30 August 2012

सूफी कथा—आगे-आगे और आगे

एक पुरानी सूफी कथा है, एक फकीर जंगल में ध्‍यान करता और एक लकड़हारा रोज लकडियां काटता था। फकीर को उस की गरीबी पर दया आ गई, बह लकड़ हार बहुत बूढ़ा था। उसका शरीर तो बलिष्‍ठ था, पर उसकी बाल सफेद और कमर झुक गई थी। रोज सुबह से श्‍याम तक जंगल में लकड़ी काटते-काटते उसकी उम्र गुजर गई। और बचे बुढ़ापे के दिनों में अब कोई आस भी नहीं थी। क्‍योंकि अब तो वह इतना काम भी नहीं कर सकता था। तब साधु ने उसे बुलाया और कहां, सारी उम्र हो गई पागल तेरे को यहां लकड़ी काटते, तू जरा ओर आगे भी तो जा कर कभी देख…तो उस लकड़हारे ने कहां आगे जाने से क्‍या होगा। सारी उम्र तो कट गई। अब दूर जाने का साहस भी नहीं है मेरे पास। और आगे भी तो ऐसा ही जंगल होगा।
यहां पूरी उम्र गँवाई एक बार मेरी बात मान कर आगे और आग…. भी देख। काफी ना नुच करके वह मरे मन से आगे गया। आरे अभी मील भर आगे भी नहीं गया था कि लकड़हारा क्‍या देखता वहां तो तांबे कि एक बहुत बड़ी खान है। तब वह जितना तांबा ला सकता था उतना ला-ला कर रोज बेचने लगा। एक बार लाता और सात दिन के लिए काफी हो जाता। वह तो मस्‍त हो गया। छ: दिन आराम करे और एक दिन तांबा ला कर बेच। तब एक दिन उसके दिमाग में आई कि सारी उम्र में लकड़ी काटता रहा। तब कही बमुश्किल से फकीर के कहने से आगे गया। पर फकीर ने आगे और आगे…क्‍यों कहा। उस दिन वह जल्‍दी उठा और चल दिया तांबे की खान की और , वह तांबे की खदान को परा कर चलता रहा। मील दो मील चलने के बाद क्‍या देखता है। वहां पर तो चाँदी ही चाँदी है। जहां देखो। और उसने अपना सर घुन लिया। मैं भी कितना मुर्ख था। जो लकड़ी काटते-काटते पूरी उम्र गँवा दी। अब वह चाँदी की खदान से जितनी चाँदी ला सकता था ले आता और बेच देता, छ: महीने तक मौज से खाता। अब तो उसने अपना घर भी ठीक ठाक बनवा लिया। एक दिन काम करता और तीन महीने बैठ कर खाता। विश्राम ही विश्राम था। खूब सुख सुविधा मिल रही थी। भगवान ने अच्छा फकीर भेजा बुढ़ापा मौज से कट रहा था।
साल भर बाद फिर उसके मन में उत्‍सुकता जागी की आगे और आगे….क्‍यों न और आगे जा कर देख लूं और नही तो सेर सपाटा ही हो जायेगा। जो मुझे मिल गया है वह तो मुझसे छीना जाना है नहीं। तब वह एक दिन चाँदी की खादन को पार कर आगे चलता रहा। दोपहर हो गई जंगल और घना हो गया। पेड़ आसमान को छूने लगे थे। उसे लगता यहां के पेड़ काटने में कितना मजा आता। एक ही चंदन का पेड़ काट लेता तो महीना भर खाता पर अब क्‍या पेड़ काटना चाँद का काम अच्‍छा है। मेरे इतने पास इतना सब और मुझे पता तक नहीं। पूरा जंगल मेरा ही तो था। यहां सदा में आया, बस पास से ही लकडियां काट कर लोट जाता था। मैं भी कितना बुद्धू था। कभी मैने सोचा भी नहीं की जंगल में और संपदा ये भी हो सकती है।
तो वह गया। आगे उसे सोने की खदान मिली। फिर तो साल में एक आध बार घूमने की मस्‍ती में जाता और सोना उठा लाता। अब उसे काम कुछ भी नहीं था। तब एक दिन फकीर उसे बैठा ध्‍यान करता दिखाई दिया। वह बैठ गया। जब फकीर ने आंखे खोली तो उनके पैर छूकर कहां आप पहले क्‍यों नहीं मिल गये। मेरी पूरी उम्र यूं ही खत्‍म हो गई। तब फकीर ने कहां अब भी तो यूँ ही गंवा रहा है। कहां तक पहुंचा। तब उसने गर्व से कहा मैंने सोने की खाने खोज ली है। फकीर हंसा पाँच साल में भी तेरी समझ में कुछ नहीं आया। कुंजी तो में तुझे दे ही गया था। जब एक ताला खुला तो और खोलने की जिज्ञासा क्‍यों न आई। तू आज भी मूर्ख है। इतना जान कर भी आगे क्‍यों नहीं जाता।
तब उस लकड़ हारे ने आश्‍चर्य से कहां,अब और क्‍या हो सकता है। सोना तो आखिरी है। इसके आगे क्‍या हो सकता है। मेरी तो समझ में नहीं आता।
फकीर ने कहा: कोई भी चीज कभी आखरी नहीं होती, हर पेडी एक नया द्वार खोलती है। जरा और भी आगे जा कर देख इस संसार में रूकने के लिए कोई स्‍थान नहीं है। चलना ही मंजिल है…..
वह और आगे गया वहां पर हीरे की खादन थी। वह उन में से इतना उठा लाया कि जन्‍म भर कुछ करने की जरूरत नहीं रही। फिर एक दिन खुद उसके घर पर पहुंच गया। बह ठाठ से रह रहा था। तू तो रूक गया और आगे तुझे कुछ दिखाई नहीं दिया।
उस लकड़हारे ने कहां और आगे क्‍या? अपने लिए तो इतना ही काफी है, मेरी सात पीढ़ी भी बैठ कर खा सकती है। अब तो आराम करने दो। और थोड़ा भगवान का भजन करने दो। एक बार और भी जा कर देख,घर पर भी तो तुझे कुछ काम नहीं हे। अब तो तेरा स्‍वस्‍थ भी अच्‍छा हो गया हे। खूब पौष्टिक भोजन करता हे। चेहरा लाल हो गया। बुढ़ापा भी कम झलक रहा है तेरे चेहरे पर। कमर जो झुक गई थी। सीधी हो गई हो आराम के कारण।
उसने मरे मन से कहां और क्‍या हो सकता है हीरों से आगे?
अब हीरो के आगे जाने का उसका मन नहीं था, पर फकीर के सामने मना भी नहीं कर सका। चल दिया दो दिन चार दिन चलने के बाद। जब हीरों की खदान भी पार गया तो क्‍या देखता है। वहीं फकीर तो बैठ हुआ है—परम शांत, अपूर्व उसकी शांति थी। भूल गया लकड़हारा। जो फकीर उसके पास घर आया था वह ये तो नहीं था। आज उसकी आभा देखने जैसी थी। या शायद उसकी उलझी आंखें उसे देख नहीं पाई थी। और यहां न जाने क्‍या हो रहा है चारों और का सौन्‍दर्य देखते ही बनता है। वह झुक गया फकीर कि चरणों में, और उसने आंखें बंध कर ली घड़ी बीती दो घड़ी बीती वह नहीं उठा फकीर के चरणों में अभूत पूर्व आनंद बरस रहा था उन चरणों में पूरे जीवन की जो जलन पीड़ा झेली थी वह न जाने कहा पल में गायब हो गई। ऐसी शांति ऐसा आनंद उसने कभी नहीं जाना था। एक शांति की जल धार बह रही थी। फकीर ने आंखे खोली ओर चिल्लाया पागल फिर भूल गया मैंने जो कहां था। आगे और आगे….तू तो यहीं रूक गया। इन चरणों में भी नहीं रूकना। ये भी मंजिल नही है। और थोड़ा आगे।
उसने कहां अब और नहीं इतनी शांति इतना आनंद तो हीरे जवाहरातों में भी नहीं था। जो आपके चरणों में है। बस और नहीं मुझे यहीं रहने दो। इससे मधुर और इससे सुंदर और आगे क्‍या हो सकता है।
नहीं और आगे जा, तूने देखा है न जिसे तू अंत समझता था वह भी अंत नहीं है। आगे पूर्ण है जा और पूर्ण हो जा। जब तक आदमी पूर्ण नहीं हो जाता तब तक अतृप्‍ति बनी ही रहती है। गुरु के चरणों में सुख है आनंद है, शांति है, संसार के सामने अगर तौलो तो अपूर्व है। लेकिन परमाता के सामने तौलो तो कुछ भी नहीं। गुरु तो तराजू है जो तुम अनुभव देगा। मार्ग बतलायेगा, तुम सुख, दुःख गुरु के तराजू पर तोल सकते है। पर वहां कोई रूकना थोड़े ही है। आगे जाना है परमात्‍मा से पहले कोई पूर्णता तुम्‍हें रोके तो रूकना नहीं। चलते जाना है, और आगे और आगे……

प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप है

योगियों ने कहा है, प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप, क्रियाएं और उर्जा क्षेत्र होते है।
हम तो यहीं कहेंगे कि श्‍वास कहना पर्याप्‍त है। हम तो केवल रो ही बातें जानते है—श्‍वास को बाहर छोड़ना, श्‍वास को भी तर लेना—इतना ही। लेकिन योगी तो प्राण के संसार में जीते है। और वे इसके सूक्ष्‍म भेद को समझते है। इसलिए उन्‍होंने इसको पाँच भागों में विभक्‍त किया है। उन पांचों भागों को समझ लेना, वे बहुत महत्‍वपूर्ण है।
पहला है प्राण,
दूसरा है अपान,
तीसरा है समान,
चौथा उदान,
पाँचवाँ है व्‍यान।
यह व्‍यक्‍ति के भीतर के पाँच विस्‍तार है। और प्रत्‍येक भीतर अलग-अलग काम करता है।
प्राण है पहला श्‍वसन। दूसरा है अपान, वह मलोत्‍सर्ग में मदद देता है। वह मल आदि शरीर से निकालने में मदद करता है। अंतड़ियों की सफाई अपान से होती है। और अगर तुम जान लो कि कैसे इस पर काम करना है, तो तुम इस ढंग से अंतड़ियों की सफाई कर सकते हो जैसे कि कोई नहीं कर सकता। योगियों की आंतें सर्वाधिक साफ होती है। और वह बहुत ही महत्‍वपूर्ण है, क्‍योंकि एक बार जब आंतें पूरी तरह साफ हो जाती है, जब अंतड़ियां एक दम साफ हो जाती है, तो पूरा शरीर एक दम हल्‍का, भार विहीन हो जाता है, जैसे कि उड़ रहे हो। शरीर का भार समाप्‍त हो जाता है।
साधारणतया तो अंतड़ियों में बहुत सा कचरा और मल भरा रहता है—जीवन भर मल कि पर्तों पर पर्तें चढ़ती चली जाती है। अंतड़ियों की भीतरी दीवारों पर मल इकट्ठा होता जाता है। यह सूखता जाता है और अति कठोर होता जाता है। जो भीतर जहर बनता रहता है, उस से हमें भारी पन आता है। अगर अंतड़ियों की सफाई हो तो वह पृथ्‍वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रति तुम्‍हें ज्‍यादा खोद देगी। योग ने पेट की सफाई पर बहुत जोर दिया है। ताकि भीतर कोई विषैला पदार्थ न बच पाए वरना वे खून में चक्‍कर काटते रहते है। और वे मस्‍तिष्‍क में घूमते रहते है। और वह व्‍यक्‍ति के आसपास एक विशेष तरह का ऊर्जा क्षेत्र निर्मित कर देते है। जो कि बोझिल, उदास और कालिमा लिए होता है।
जब अंतड़ियां पूरी तरह से स्‍वच्‍छ और साफ हो जाती है। तो व्‍यक्‍ति के सिर के चारों और एक प्रकार का आभा मंडल निर्मित हो जाता है। और जिन लोगों के पास भी आंखें है, वे इसे बड़ी आसानी से देख सकते है। और जब अंतड़ियां पूरी तरह से स्‍वच्‍छ और साफ हो जाती है, तो व्‍यक्‍ति को ऐसा लगता है जैसे उसको पंख लग गए हो।
तीसरा है समान, वह पाचन शक्‍ति और शरीर को ऊष्‍मा प्रदान करता है। अगर तीसरे की क्रियाशीलता का ज्ञान हो जाए, और इसके प्रति सजगता आ जाए कि वह कहां प्रतिष्‍ठित है, तो पाचन-क्रिया एकदम ठीक हो जाती है।
साधारणतया भोजन तो हम अधिक कर लेते है। लेकिन उसे पचा नहीं पाते। कुछ लोग है कि खाए चले जाते है। और फिर भी संतुष्ट नहीं होते। भोजन पचे या न पचे, लेकिन कुछ लोग है कि ठूस-ठूस कर खोते चले जाते है। अगर व्‍यक्‍ति समान का उपयोग करना जानता हो, तो भोजन की थोड़ी सी मात्रा भी भोजन की अधिक मात्रा की उपेक्षा अधिक ऊर्जा देगी।
इसीलिए योगी बिना अपने शरीर को कोई क्षति पहुँचाए कई दिन तक उपवास कर पाते है। कभी-कभी वे थोड़ा सा भोजन ले लेते है, और उस भोजन को पूरी तरह सक पचा लेते है। उसे आत्‍मसात कर लेते है। तुम्‍हारा भोजन तो पूरी तरह पच नहीं पाता है। इसीलिए आदमी का मल दूसरे जानवरों के लिए भोजन बन जाता है। और वे उसे पचा सकते है। उस मल में बहुत सा भोज्‍य-पदार्थ अभी भी शेष रह जाता है।
और तीसरे, समान के द्वारा ही शरीर को ऊष्‍मा भी मिलती है। तिब्‍बत में समान के आधार पर ही पूरी पद्धति ही शरीर ऊष्‍मा की विकसित कर ली है। वे एक सुनिश्‍चित ढंग से एक सुनिश्‍चित लयबद्धता में श्‍वास लेते है। जिससे समान की ऊष्‍मा निर्मित कर लेते है। वे अपने भीतर एक विशेष ढंग से कार्य कर सकें। और उससे वे काफी ऊष्‍मा निर्मित कर लेते है। वे अपने शरीर में इतनी ऊष्‍मा निर्मित कर लेते है कि चारों और बर्फ गिर रही हो और तिब्‍बती लामा पसीने से भीगा खुले आकाश के नीचे नंगा खड़ा रह सकता है। अगर चारों और बर्फ ही बर्फ हो, तो साधारण आदमी तो ठंड के मारे जमने ही लगेगा। इतनी बर्फ में घर से बाहर भी निकलना संभव नहीं है। और तिब्‍बती लामा है कि पसीने से तर बतर गिरती हुई बर्फ के नीचे खड़ा रहेगा।
तिब्‍बत में चिकित्‍सक को जो परीक्षा जी जाती है, उसमें से यह भी एक परीक्षा का ढंग है। जब तिब्‍बत में कोई चिकित्‍सक बनता है तो पहले उसे एक परीक्षा देनी होती है। जिसमें उसे अपनी शरीर अग्‍नि को निर्मित करना पड़ता है। अगर वह निर्मित नहीं कर सकता है तो उसे डाक्‍टर बनने का सर्टिफिकेट नहीं दिया जाता। वह बहुत कठिन कार्य है। संसार में कोई भी दूसरी चिकित्‍सा प्रणाली चिकित्‍सक से इतनी बड़ी उपेक्षा नहीं रखती है। यह कोई मौखिक परीक्षा ही नहीं है। यह कुछ ऐसा नहीं है कि जिसे किसी तरह से रट लिया और परीक्षा में जाकर लिख दिया। व्‍यक्‍ति को सिद्ध करना होता है कि सच में उसने अपनी शरीर ऊष्‍मा पर काबू पा लिया है। क्‍योंकि फिर जीवन भर उसे अपने मरीजों की ऊष्‍मा ऊर्जा पर कार्य करना होता है। अगर उस ऊष्‍मा पर तुम्‍हारा ही पूरा अधिकार नहीं है, तो कैसे तुम दूसरों पर काम कर सकते हो?
इसलिए पूरी रात गिरती हुई बर्फ में परीक्षार्थी को बाहर खड़े रहना पड़ता है। परी रात में नौ बार परीक्षक आता है और हर बार शरीर को छूकर देखता है कि उसे पसीना आ रहा है या नहीं। अगर वह उतनी शरीर ऊष्‍मा निर्मित कर लेता है तो उस सम्‍मान का मालिक हो जाता है। वह चिकित्‍सक बन सकता है। अब उसके स्‍पर्श से रोगी को चमत्‍कारिक ढंग से ठीक कर देगा।
तिब्‍बत में वे चिकित्‍सक को सिखाते है कि जब रोगी के हाथ या नाड़ी को पकड़ो, तो एक खास ढंग से श्‍वास लो; केवल तभी चिकित्‍सक रोगी की श्‍वास प्रक्रिया को ठीक से जान सकेगा। और जब एक बार रोगी की श्‍वास-प्रक्रिया को चिकित्‍सक ठीक से जान लेता है तो वह रोगी की पूरी बीमारी को जान लेता है। और अब चिकित्‍सक को पता होता है कि क्‍या करना चाहिए। साधारण तो डाक्‍टर मरीज के लक्षणों की जांच करते समय स्‍वय उस स्‍थिति में नहीं जाते जिसमे रोगी है। लेकिन तिब्‍बत में—और उनकी पूरी विधि पतंजलि के योग पर आधारित है। पहले तो डाक्‍टर को उसके विशेष आयामों में आन होता है। ताकि वह रोगी के रोग का अनुभव कर सके। रोगी की श्‍वास प्रक्रिया में कहां पर बाधा है। कहां पर उसकी श्‍वास अवरूद्ध हो रही है।
चौथा है उदान, वाणी और संप्रेषण। जब तुम बोलते हो, तो चौथे प्रकार के प्राण का उपयोग करते हो। और इस प्राण को प्रशिक्षित किया जा सकता है। अगर यह प्राण प्रशिक्षित कर लिया जाए तो व्‍यक्‍ति के बोलने में, भाषण देने में, गीत गाने में एक तरह का सम्‍मोहन होगा। तब वाणी में एक तरह सम्‍मोहन होगा। तब बस, आवाज को सून कर ही चुंबक की तरह खींचे चले आते है।
और ठीक ऐसा ही संप्रेषण के साथ भी होता है। जिन लोगों को संप्रेषण करना कठिन होता है—और बहुत से लोग है जो इसी कठिनाई में है कि दूसरे व्‍यक्‍ति के साथ कैसे संबंधित हों, दूसरे के साथ कैसे खुल सकें। बंद न रहें। कैसे बात चीत करें, कैसे प्रेम करे, कैसे मैत्री बनाए, कैसे दूसरे के साथ कम्‍यूनिकेट करें, उन सभी की उदान को लेकिर ही कोई न कोई कठिनाई है। वे नहीं जानते कि इस प्राण ऊर्जा का उपयोग कैसे करना है। जो कि व्‍यक्‍ति को प्रवाह मान बनाती है। और ऊर्जा को खोल देती है, तब आसानी से दूसरे के साथ संप्रेषण हो सकता है। दूसरे तक पहुंचना हो सकता है। और तब फिर कहीं कोई अवरोध नहीं रहता।
उदना उर्जा-प्रवाहिनी को सिद्ध करने से योगी पृथ्‍वी से ऊपर उठ पाता है। और किसी आधार किसी संपर्क के बिना पानी, कीचड़, कांटों को पार कर लेता है।
अगर व्‍यक्‍ति स्‍वयं के साथ समस्‍वरता पा लेता है और उदना के नाम से पहचाने जाने वाले प्राण को सिद्ध कर लेता है तो वह हवा में ऊपर उठ सकता है। क्‍योंकि यह उदना ही है जो व्‍यक्‍ति को गुरुत्वाकर्षण के साथ जोड़ कर रखती है।
तुम आकाश में पक्षियों को, बड़े-बड़े पक्षियों को उड़ते हुए देखते हो। अभी भी वैज्ञानिकों के लिए यह एक रहस्‍य ही बना हुआ है कि पक्षी इतनी भार के साथ कैसे उड़ते है। ये पक्षी प्रकृति की और से ही उदना के बारे में जानते है। इसलिए उनके लिए उड़ना सहज और स्वभाविक होता है। वह एक विशेष ढंग विशेष श्‍वास लेते है। अगर तुम भी उसी ढंग से श्‍वास को ले सको तो तुम पाओगे कि तुम्‍हारा संबंध गुरुत्वाकर्षण से टूट गया है। गुरुत्वाकर्षण के साथ जो व्‍यक्‍ति का संबंध है। वह उसके अंतर-अस्‍तित्‍व से ही है। वह उसके भीतर से ही है। इसलिए इसे तोड़ा भी नहीं जा सकता है।
और पांचवी है, व्‍यान, समन्‍वय और संघटन।
पांचवी व्‍यक्‍ति को संघटित रखती है। जब पाँचवीं शरीर को छोड़ देती है। तो व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु हो जाती है। तब शरीर विघटित होना शुरू हो जाता है। अगर पांचवी मौजूद रहता है। तो चाहे पूरी की पूरी श्‍वास प्रक्रिया क्‍यों न रूक जाए, व्‍यक्‍ति जीवित रहेगा।
यही तो योगी कर रहे है। जब योगी जनता के सामने प्रदर्शन करके यह दिखाते है कि वे अपनी ह्रदय गति को रोक सकते है। तो वह पहले के चार प्राणों को रोक देते है। पहले के चार प्राणों को—वे पांचवें पर ठहर जाते है। लेकिन पाँचवीं प्राण ऊर्जा इतनी सूक्ष्‍म है कि आज तक कोई ऐसा यंत्र नहीं बना है जो उसका पता लगा सके। तो दस मिनट तक सभी तरह से डाक्‍टर या कोई भी व्‍यक्‍ति निरीक्षण कर सकता है और उन्‍हें लगेगा कि योगी मर गया है। और डाक्‍टर उसका प्रमाण पत्र भी दे देंगे। कि वह मर गया है। और योगी फिर से जीवित हो जाएगा। फिर सक उसकी श्‍वास प्रारंभ हो जाएगी, फिर से उसका ह्रदय धड़कना प्रारंभ कर देगा।
पांचवी प्रक्रिया सर्वाधिक सूक्ष्‍म है और यही वह धागा है जो व्‍यक्‍ति को एक जैविक एका में ऑर्गेनिक यूनिटी में बांधकर रखता है।
अगर पांचवें को जान लिया जाये तो परमात्‍मा को जाना जा सकता है। उसे पहले परमात्‍मा को नहीं जाना जा सकता। क्‍योंकि हमारे भी पांचवें का वही कार्य है जो कि परमात्‍मा का उसकी समग्रता में कार्य है। परमात्‍मा व्‍यान है। वह संपूर्ण अस्‍तित्‍व को एकसाथ जोड़े हुए है—चाँद-तारें, सूरज, संपूर्ण ब्रह्मांड को, सब को एक दूसरे के साथ जोड़े हुए है।
पतंजलि: योग-सूत्र, भाग-4, प्रवचन-19, ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पुणे

कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है—पतंजलि

कूर्मनाडयां स्‍थैर्यम्–
कूर्म-नाड़ी प्राण की, श्‍वास की वाहिका है। अगर हम चुपचाप, शांतिपूर्वक अपने श्वसन पर ध्‍यान दें, किसी भी ढंग से श्‍वास की लय न बिगड़े, न तो स्‍वास तेज हो, और न ही धीमी हो, बस उसे स्‍वाभाविक और शिथिल रूप से चलने दें। तब अगर हम केवल श्‍वास को देखते रहे, तो हम धीरे-धीरे थिर होने लगेंगे। फिर भीतर किसी तरह की कोई हलन-चलन नहीं होगी। क्‍यों?
क्‍योंकि सभी हलन-चलन, गति श्‍वास के द्वारा ही होती है। श्‍वास से ही पूरी की पूरी गति होती है। श्‍वास ही सारी हलन-चलन और गतियों का संचरण करती है। जब श्‍वास रूक जाती है। तो व्‍यक्‍ति मर जाता है। फिर वह चल फिर नहीं सकता। हिल-डुल नहीं सकता।
अगर व्‍यक्‍ति निरंतर श्‍वास पर ही संयम करता है, कूर्म-नाड़ी पर ही केंद्रित रहे, तो धीरे-धीरे एक ऐसी अवस्‍था आ जाएगी जहां पर स्‍वास करीब-करीब रूक ही जाती है।
योगी इस ध्‍यान की प्रक्रिया को दर्पण के सामने करते है, क्‍योंकि योगी की श्‍वास धीरे-धीरे इतनी शांत हो जाती है। कि उसे श्‍वास चल रही है या नहीं इसकी प्रतीति भी नहीं रह जाती है। अगर दर्पण पर श्‍वास की कुछ धुंध आ जाए, तो ही उन्‍हें मालूम पड़ता है कि उनकी श्‍वास चल रही है। कई बार योगी ध्‍यान में इतनी शांत और थिर हो जाते है कि उन्‍हें यह मालूम ह नहीं पड़ता कि वह भी जिंदा है या नहीं है। ध्‍यान की गहराई में तुम्‍हें भी यह अनुभव कभी न कभी घटेगा। उससे भयभीत मत होना। उस समय श्‍वास लगभग रूक सी जाती है। जब होश अपनी परिपूर्णता पर होता है, उस समय श्‍वास लगभग ठहर जाती है। लेकिन उस समय परेशान मत होना। भयभीत मत होना, यह काई मृत्‍यु नहीं है। वह तो केवल शांत अवस्‍था है।
योग का संपूर्ण प्रयास ही इस बात के लिए है कि व्‍यक्‍ति को ऐसी गहन शांत अवस्‍था तक ले आए कि फिर उस शांति को कोई भी भंग न कर सके। चेतना ऐसी शांत अवस्‍था को उपलब्‍ध हो जाए कि फिर उसकी शांति भंग न हो सके।
योग का अर्थ है, एक होने की विधि। योग का अर्थ है, जो कुछ अलग-अलग जा पडा है। उसे फिर से जोड़ना। योग का अर्थ है जोड़। योग का अर्थ है, यूनिओ मिस्‍टिका। योग का अर्थ है, एकता। हां, लाभ की प्राप्‍त तभी होती है जब हम दो का एक कर सकें।
और योग का पूरा प्रयास ही इसके लिए है कि शाश्‍वतता को कैसे पा सकें, जीजों के पीछे छीपी एकात्‍मकता को कैसे पा सकें। सभी परिवर्तनों, सभी गतियों के पीछे छीपी थिरता को कैसे प्राप्‍त कर सकें—अमृत को कैसे उपल्‍बध हो सकें, मृत्‍यु का अतिक्रमण कैसे कर सकें।
निश्‍चित ही हमारी आदतें बाधा खड़ी करेंगी। क्‍योंकि लंबे समय से हम इन्‍हीं गलत आदतों के साथ जीते आ रहे है। हमारे मन का गलत आदतों के साथ तालमेल बैठ गया है। इसी कारण हम हमेशा हर चीज को खंड-खंड में तोड़ देते है। आदमी की बुद्धि इसी के लिए प्रशिक्षित हुई है कि पहले हर चीज को विभक्‍त कर दो और फिर चीजों का विश्‍लेषण करो और एक चीज को बहुत रूपों में विभाजित कर दो। मनुष्‍य आज तक बुद्धि से ही जीता आया है, और वह भूल ही गया है कि चीजों को कैसे जोड़ना है, कैसे एक करना है।
लेकिन हमारी पुरानी आदतें चीजों को विश्‍लेषित करने की, चीर फाड़ करने की है। हमारी पुरानी आदतें यही है कि उसे खोजना है जो निरंतर परिवर्तनशील है। मन तो हमेशा नए में और परिवर्तन में ही रोमांच का अनुभव करता है। अगर कुछ भी बदले नहीं, सब कुछ वैसा का वैसा ही रहे, तो मन उदास हो जाता है, हमें मन की इन आदतों के प्रति सचेत होना होगा। अन्यथा आदतें तो किसी ने किसी रूप में बनी ही रहेंगी। और मन बहुत चालाक है।
ध्यान रहे मन कि आदत विश्‍लेषण करने की है। और योग है संश्‍लेषण, तो जब कभी मन विश्लेष ण करे, उसे उठाकर एक तरफ रख देना। विश्‍लेषण के द्वारा तुम अंतिम छोर तक, छोटे से छोटे, अणु परिमाणु तक पहुंच जाओगे। लेकिन संश्‍लेषण के द्वारा तुम विराट और समग्र तक पहुंच जाओगे। विज्ञान खोज करते-करते अणु तक जा पहुंचा। और योग खोजते-खोजते, आत्‍मा तक पहुंच गया। अणु का अर्थ है: लघु और छोटा, और आत्‍मा का अर्थ है, विराट। योग ने संपूर्ण को जाना है, समग्र हो अनुभव किया है। और विज्ञान ने छोटे और उससे भी छोटे तत्‍व को जाना है। और इसी तरह वह लधु की और चलता जा रहा है।
पहले तो विज्ञान ने पदार्थ को अणु में विभाजित किया। फिर विज्ञान ने पाया कि अणु को विभाजित करना कठिन है; फिर जब वे अणु का भी विभाजन करने में सफल हो गए, तो उन्‍होंने उसे परमाणु कहा। अणु का अर्थ ही होता है वह तत्‍व जो अविभाज्‍य जिसे अब और अधिक विभाजित न किया जा सके। लेकिन विज्ञान ने उसे भी विभाजित कर दिया। फिर विज्ञान इलेक्ट्रॉन न न्यूट्रॉन तक जा पहुंचा, और उसने सोचा कि अब और विभाजन संभव नहीं है। क्‍योंकि पदार्थ लगभग अदृश्‍य ही हो गया था। उसे अब देखना संभव नहीं था। जब इलेक्ट्रॉन दिखाई ही नहीं देता, तो कैसे उसका विभाजन संभव हो सकता है। लेकिन अब विज्ञान उसे भी विभाजित करने में सफल हो गया है। बिना इलेक्ट्रॉन को देखे, वैज्ञानिकों के उसको भी विभक्‍त कर दिया है।
वैज्ञानिक इसी तरह से चीजों को विभक्‍त करते चले जाएंगे……अब सभी कुछ हाथ के बाहर हो गया है।
योग ठीक इसके विपरीत प्रक्रिया है: योग संश्‍लेषण की प्रक्रिया है। योग जुड़ते जाने की और अधिकाधिक जुड़ते जाने की प्रक्रिया है, जिससे अंत में व्‍यक्‍ति अपने पूर्ण स्‍वरूप तक जा पहुंचे, स्‍वयं के साथ एक हो जाए। अस्‍तित्‍व एक है।
मन को भी सूर्य-मन, और चंद्र-मन में विभक्‍त किया जा सकता है। सूर्य मन वैज्ञानिक होता है, चंद्र मन काव्यात्मक होता है। सूर्य-मन विश्‍लेषणात्‍मक होता है, चंद्र-मन संश्‍लेषणात्‍मक होता है। सूर्य-मन गणितीय, तार्किक, अरस्‍तुगत होता है। चंद्र-मन बिलकुल अलग ही ढंग का होता है—असंगत होता है। अतार्किक होता है। सूर्य-मन और चंद्र-मन दोनों इतने अलग-अलग ढंग से कार्य करते है कि उनके बीच कही कोई संवाद नहीं हो पाता।
तुम कौन से केंद्र पर हो इसको जानने का प्रयत्‍न करो, तुम सूर्य-मन हो—तब गणित और तर्क तुम्‍हारे जीवन की शैली है। अगर तुम चंद्र-मन हो तो—तो काव्‍य, कल्‍पनाशीलता तुम्‍हारी जीवन-शैली होगी। तो तुम क्‍या हो और तुम्‍हारी क्‍या स्‍थिति है, पहले तो इसे जानना जरूरी है।
और ध्‍यान रहे, दोनों मन आधे-आधे होते है, तुम्‍हें दोनों के ही पार जाना है। अगर तुम सूर्य मन हो तो पहले चंद्र मन तक आना होगा। फिर उसके भी आगे जाना है। अगर तुम गृहस्‍थ हो, तो पहले जिप्‍सी हो जाओ।
यही है, संन्‍यास। मैं तुम्‍हें जिप्‍सी बना रहा हूं, घुमक्कड़ बना रहा हूं। अगर तुम बहुत ज्‍यादा तार्किक हो, तो मैं तुमसे कहता हूं, श्रद्धा करो, समर्पण करो, त्‍याग करो, सर्व-स्‍वीकार भाव से झुको। अगर तुम बहुत ज्‍यादा तार्किक हो, तो मैं तुम से कहूंगा कि यहां तर्क की कोई जरूरत नहीं है, बस मेरी और देखो और प्रेम में डूब जाओ। अगर ऐसा कर सको तो अच्‍छा है, क्‍योंकि यह एक प्रेम का नाता है। अगर तुम श्रद्धा में जी सकते हो, तो तुम्‍हारी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की और सरक जाएगी।
जब तुम्‍हारी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की और सरक जाती है। तो एक नयी ही संभावना का द्वार खुलता है। तुम फिर चंद्र के भी पार जा सकत हो, तब तुम साक्षी हो जाते हो, और वही है उद्देश्‍य, वही है मंजिल।
ओशो पतंजलि : योग-सूत्र, भाग—4, प्रवचन—13

भगवान बुद्ध और ज्‍योतिषी

एक गर्म दोपहरी थी। भगवान बुद्ध नदी किनारे चले जा रहे थे। नंगे पाव होने के कारण ठंडी बालु रेत का सहारा ले पैरों को ठंडा कर लेते थे। आस पास कहीं कोई वृक्ष नहीं था। नदी का पाट गर्मी के सुकड़ कर सर्प की तरह आड़ा तिरछा और संकरा भी हो गया। चारों और बालु का विस्‍तार फैला हुआ था। सुर्य शिखर पर था। रेत गर्मी के कारण तप रही थी। भगवान पैरो की जलन को कम करने के लिए गीली रेत पर चल कर पैरो को ठंडा कर रहे थे। जिसके कारण उनके पद चाप नदी के गिले बालु पर चित्र वत छपे अति सुंदर लग रहे है। दुर तक कोई बड़ा पेड़ न होने के कारण, पास ही एक कैंदु की झाड़ी की छांव को देख कर पल भर विश्राम करने के लिए रूप गये। कैंदु की छांव इतनी सधन थी कि कोई-कोई धूप का चितका छन कर ही आपा रहा था।
संयोगवश काशी से ज्योतिष पढ़ कर एक महा पंडित अपने घर आ रहा था। उसने ज्योतिष और अंक गणित के रहस्‍यों को जाने के लिए बारह साल लगाये थे। कीमती से कीमती ग्रंथ उस के पास था। उसके गुरु ने उसे महाविद्यालय उपाधि दे कर विदा किया था। गर्मी के कारण वह बैल गाड़ी से उतर कर पानी पीने नदी के किनारे आया। बालु पर जो भगवान के पद चाप छपे थे उन्‍हें देख कर उसे यकीन ही नहीं आया। वह इतना हैरान और परेशान हुआ की भाग कर बैल गाड़ी के गया और एक ग्रंथ निकाल कर लाया। और उन चिन्‍हों को उनके साथ मिलान करने लगा। वह सोचने लगा तो फिर जो मैंने बारह वर्ष तक सिखा है वह बेकार है। इस भर दोपहरी में ये पद चिन्‍ह इस निर्जन जंगल में । ये कैसे हो सकता है। वह उन पद चिन्‍हों का पीछा करता हुआ चला। दस र्फलांग चलने पर ही उसने एक आदमी को एक झाड़ के नीचे विश्राम करते हुए देखा।
वह उस और चल दिया। भगवान पैर पर पैर रख कर आराम कर रहे थे। पास बैठ कर ज्योतिषी ने उन चिन्‍हों का मिलान किया। पहले तो अपने को भाग्‍य शाली समझा की जो लाखों सालों में करोड़ों आदमियों में भी दुर्लभ चिन्‍ह है उन्‍हे देखने को मिले। पर ये खुशी पल भर में ही गायब हो गई।
क्‍योंकि चरण चिन्‍ह पर जो रेखाएं थी, वे उस शास्‍त्रों के अनुसार चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए। वैसी रेखाएं केवल उस के ही पैर में हो सकती है। जो सारे जगत को, छहों महाद्वीपों का एकमात्र सम्राट हो, जो पूरी पृथ्‍वी का मालिक हो। लेकिन जिस व्‍यक्‍ति को सामने लेटा हुआ देख रहा था। वह तो एक भिखारी था। उसके कपड़े फटे हुए नंगे पैर। जो धूप में चलने के लहू लूहान हो गये थे। एक दीद दरिद्र नदी के किनारे सोता हुआ भिखारी। पर उसके चेहरे पर तेज था। एक आभा थी, एक गौरव गरिमा थी। एक प्रसाद था एक शांति थी, जो उसे भी घेर रही थी। वह अपना सर पकड़ कर बैठ गया। अब उसके चलने कि हिम्‍मत जवाब दे चुकी थी। अब या ता जो सालों जाना है वो बेकार, या इस बात का और क्‍या रहस्‍य हो सकता है। इस बात को जाने के लिए वह भगवान के सौकर उठने का इंतजार करने लगा। मन में लगातार विचार चल रहे थे कि ऐसा कैसे हो सकता जिस मनुष्‍य के पैरों में पद्म हो और वो भिखारी, देख रहा है अपने सामने भिक्षा पात्र, जीर्ण-शीर्ण वस्‍त्र, न पास कोई रक्षक, न मंत्रि गण, न रथ, अकेला, वह भी इस निर्जन जंगल में। बारह वर्ष जो कड़ी मेहनत कर शिक्षा अर्जित की है वह किस काम, की उस ज्योतिषी को और भी अधिक मुश्‍किल में डाल दिया। एक-एक पल उसके लिए भारी हो रहा था। कि कब ये मनुष्‍य आंखे खोले और उसके मन में उठ रहे तूफान का निर्वाण करे।
अचानक भगवान ने आंखे खोली सामने एक ज्‍योतिषी को बैठे देख, और मुस्‍कुराये। उनकी हंसी मैं भी एक सौंदर्य था। एक तृप्‍ति थी, एक प्रसाद था। ज्‍योतिषी ने दोनों हाथ जोड़ कर निवेदन किया, महाराज आप मेरी शंका का निवारण कीजिए। मेरे भीतर एक अराजकता पैदा हो गई है। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है। मैं बनारस से ज्‍योतिष की शिक्षा ग्रहण करके लोट रहा हूं। आपके पैरों में जो पद्म है। वह अति दुर्लभ है, हजारों साल में कभी किसी भाग्य शाली को देखने को मिलता है। पर हमारी ज्‍योतिष कहती है कि उस व्‍यक्‍ति को चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए, परन्‍तु आप…..। और ज्‍योतिषी कहते-कहते चुप हो गया। लेकिन आपकी आंखे, आपका संग, एक सुगंध से लवलीन है, इतनी जीवित आंखे मैने आज तक नहीं देखी। आप केवल भिक्षु ही नहीं उस सब के भी पास कुछ और को पा चुके हो। पर शंका अपनी जगह वहीं के वही है। आपको चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए। मैं बहुत मुश्‍किल में हूं कृपा मेरी मुश्‍किल को सुलझाओं।
भगवान बुद्ध हंसे और उन्‍होंने कहा, जब तक में बंधा था, इस प्रकृति की पकड़ में, तब तक आपका ये ज्‍योतिष काम करता था। अब मैं सब बंधनों से, मुक्‍त हो गया हूं, न तो प्रकृति मेरा उपयोग कर सकती है, यहां तक जन्‍म-मृत्यु भी अब उस के बस के बहार हो गया है। आप उस पाश में बंधे है। आप चाह कर अपनी इच्‍छा से कहीं जनम नहीं ले सकते। प्रकृति जहां धक्‍के मारेगी वहीं जाना हो। और मुक्ति का क्‍या अर्थ की घर बार छोड़ दिया, जंगलों में भाग गये। ये तो उपरी थोड़ा आडम्बर है। हाँ साधना में सह योग दे सकता है। पर ये पूर्ण मुक्‍ति नहीं है। अब मैं मुक्‍त हूं, आपका ज्योतिष मुझ पर काम नहीं कर सकता। जो सोए है, उनके सबंध में ये ठीक है। जो बंधे है बंधन में उनके लिए ठीक है। पर जो मुक्‍त हो गये, वहां ये नकारा हो जाता है। वहां ये कुछ काम नहीं कर सकता।
ज्‍योतिषी की कुछ समझ में नहीं आया। मुक्‍त बंधन तो ठीक है, पर मैं ये पूछना चाहता हूं की आप मनुष्य तो है। आपका शरीर है, मन है, फिर ये सब आप पर काम क्‍यों नहीं करता। क्‍या आपको भूख नहीं लगती। क्‍या पृथ्‍वी का गुरुत्वाकर्षण आपको खिचता नहीं। क्‍या आपको सर्दी नहीं लगती। क्‍या आपके मन, दया का, वेदना का भाव मिट गया। आप चलते है, सोते है।…..
बोघिक तोर से भरे मन को समझना अति कठिन है।
वो सब तो होता है।
तो फिर क्‍या आप मनुष्‍य न होकर कोई देवता है।
बुद्ध ने कहां,नहीं।
तो किन्‍नर है।
बुद्ध ने कहा नहीं।
तो क्‍या आप यक्ष है।
यूं ज्‍योतिषी पूछता चला गया। और भगवान बुद्ध उत्‍तर देते चले गये। तब उसने कहा तो आप खुद ही बताये की आप कोन है।
भगवान बुद्ध ने कहां, मैं तुम्‍हें कहा चुका हूं मैं केवल एक जागा हुआ आदमी हूं। अब सोया हुआ नहीं हूं, इस अवस्‍था को ही हमने मुक्‍ति कहा है, मोक्ष कहा है। परम स्वतंत्रता कहा है। कैवल्‍य कहा है, समाधि कहां है।
पर पता नहीं बेचारे ज्‍योतिषी को कुछ समझ आया या नहीं, वह केवल उठा और भारी कदमों से अपनी बेल गाड़ी की तरफ चला गया। रत पर उसके पैरों के कदम भी बनते चले गये। सुर्य भी अपनी तपीस को समेट कर घर जाने की तैयारी कर रहा था। नदी पर और बालु पर पड़ रही उसकी किरण स्‍वर्णिम होने का भ्रम दे रही थी। दुर पक्षियों का झुंड संध्‍या से पहले अपने शरीर को उष्मा देने के लिए उड़ारी भर रहा था। पेड़ पौधे भी दिन भर की तपीस के बाद अब चेन की सांस ले सोन की तैयारी कर रहे थे। जैसे भगवान पुरी प्रकृति भगवान के उत्‍तर से प्रश्न थी। की एक तो मुक्‍त हुआ। कल हमारी भी बारी है। पर ज्‍योतिष हताश और मायूस चला जा रहा था। भगवान बस बैठे देखते रहे उसे जाते हुए और फिर कमंडल उठा कर आगे बढ़ गये।

भगवान बुद्ध और यशोधरा

गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्‍ध होने के बाद घर वापस लौटे। बारह साल बाद वापस लौटे। जिस दिन घर छोड़ा था, उनका बच्‍चा, उनका बैटा एक ही दिन का था। राहुल एक ही दिन का था। जब आए तो वह बारह वर्ष का हो चुका था। और बुद्ध की पत्‍नी यशोधरा बहुत नाराज थी। स्‍वभावत:। और उसके एक बहुत महत्‍वपूर्ण सवाल पूछा। उसने पूछा कि मैं इतना जानना चाहती हूं; क्‍या तुम्‍हें मेरा इतना भी भरोसा न था कि मुझसे कह देते कि मैं जा रहा हूं? क्‍या तुम सोचते हो कि मैं तुम्‍हें रोक लेती? मैं भी क्षत्राणी हूं। अगर हम युद्ध के मैदान पर तिलक और टीका लगा कर तुम्‍हें भेज सकते है, तो सत्‍य की खोज पर नहीं भेज सकेत? तुमने मेरा अपमान किया है। बुरा अपमान किया है। जाकर किया अपमान ऐसा नहीं। तुमने पूछा क्‍यों नहीं? तुम कह तो देते कि मैं जा रहा हूं। एक मौका तो मुझे देते। देख तो लेते कि मैं रोती हूं, चिल्‍लाती हूं, रूकावट डालती हूं।
कहते है बुद्ध से बहुत लोगों ने बहुत तरह के प्रश्‍न पूछे होंगे। मगर जिंदगी में एक मौका था जब वे चुप रह गए। जवाब न दे पाये। और यशोधरा ने एक के बाद एक तीर चलाए। और यशोधरा ने कहा कि मैं तुमसे दूसरी यह बात पूछती हूं कि जो तुमने जंगल में जाकर पाया, क्‍या तुम छाती पर हाथ रख कर कह सकते हो कि वह यहीं नहीं मिल सकता था?
यह भी भगवान बुद्ध कैसे कहें कि यहीं नहीं मिल सकता था। क्‍योंकि सत्‍य तो सभी जगह है। और भ्रम वश कोई अंजान कह दे तो भी कोई बात मानी जाये, अब तो उन्‍होंने खुद सत्‍य को जान लिया है, कि वह जंगल में मिल सकता है, तो क्‍या बाजार में नहीं मिल सकता। पहले बाजार में थे तब तो लगता था सत्‍य तो यहां नहीं है। वह तो जंगल में ही है। वह संसार में कहां वह तो संसार के छोड़ देने पर ही मिल सकता है। पर सत्‍य के मिल जाने के बात तो फिर उसी संसार और बाजार में आना पडा तब जाना यहां भी जाना जा सकता था सत्‍य का नाहक भागे। पर यहां थोड़ा कठिन जरूर है, पर ऐसा कैसे कह दे की यहां नहीं है। वह तो सब जगह है। भगवान बुद्ध के पास इस बात का कोई उत्‍तर नहीं था। उन्‍होंने आंखे झुका ली।
और तीसर प्रश्न जो यशोदा ने चोट की, शायद यशोदा समझ न सकी की बुद्ध पुरूष का यूं चुप रह जाना अति खतरनाक है। उस पर बार-बार चोट कर अपने आप को झंझट में डालने जैसा है, बुद्धों के पास क्‍या होता है। ध्‍यान-ध्‍यान-ध्‍यान और सन्‍यास। सो इस आखरी चोट में यशोदा उलझ गई। तीसरी बात उसने कहीं, राहुल को सामने किया और कहा कि ये तेरे पिता है। ये देख, ये जो भिखारी की तरह खड़ा है, हाथ में भिक्षा पात्र लिए। यहीं है तेरे पिता। ये तुझे पैदा होने के दिन छोड़ कर कायरों की तरह भाग गये थे। अंधेरे में अपना मुहँ छूपाये। जब तू मात्र के एक दिन का था। अभी पैदा हुआ नवजात। अब ये लौटे है, तेरे पिता, देख ले इन्‍हीं जी भर कर। शायद फिर आये या न आये। तुझे मिले या न मिले। इनसे तू अपनी वसीयत मांग ले। तेरे लिए क्‍या है इनके पास देने के लिए। वह मांग ले।
यह बड़ी गहरी चोट थी। बुद्ध के पास देने को था ही क्‍या। यशोधरा प्रतिशोध ले रही थी बारह वर्षों का। उसके ह्रदय के घाव जो नासूर बन गये थे। बह रहा था पीड़ा और संताप का मवाद। नहीं सूखा था वो जख्‍म जो बुद्ध उस रात दे कर चले गये थे। लेकिन उसने कभी सोचा भी नहीं था कि ये घटना कोई नया मोड़ ले लेगी। वह तो भाव में बहीं जा रही थी। बात को इतने आगे तक खींच लिया था अब उस का तनाव उसकी तरफ वापस लौटेगा। इस की और उसका ध्‍यान गया ही नहीं। भगवान जो इतनी देर से शांत बैठे थे उनके चेहरे पर मंद हंसी आई, यशोधरा का क्रोध और भभक उठा। उस इस बात का एहसास भी नहीं हो रहा था की वह बंद रही है मकड़ी की तरह अपने ही ताने बाने में।
भगवान ने तत्क्षण अपना भिक्षा पात्र सामने खड़े राहुल के हाथ में दे दिया। यशोधरा कुछ कहें या कुछ बोले। यह इतनी जल्‍दी हो गया। कि उसकी कुछ समझ में नहीं आया। इस के विषय में तो उसने सोचा भी नहीं था। भगवान ने कहा,बेटा मेरे पास देने को कुछ और है भी नहीं, लेकिन जो मैंने पाया है वह तुझे दूँगा। जिस सर्व सब के लिए मैने घर बार छोड़ा तुझे तेरी मां, और इस राज पाट को छोड़, और आज मुझे वो मिल गया है। मैं खुद चाहूंगा वही मेरे प्रिय पुत्र को भी मिल जाये। बाकी जो दिया जा सकता है। क्षणिक है। देने से पहले ही हाथ से फिसल जाता हे। बाकी रंग भी कोई रंग है। संध्‍या के आसमान की तरह,जो पल-पल बदलते रहते है। में तो तुझे ऐसे रंग में रंग देना चाहता हूं जो कभी नहीं छुट सकता। तू संन्‍यस्‍त हो जा।
बारह वर्ष के बेटे को संन्‍यस्‍त कर दिया। यशोधरा की आंखों से झर-झर आंसू गिरने लगे। उसने कहां ये आप क्‍या कर रहे है।
पर बुद्ध ने कहा,जो मरी संपदा है वही तो दे सकता हूं। समाधि मेरी संपदा है, और बांटने का ढंग संन्‍यास है। और यशोधरा, जो बीत गई बात उसे बिसार दे। आया ही इसलिए हूं कि तुझे भी ले जाऊँ। अब राहुल तो गया। तू भी चल। जिस संपदा का मैं मालिक हुआ हूं। उसकी तूँ भी मालिक हो जा।
और सच में ही यशोधरा ने सिद्ध कर दिया कि वह क्षत्राणी थी। तत्‍क्षण पैरों में झुक गई और उसने कहा, मुझे भी दीक्षा दें। और दीक्षा लेकर भिक्षुओं में, संन्‍यासियों में यूं खो गई कि फिर उसका कोई उल्‍लेख नहीं है। पूरे धम्म पद में कोई उल्‍लेख नहीं आता। हजारों संन्‍यासियों कि भीड़ में अपने को यूँ मिटा दिया। जैसे वो है ही नहीं। लोग उसके त्‍याग को नहीं समझ सकते। अपने मान , सम्‍मान, अहंकार को यूं मिटा दिया की संन्‍यासी भूल ही गये की ये वहीं यशोधरा है। भगवान बुद्ध की पत्‍नी। बहुत कठिन तपस्‍या थ यशोधरा की। पर वो उसपर खरी उतरी। उसकी अस्‍मिता यूं खो गई जैस कपूर। बौद्ध शास्‍त्रों में इस घटना के बाद उसका फिर कोई उल्‍लेख नहीं आता। कैसे जीयी, कैसे मरी,कब तक जीयी, कब मरी, किसी को कुछ पता नहीं। हां राहुल का जरूर जिक्र आता है बौद्ध शास्‍त्रों में जब उसे ब्रह्म ज्ञान प्राप्‍त हुआ, शायद वह सोलह साल का था। उस रात उसे मार ने डराया, वह संन्‍यासियों की कतार में बहुत दूर सोता था। एक साधारण सन्‍यासी की तरह। उस रात वह जब मार ने उसे डराया, तब वह गंध कुटी के बहार आ कर सो गया। भगवान बुद्ध की कुटिया को गंध कुटी कहते थे। उसी रात राहुल ब्रह्म ज्ञान को उपलब्‍ध हुआ। मात्र राहुल का भी बौद्ध ग्रंथों में यही वर्णन आता है। कठिन था जीवन, रोज-रोज भिक्षा मांग कर खानी होती थी। और जब आप अति विशेष हो तो आपको अपनी अति विशेषता को छोड़ना अति कठिन है। यशोधरा और राहुल ने छोड़ा, उन संन्यासियों की भिड़ में ऐसे गुम हो गये। यूं लीन हो गये, यूं डूब गये, इसको कहते है आन। कि आने के पद चाप भी आप न देख सके कोई ध्वनि भी न हुई, कोई छावा तक नहीं बन। तभी कोई अपने घर आ सकता है। बेड़ बाजा बजा कर केवल आने का भ्रम पैदा कर देना है।
–ओशो आपुई गई हिराय, प्रवचन—10, ओशो आश्रम, पूना,