18 October 2011

वरदान


प्रभु! विपत्तियों से मेरी रक्षा करो,  यह प्रार्थना लेकर में तेरे द्वार नहीं आया,
विपत्तियों से भयभीत न होऊं, बस यही वरदान दे.

अपने दु:ख से व्यथित चित्त कोसांत्वना देने की भिक्षा नहीं मांगता,
दुखों पर विजय पााऊं यही आशीर्वाद दे, यही प्रार्थना है.

मुझे बचा ले... यह प्रार्थना लेकर मैं  तेरे दर पर नहीं आया हूं
केवल संकट सागर में तैरते रहने की शक्ति माँगता हूँ.

मेरा भार हल्का कर दे... यह याचना पूर्ण होने की सांत्वना नहीं चाहता हूं
यह भार वाहन कर चलता रह सकूं... बस यही प्रार्थना है।

सुख भरे क्षणों में मैं नतमस्तक हो तेरे दर्शन कर सकूं
किन्तु दु:ख भरी रातों मैं जब सारी दुनिया मेरा उपहास करे,
तब शंकित न होऊं, बस यही वरदान मांगता हूं।।।

(गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कालजयी कृति गीतांजली से साभार)

10 October 2011

नहीं रहे जगजीत सिंह



ऐसा लगा जैसे कोई
मेरा सगा ही चला गया

वो पुरअसर आवाज, वो पुरसुकूं चेहरा
आंखों के सामने लहरा गया

इक हूक उठी, तड़प जगी
आंखों में आंसू आ गया

जबसे सुना जगजीत सिंह नहीं रहे
भीतर ही भीतर कुछ कम होता चला गया।
(नोट: फोटो में जगजीत सिंह अपनी पत्नी चित्रा सिंह व दिवंगत बेटे विवेक व सौतेली बेटी मोनिका के साथ हैं।)

08 October 2011

जब तुम्ही अनजान बनकर रह गए तो...


जब तुम्ही अनजान बनकर रह गए तो
विश्व की पहचान लेकर क्या करूं

जब न तुमसे स्नेह के दो कण मिले
व्यथा कहने के लिए दो क्षण मिले
जब तुम्ही ने की सतत अवहेलना
तो विश्व का सम्मान लेकर क्या करूं...
जब तुम्ही अनजान बनकर ...

बस एक ही आशा एक ही अरमान था
हृदय को बस तुम पर अभिमान था
जब तुम ही न अपना सके हमें
तो व्यर्थ का सम्मान लेकर क्या करूं...
जब तुम्ही अनजान बनकर ... 

दूं तुम्हे कैसे जलन मैं अपनी दिखा 
दूं तुम्हे कैसे लगन मैं अपनी दिखा
जो स्वरित होकर भी कुछ न कह सके
मैं भला वे गान लेकर क्या करूं...
जब तुम्ही अनजान बनकर ...

अर्चना निष्प्राण की आखिर कब तक करूं
कामना वरदान की आखिर कब तक करूं
जो बना युग-युग पहेली-सा
मौन वह भगवान लेकर क्या करूं...
जब तुम्ही अनजान बनकर ...।।

(नोट : इस कविता को किसने लिखा है मुझे नहीं पता, यदि किसी सज्जन को मालूम हो तो कृपया जरूर बताएं।)


28 September 2011

मोर्चे पर डटा रहने वाला लीडर

कई लोगों के लिए लीडर और मैनेजर शब्द का एक ही मतलब है। बेशक इनमें समानता है, लेकिन एक हद तक। असल में ये दोनों का$फी अलग हैं। इनमें वही अंतर है, जो औसत खिलाड़ी और बेहतरीन खिलाड़ी में होता है...


- मैनेजर मेंटेन करता है, जबकि लीडर विकसित। मैनेजर नीतियों और प्रक्रियाओं पर ही ध्यान देता है। काम का सुचारू चलना ही उसका लक्ष्य होता है, जबकि लीडर का जोर 'सही चीजÓ करने में होता है।
- मैनेजर अनुसरण या नकल करता है। वह नया करने की नहीं सोचता, जबकि लीडर प्रयोगधर्मी होता है। वह बेहतर करने के लिए वह अपनी टीम के लोगों व अन्य दूसरे लीडरों से मशवरा करता है, तरीकों के संबंध में चर्चा करता है,और बेहतर करने के लिए नियमों में बदलाव से पीछे नहीं हटता।
- मैनेजर प्रोडक्ट पर ध्यान देता है, जबकि लीडर प्रोसेस पर। मैनेजर कामकाज में सक्रिय भागीदारी नहीं निभाता, बल्कि अंत में आए नतीजे से ही सरोकार रखता है। लीडर, गुणवत्ता, उत्पादन और दक्षता के सिद्धांत को ध्यान में रखता है। इसके अनुसार वह कर्मचारियों की कोशिश और नतीजे को जानने में सक्षम होता है।
- मैनेजर कर्मचारियों का मूल्यांकन सकारात्मक प्रतिक्रिया के आधार पर करता है, उसका कर्मचारियों के कामकाज से सीधा जुड़ाव नहीं होता। लीडर कामकाज से सीधा वास्ता रखता है और सहज ज्ञान के आधार पर कर्मचारियों का मूल्यांकन करता है।
- मैनेजर अपने मातहत को सहायक  के रूप में देखता है। इसीलिए किसी सहायक के आगे बढऩे पर, वह असुरक्षाबोध से ग्रसित हो जाता है। इसके विपरीत, लीडर अन्य दूसरे लीडर विकसित करने का प्रयास करता है। सहायकों को प्रोत्साहित करता है।
- मैनेजर अपने सहायकों को 'क्या करना हैÓ यह बताकर आउटपुट मांगता है। लीडर यह भी बताता है कि वह काम कैसे हो पाएगा। वह सहायकों को एक विजन, एक नजरिया भी दे देता है।  कर्मचारियों से उनकी व्यक्तिगत कमियों पर चर्चा कर उसे दूर करने का रास्ता भी बताता है।
- लीडर कर्मचारियों में सुरक्षा का एहसास भरता है। $गलती होने पर इल्•ााम अपने सर लेने तैयार रहता है। मैनेजर कर्मचारियों को सीधे कटघरे में खड़ा कर देता है।
- लीडर एक ही लाठी से सबको नहीं हांकता। उसे पता होता है- कौन मक्कारी के कारण काम नहीं कर पाया, और कौन समस्या की वजह से रुका है। मैनेजर में यह समझदारी नहीं होती। 
- मैनेजर न सुनना पसंद नहीं करता, उसे केवल तारी$फ पसंद होती है। लीडर स्वस्थ माहौल में खुलकर काम करने व बात रखने की छूट देता है। अपनी बात कटने पर अन्यथा नहीं लेता।
- मैनेजर कंट्रोल पर यकीन रखता है जबकि लीडर विश्वास पर। जो सहायक अनुकूल नहीं लगते, मैनेजर उन पर दबाव बनाता है, जबकि लीडर स्वाभाविक प्रवृत्तियों के आधार पर प्रोत्साहित करके काम लेता है। 

23 September 2011

धर्म का सार

 आज जहां अनेक लोगों व संस्थाओं पर जबरिया धर्मांतरण कराने के आरोप लग रहे हंै, वहीं किसी समय हिंदू धर्म ग्रहण करने आए एक अमेरिकी प्रोफेसर को, स्वामी विवेकानंद ने दीक्षा देने से इंकार करते हुए अच्छा ईसाई बनने कहा था। पढि़ए, एक रोचक किस्सा..
 बात उन दिनों की है, जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में थे। लोग स्वामीजी को सुनने और उनसे धर्म के विषय में अधिक से अधिक जानने को उत्सुक थे। उनके धर्म संबंधी विचारों से प्रभावित होकर एक दिन एक अमेरिकी प्रोफेसर उनके पास पहुंचे। उन्होंने स्वामी जी को प्रणाम कर कहा- स्वामीजी,  आप मुझे अपने हिंदू धर्म में दीक्षित करने की कृपा करें।
उनकी बात सुनकर स्वामीजी बोले- मैं यहां धर्म-प्रचार के लिए आया हूं, न कि धर्म-परिवर्तन के लिए। मैं अमेरिकी धर्म-प्रचारकों को यह संदेश देने आया हूं कि वे धर्म-परिवर्तन के अभियान को बंद कर प्रत्येक धर्म के लोगों को बेहतर इंसान बनाने का प्रयास करें। यही धर्म की सार्थकता है। सभी धर्मों का मकसद यही है। हिंदू संस्कृति विश्व-बंधुत्व का संदेश देती है, मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानती है। इस पृथ्वी पर सबसे पहले मानव का आगमन हुआ था। उस समय कहीं कोई धर्म, जाति या भाषा न थी। मानव ने अपनी सुविधानुसार अपनी-अपनी भाषाओं, धर्म तथा जाति का निर्माण किया और अपने मुख्य उद्देश्य से भटक गया। यही कारण है कि समाज में तरह-तरह की विसंगतियां आ गई हैं। लोग आपस में विभाजित नजर आते हैं। इसलिए मैं तुम्हें यह कहना चाहता हूं कि तुम अपना धर्म पालन करते हुए अच्छे ईसाई बनो। हर धर्म का सार मानवता के गुणों को विकसित करने में है इसलिए तुम भारत के ऋषियों-मुनियों के शाश्वत संदेशों का लाभ उठाओ और उन्हें अपने जीवन में उतारो। वह प्रोफेसर उनकी बातों से अभिभूत हो गए।