति का एक ही अर्थ है, दो के बीच ठहर जा। बाहर जाती श्‍वास, अंदर जाती श्‍वास। जन्‍म और मृत्‍यु, यह रहा जन्म यह रही मृत्‍यु। दोनों के बीच ठहर जा। पार्वती कहती है, समझ में कुछ आता नहीं। कुछ और कहे।
एक सौ बारह बार। पर एक ही बात दो विरोधों के बीच में ठहर जा। प्रतिकार-आसक्‍ति–विरक्‍ति, ठहर जा—अमृत की उपलब्धि। दो के बीच दो विपरीत के बीच जो ठहर जाए वह गोल्‍डन मीन, स्‍वर्ण सेतु को उपलब्‍ध हो जाता है।
यह तीसरा सूत्र भी वहीं है। और आप भी अपने-अपने सूत्र खोज सकते है। कोई कठिनाई नहीं है। एक ही नियम है कि दो विपरीत के बीच ठहर जाना, तटस्‍थ हो जाना। सम्‍मान-अपमान, ठहर जाओ—मुक्‍ति। दुख-सुख, रूक जाओ—प्रभु में प्रवेश। मित्र-शत्रु,ठहर जाओ—सच्चिदानंद में गति।
कहीं से भी दो विपरीत को खोज लेना ओर दो के बीच में तटस्‍थ हो जाना। न इस तरफ झुकना, न उस तरफ। समस्‍त योग का सार इतना ही है। दो के बीच में जो ठहर जाता,वह जो दो के बाहर है, उसको उपलब्‍ध हो जाता है। द्वैत में जो तटस्थ हो जाता, अद्वैत में गति कर जाता है। द्वैत में ठहरी हुई चेतना अद्वैत में प्रतिष्‍ठित हो जाती है। द्वैत में भटकती चेतना, अद्वैत में च्‍युत हो जाती है।
–ओशो (गीता-दर्शन भाग—5 अध्‍याय 10, प्रवचन-12)

गधा-हीरा और जौहरी

पुरानी प्रचीन कथा है। एक जंगल की राह से एक जौहरी गुजर रहा था। देखा उसने राह में। एक कुम्‍हार अपने गधे के गले में एक बड़ा हीरा बांधकर चला आ रहा है। चकित हुआ। ये देख कर की ये कितना मुर्ख है। क्‍या इसे पता नहीं है की ये लाखों का हीरा है। और गधे के गले में सजाने के लिए बाँध रखा है। पूछा उसने कुम्‍हार से, सुनो ये पत्‍थर जो तुम गधे के गले में बांधे हो इसके कितने पैसे लोगे? कुम्‍हार ने कहां महाराज इस के क्‍या दाम पर चलो आप इस के आठ आने दे दो। हमनें तो ऐसे ही बाँध दिया था। की गधे का गला सुना न लगे। बच्‍चों के लिए आठ आने की मिठाई गधे की और से ल जाएँगे। बच्‍चे भी खुश हो जायेंगे और शायद गधा भी की उसके गले का बोझ कम हो गया है। पर जौहरी तो जौहरी ही था, पक्‍का बनिया, उसे लोभ पकड़ गया। उसने कहा आठ आने तो थोड़े ज्‍यादा है। तू इस के चार आने ले ले।
कुम्‍हार भी थोड़ा झक्‍की था। वह ज़िद्द पकड़ गया कि नहीं देने हो तो आठ आने नहीं देने है तो कम से कम छ: आने तो दे ही दो, नहीं तो हम नहीं बचेंगे। जौहरी ने कहा पत्‍थर ही तो है चार आने कोई कम तो नहीं। और सोचा थोड़ी दुर चलने पर आवाज दे देगा। आगे चला गया। लेकिन आधा फरलांग चलने के बाद भी कुम्हार ने उसे आवज न दी तब उसे लगा बात बिगड़ गई। नाहक छोड़ा छ: आने में ही ले लेता तो ठीक था। जौहरी वापस लौटकर आया। लेकिन तब तक बाजी हाथ से जा चुकी थी। गधा खड़ा आराम कर रहा था। और कुम्हार अपने काम में लगा था। जौहरी ने पूछा क्‍या हुआ। पत्‍थर कहां है। कुम्‍हार ने हंसते हुए कहां महाराज एक रूपया मिला है उस पत्‍थर का। पूरा आठ आने का फायदा हुआ है। आपको छ आने में बेच देता तो कितना घाटा होता। और अपने काम में लग गया।
पर जौहरी के तो माथे पर पसीना आ गया। उसका तो दिल बैठा जा रहा था सोच-सोच कर। हया लाखों का हीरा यूं मेरी नादानी की वजह से हाथ से चला गया। उसने कहा मूर्ख, तू बिलकुल गधे का गधा ही रहा। जानता है उस की कीमत कितनी है वह लाखों का था। और तूने एक रूपये में बेच दिया, मानो बहुत बड़ा खजाना तेरे हाथ लग गया।
उस कुम्‍हार ने कहां, हुजूर में अगर गधा न होता तो क्‍या इतना कीमती पत्‍थर गधे के गले में बाँध कर घूमता। लेकिन आपके लिए क्‍या कहूं? आप तो गधे के भी गधे निकले। आपको तो पता ही था की लाखों का हीरा है। और आप उस के छ: आने देने को तैयार नहीं थे। आप पत्‍थर की कीमत पर भी लेने को तैयार नहीं हुए।
धर्म का जिसे पता है; उसका जीवन अगर रूपांतरित न हो तो उस जौहरी की भांति गधा है। जिन्‍हें पता नहीं है, वे क्षमा के योग्‍य है, लेकिन जिन्‍हें पता है। उनको क्‍या कहें?
ओशो एस. धम्‍मो. सनंतनो भाग-4, प्रवचन—31